अशोक भाटिया
हाल ही में मोदी के नार्वे के दौरे के बाद नॉर्वे की पत्रकार हेली लिंग लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान उनसे कुछ सवाल पूछने की कोशिश की थी। ये पूरा घटनाक्रम उस समय हुआ जब पीएम मोदी नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ मंच से उतर रहे थे। इसी दौरान का वीडियो शेयर करते हुए हेली लिंग ने पीएम मोदी से सवाल किया। फिर एक्स पर इस घटना का वीडियो शेयर करते हुए भारत की प्रेस स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। जिसे लेकर सियासी पारा चढ़ने लगा। इस पर कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रिएक्ट किया। अब इसी पोस्ट पर रिप्लाई करते हुए हेली लिंग ने राहुल गांधी से इंटरव्यू की बात कही है।
बताया जाता है कि हेली लिंग ने ट्विटर पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी से संपर्क किया है। हेली लिंग ने राहुल गांधी से पूछा कि ‘क्या वे मंगलवार को फोन पर इंटरव्यू के लिए उपलब्ध हैं। उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता से पूछा कि नमस्ते, क्या आप मंगलवार को (नॉर्वे के समय के अनुसार) फोन इंटरव्यू के लिए उपलब्ध होंगे? यह जानना दिलचस्प होगा कि आप नॉर्वे की यात्रा को किस नजर से देखते हैं।’ हेली लिंग एक्स पर राहुल गांधी की एक पोस्ट का जवाब दे रही थीं, जब उन्होंने पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे का एक वीडियो शेयर किया।
राहुल गांधी ने हेली लिंग की इसी वीडियो पोस्ट पर रिएक्ट करते हुए पीएम मोदी पर घबरा जाने और भागने का आरोप लगाया है। उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘जब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता, तो डरने की भी कोई बात नहीं होती। भारत की छवि का क्या होता है, जब दुनिया एक ऐसे पीएम को देखती है जो सवालों से घबराकर भाग जाते हैं?’ वीडियो में, पत्रकार हेले लिंग को यह पूछते हुए सुना जा सकता है कि पीएम मोदी, आप दुनिया की सबसे आजाद प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?
हेली लिंग ने इस घटना का फुटेज अपने एक्स अकाउंट पर शेयर किया और लिखा कि भारत के प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने मेरा सवाल नहीं लिया, मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे पहले स्थान पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर है। और फिलीस्तीन, अमीरात और क्यूबा जैसे देशों से मुकाबला कर रहा है। जिन ताकतों के साथ हम सहयोग करते हैं, उनसे सवाल पूछना हमारा काम है।
गौरतलब है कि नॉर्वे सिर्फ अपने खूबसूरत बर्फीले समुद्र तटों और मछलियों के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि उसकी एक सालाना आदत भी है- पूरी दुनिया को यह बताना कि तुम सब गलत कर रहे हो! इसे ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ (दुनिया में प्रेस की आजादी की रैंकिंग) कहा जाता है। इस लिस्ट में भारत का हाल बहुत बुरा है। वह इस सूची में फिलिस्तीन और वेनेजुएला के बीच कहीं है। जिनमें से एक देश गुलाम है और दूसरा आधा गुलाम। भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश इसमें हम जैसे ही हैं। जैसे दक्षिण एशियाई सब एक जैसे दिखते हैं। इसमें तुर्की भी है, जहां के राष्ट्रपति एर्दोगन मजे-मजे में पत्रकारों को जेल भेज देते हैं। भारत इस लिस्ट में 157वें नंबर पर है और नॉर्वे हमेशा की तरह नंबर वन पर! क्योंकि नॉर्वे में बहुत आजादी है- दुनिया में सबसे ज्यादा, शायद जरूरत से ज्यादा ।
वैसे आप किसी नॉर्वे वाले से भारत के लिए बहुत गर्मजोशी की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि वो देश है ही हाड़ कंपा देने वाला ठंडा। खैर, अब कहानी में एंट्री हुई है बेबाक और सुनहरे बालों वाली हेली लेन की। मिस लेन एक ऐसे अखबार या वेबसाइट में लिखती हैं जिसे खुद नॉर्वे के ज्यादातर लोगों ने कभी नहीं पढ़ा। वह एक ऐसे देश के बारे में लिख रही हैं जहां नार्वे वाले कभी घूमने नहीं आएंगे। और यह सब उन्होंने एक ऐसी ज्वाइंट मीटिंग में किया जो कायदे से कोई सवाल-जवाब वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी ही नहीं।
यह फर्क समझना जरूरी है। दो बड़े नेताओं की ऐसी ज्वाइंट मीटिंग सिर्फ फोटो खिंचवाने (फोटोऑप) के लिए होती है। कूटनीति का थिएटर, न कि तीखी पत्रकारिता का मैदान। दुनिया का हर पत्रकार यह बात जानता है। सिवाय शायद हेली लेन के, जिन्होंने सोचा कि नरेंद्र मोदी पर प्रेस फ्रीडम को लेकर चिल्लाने का यही सबसे सही मौका है। मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया और वह कमरे से बाहर चले गए। जब कोई आपके फोटो खिंचवाने के दौरान इस तरह चिल्लाए, तो वहां से चले जाना ही सबसे सही तरीका है।
लेकिन हेली इतने पर ही नहीं थमीं। उन्होंने लिफ्ट तक उनका पीछा किया। फिर घर जाकर इस बारे में ट्वीट कर दिया। उन्होंने लिखा, “नरेंद्र मोदी ने मेरा सवाल नहीं सुना। नॉर्वे प्रेस की आजादी में पहले नंबर पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर फिलिस्तीन, यूएई और क्यूबा से मुकाबला कर रहा है। हमारा काम उन ताकतों से सवाल करना है जिनके साथ कोऑपरेट कर रहे हैं। “
हेली की बातें दिलचस्प सोच की गवाही देती हैं। कि नॉर्वे का भारत के साथ हाथ मिलाना एक नैतिक भूल है और इसके लिए हेली जैसी पत्रकार का टोकना जरूरी है। जबकि सच यह है कि ठीक उसी समय नॉर्वे की सरकार भारत के साथ कई बिजनेस डील साइन कर रही थी। नॉर्वे की सरकार ने खुद पीएम मोदी को न्योता दिया था, वहां के राजा ने उनसे हाथ मिलाया था। और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने के बाद यह माना कि भारत बिजनेस करने के लिए एक बढ़िया देश है। लेकिन हेली के मन में सवाल थे -‘Helle Yeah’!
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी जब भी विदेश पत्रकारों के सामने होते हैं तो भारत का अपमान किए बिना नहीं रहते हैं। अपने विवादित बयानों से कभी वह खालिस्तान अलगाववादियों के जमीन तैयार कर देत हैं तो कभी चीन की वाहवाही करते हैं। इस बार उन्होंने भारत के लोकतंत्र का अपमान किया है। शायद यही सोच कर नॉर्वे की पत्रकार हेली लिंग ने उन्हें अपने विवादित इंटरव्यू के लिए चुना ।
ऐसे कई मौके है जब लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी विदेशी पत्रकारों के सामने भारत की आलोचना करते रहते है । जर्मनी के बर्लिन में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्र की भाजपा सरकार पर तंज कसा था । इसके पहले अमेरिका यात्रा के दौरान बोस्टन यूनिवर्सिटी में भारतीय चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए समझौता करने वाला बताया। इस बयान के बाद यह सवाल फिर से उठने लगा है कि क्या राहुल गांधी जानबूझकर विदेशी धरती पर भारत की छवि को खराब कर रहे हैं? पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने कई बार विदेशी मंचों का इस्तेमाल भारत को लेकर विवादास्पद बयान देने के लिए किए हैं। इन बयानों पर अक्सर बीजेपी और अन्य दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। मसलन, बोस्टन में उन्होंने चुनाव आयोग को लेकर जो कुछ भी कहा है, उसे उनकी ‘भारत बदनाम यात्रा’ कहा जा सकता है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब में कहा कि ‘भारत में लोकतंत्र पिछले 10 सालों से टूटा (ब्रोकेन) हुआ था, अब यह लड़ रहा है।’ दरअसल, इन चुनावों में 10 साल बाद कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में विपक्ष के नेता का पद हासिल हो पाया था, क्योंकि वह 99 सीटों पर पहुंची थी। ऐसे में राहुल पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 2014 और 2019 में देश में जो चुनाव हुए, उसमें देश की जनता ने वोट नहीं डाला था? उनका यह कहना लोकतंत्र की मूल भावना पर ही सवाल उठाता है।
सितंबर 2023 में राहुल गांधी ने ब्रसेल्स में यूरोपियन यूनियन में कहा कि भारत में ‘फुल स्केल एसॉल्ट’हो रहा है। उन्होंने भारतीय संस्थाओं की निष्पक्षता पर संदेह जताया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में भेदभाव और हिंसा बढ़ रही है। इस तरह के बयान भारत की अंदरूनी राजनीति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाते हैं। राहुल गांधी यह क्यों भूल जाते हैं कि भारतीय चुनाव आयोग ने ही वे चुनाव संपन्न करवाए हैं, जिनके दम पर वह आज विपक्ष के नेता पद पर बैठे हुए हैं।
मई 2022 में लंदन में ‘आइडियाज फॉर इंडिया’ सम्मेलन में राहुल गांधी ने कहा कि भारत की संस्थाएं ‘परजीवी’ बन गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘डीप स्टेट’ (CBI, ED) भारत को चबा रहा है। यहां ‘डीप स्टेट’ का मतलब सरकार के अंदर छिपे हुए ऐसे ताकतवर लोग हैं जो अपने फायदे के लिए काम करते हैं। राहुल गांधी ने भारत की तुलना पाकिस्तान जैसे अस्थिर लोकतंत्र से भी कर दी।
अगस्त 2018 में यूके और जर्मनी में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कहा कि वे ‘देशभक्त नहीं’ हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वे जनता के गुस्से का इस्तेमाल देश को नुकसान पहुंचाने में कर रहे हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के एक चुने हुए प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप था। इसे विदेशी मंच पर कहना स्वाभाविक रूप से विवाद पैदा करने वाला रहा।
मार्च 2018 में मलेशिया में राहुल गांधी ने नोटबंदी को लेकर तंज कसा। उन्होंने कहा कि अगर वह प्रधानमंत्री होते तो इस प्रस्ताव को ‘कूड़ेदान में फेंक देते’। राहुल गांधी ने कहा कि अगर वह प्रधानमंत्री होते तो वह ऐसा नहीं करते।
2018 में ही सिंगापुर में ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में राहुल गांधी ने कहा कि भारत में ‘डर और नफरत’ का माहौल है। उन्होंने कहा कि बहुलता की विचारधारा खतरे में है। जनवरी 2018 में बहरीन में NRI सम्मेलन में राहुल गांधी ने कहा कि सरकार बेरोजगारी से निपटने में नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि इसका असर सड़कों पर गुस्से और नफरत के रूप में दिख रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह समुदायों के बीच नफरत फैलाने में जुटी है।
सितंबर 2017 में अमेरिका के बर्कले स्थित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार सिर्फ टॉप 100 कंपनियों के लिए काम कर रही है। 2017 में ही अमेरिका में राहुल गांधी ने कहा कि भारत अब वह नहीं रहा जहां हर कोई कुछ भी कह सकता है। उन्होंने विदेश की धरती पर भारत में ‘फ्री स्पीच’की स्थिति पर संदेह पैदा करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारत में सहनशीलता खत्म हो गई है।
राहुल गांधी का यह तर्क रहा है कि वे भारत की ‘असली तस्वीर’ दुनिया के सामने रख रहे हैं। लेकिन, आलोचना और बदनामी में एक बारीक फर्क होता है। एक राष्ट्रीय नेता को यह समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए बयान सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे भारत की छवि, निवेशकों के भरोसे और वैश्विक कूटनीतिक संबंधों पर भी असर डालते हैं।





