पूर्व पीएम राजीव गांधी की शहादत का वह सबक हमें कितना याद है?

How much do we remember the lesson of the martyrdom of former PM Rajiv Gandhi?

दिलीप कुमार पाठक

हर साल 21 मई को पूरा देश राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस मनाता है। अखबारों की रस्मी खबरों और सरकारी बयानों के बीच क्या हम कभी सोचते हैं कि इस दिन की असली जरूरत क्या है? 21 मई हमारे इतिहास का वह काला दिन है जिसने देश की सुरक्षा और राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इसी दिन तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी रैली के दौरान लिट्टे की आत्मघाती हमलावर ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी थी। वह धमाका सिर्फ एक नेता की मौत नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला था, जिसने देश को हिलाकर रख दिया। इस दर्दनाक हादसे के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। राजीव गांधी के बलिदान को याद रखने और देश को इस खतरे के खिलाफ एकजुट करने के लिए हर साल 21 मई को आधिकारिक तौर पर यह दिवस मनाने की शुरुआत हुई।

इस दिवस की स्थापना के पीछे का रणनीतिक संदेश बिल्कुल साफ था – देश को सचेत करना कि नफरत और कट्टरता की राजनीति राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को कितना गहरा और लाइलाज जख्म दे सकती है। लेकिन तीन दशकों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी हालात कितने बदले हैं? सोचने वाली बात है। आज भी जब हम सुबह की चाय के साथ अखबार खोलते हैं, तो सुर्खियां किसी आतंकी साजिश, धमाके या मासूमों के खून से सनी होती हैं। यह स्थिति इस बुनियादी सवाल पर सोचने को मजबूर करती है कि नीतिगत और सामाजिक स्तर पर हमसे चूक कहां हो रही है? दरअसल, हमारी सबसे बड़ी भूल यह रही कि हमने आतंकवाद को महज ‘सरहद की समस्या’ और सैन्य सुरक्षा का मामला मान लिया। हमने मान लिया कि सीमाओं पर मुस्तैद फौज और सुरक्षा बलों की बंदूकें हमारा सुरक्षा कवच हैं, और बतौर नागरिक हमारी जिम्मेदारी खत्म हो गई। यही वह वैचारिक ढीलापन है जहां हम गच्चा खा रहे हैं, क्योंकि आतंकवाद ने अपना पारंपरिक चोला बदल लिया है। अब इसके ठिकाने किसी सुदूर घाटी, बंद कमरों या घने जंगलों तक सीमित नहीं हैं; इसका नया युद्धक्षेत्र हमारे ड्राइंग रूम और युवाओं की जेब में रखा मोबाइल फोन है। आज कट्टरपंथ का दौर है, जहां किसी मासूम के ब्रेनवॉश के लिए न तो भौतिक रूप से आमने-सामने आने की जरूरत है और ना ही किसी ट्रेनिंग कैंप की। सोशल मीडिया और डार्क वेब पर तैरता एक छोटा सा भड़काऊ वीडियो, कोई फेक न्यूज या एडिटेड विजुअल किसी भी संवेदनशील युवा के मन में नफरत का बारूद भरने के लिए काफी है। आतंकवाद न तो किसी मजहब की बपौती है और न ही इसकी कोई राष्ट्रीयता होती है, इसका एकमात्र एजेंडा समाज में अविश्वास की खाई खोदना और देश के सांप्रदायिक सौहार्द को पंगु बनाना है। जब कोई आत्मघाती हमला या विस्फोट होता है, तो बारूद के वो छर्रे किसी का मजहब या जाति देखकर रास्ता नहीं बदलते। वे सिर्फ इंसानी बस्तियों को उजाड़ते हैं और हंसते-खेलते परिवारों के भविष्य को हमेशा के लिए दफन कर देते हैं।

इस नफ़रत ने देश का बहुत बड़ा नुकसान किया है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती, लिहाज़ा हम सुरक्षा का पूरा जिम्मा सिर्फ सेना या पुलिस पर न छोड़ें। आज के दौर में एक सजग नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बढ़ गई है। इंटरनेट पर फैल रही नफरत और कट्टरता का मुकाबला सिर्फ कानून के भरोसे नहीं किया जा सकता, इसके लिए हमें समाज में आपसी बातचीत और भाईचारे को बढ़ाना होगा। अगर हमारे आसपास कोई युवा गुमराह हो रहा है या सोशल मीडिया पर गलत राह पकड़ रहा है, तो हमें उसे सही समय पर टोकना और संभालना होगा। सच तो यह है कि जब समाज में अपनों के बीच बातचीत बंद हो जाती है, तभी आतंकवाद को पैर पसारने का मौका मिलता है। इस दिन को मनाने का असली फायदा तभी है जब हम युवाओं के लिए पढ़ाई और रोजगार के ऐसे बेहतर मौके बनाएं, जहां किसी के मन में गलत रास्ता चुनने का खयाल ही न आए। आतंकवाद के खिलाफ यह जंग सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि सही सोच और जनता की एकजुटता से ही जीती जा सकती है। हमें अपने समाज को भीतर से इतना मजबूत करना होगा कि नफरत फैलाने वाला कोई भी शख्स हमारे अमन-चैन को न बिगाड़ सके। देश के भाईचारे को बचाए रखना ही शहीदों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।