बीमार अस्पताल : महंगी मशीनें विलासिता नहीं, बुनियादी जरूरत

Ailing hospitals: Expensive machines not luxuries, but basic needs

डॉ विजय गर्ग

अस्पताल किसी भी सभ्य समाज की पहचान होते हैं। जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है, दुर्घटना का शिकार होता है या जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा होता है, तब उसकी सबसे बड़ी उम्मीद अस्पताल ही होता है। लेकिन आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में एक गंभीर समस्या सामने आ रही है—अस्पताल स्वयं “बीमार” होते जा रहे हैं। इमारतें हैं, डॉक्टर हैं, मरीजों की लंबी कतारें हैं, लेकिन आधुनिक मशीनों और तकनीक की भारी कमी है। ऐसे में इलाज अधूरा रह जाता है और मरीजों की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है।

आज समय आ गया है कि हम यह समझें कि अस्पतालों में लगी महंगी मशीनें कोई विलासिता या दिखावे की वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियादी जरूरत हैं। जिस प्रकार एक सैनिक के लिए हथियार जरूरी है, उसी प्रकार डॉक्टर के लिए आधुनिक मशीनें आवश्यक हैं।

बदलते समय के साथ बदलती चिकित्सा

एक समय था जब डॉक्टर केवल अनुभव और सामान्य जांच के आधार पर बीमारी का इलाज करते थे। लेकिन आज बीमारियाँ जटिल हो चुकी हैं। कैंसर, हृदय रोग, ब्रेन स्ट्रोक, किडनी फेलियर, संक्रमण और आनुवंशिक बीमारियों की सही पहचान बिना आधुनिक तकनीक के संभव नहीं है।

एमआरआई, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड, वेंटिलेटर, डायलिसिस मशीन, ईसीजी, पीईटी स्कैन, रोबोटिक सर्जरी, डिजिटल लैब और आईसीयू उपकरण आज चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। यदि ये मशीनें अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होंगी, तो डॉक्टर चाहकर भी सही इलाज नहीं कर पाएंगे।

गरीब मरीजों की सबसे बड़ी परेशानी

भारत के सरकारी अस्पतालों में अक्सर मशीनों की कमी या खराब मशीनों की समस्या देखने को मिलती है। कई जगह एमआरआई मशीन महीनों तक बंद रहती है। कहीं सीटी स्कैन मशीन खराब पड़ी रहती है तो कहीं वेंटिलेटर की संख्या बेहद कम होती है। परिणामस्वरूप मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़ता है, जहां इलाज बहुत महंगा होता है।

एक गरीब परिवार अपने घर, जमीन और गहने तक बेच देता है ताकि वह अपने प्रियजन का इलाज करा सके। कई बार इलाज के खर्च के कारण पूरा परिवार कर्ज में डूब जाता है। यदि सरकारी अस्पतालों में आधुनिक मशीनें उपलब्ध हों और सही तरीके से कार्य करें, तो लाखों गरीब परिवार आर्थिक और मानसिक पीड़ा से बच सकते हैं।

मशीनें जीवन बचाती हैं

कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को यह सिखाया कि अस्पतालों में आधुनिक मशीनों का कितना महत्व है। जिन अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट, वेंटिलेटर और मॉनिटरिंग सिस्टम पर्याप्त मात्रा में थे, वहां अधिक लोगों की जान बचाई जा सकी। वहीं जिन अस्पतालों में संसाधनों की कमी थी, वहां स्थिति भयावह हो गई।

एक वेंटिलेटर किसी मरीज की सांसों को बचा सकता है। एक सीटी स्कैन समय रहते ब्रेन स्ट्रोक पकड़ सकता है। एक डायलिसिस मशीन किडनी मरीज को नया जीवन दे सकती है। इसलिए मशीनें केवल उपकरण नहीं, बल्कि जीवन रक्षक साधन हैं।

केवल मशीन खरीदना पर्याप्त नहीं

कई बार सरकारें और संस्थाएं करोड़ों रुपये खर्च करके मशीनें खरीद तो लेती हैं, लेकिन उनका रखरखाव और संचालन सही ढंग से नहीं हो पाता। मशीनें धूल खाती रहती हैं क्योंकि उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित तकनीशियन नहीं होते या समय पर मरम्मत नहीं होती।

इसलिए जरूरी है कि अस्पतालों में केवल मशीनें ही न लाई जाएं, बल्कि उनके रखरखाव, प्रशिक्षण और निरंतर उपयोग की भी मजबूत व्यवस्था हो। मशीनों का सही उपयोग तभी संभव है जब डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों को आधुनिक प्रशिक्षण दिया जाए।

ग्रामीण भारत की उपेक्षा

शहरों के बड़े अस्पतालों में कुछ हद तक आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन गांवों और छोटे कस्बों के अस्पताल आज भी संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक्स-रे मशीन तक नहीं होती। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को दूर शहरों में जाना पड़ता है।

ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का यह अंतर सामाजिक असमानता को और बढ़ाता है। हर नागरिक को समान स्वास्थ्य सुविधा मिलना उसका अधिकार है। इसलिए आधुनिक मशीनों का विस्तार केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

स्वास्थ्य पर खर्च को निवेश समझना होगा

अक्सर स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले खर्च को “बोझ” मान लिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि स्वास्थ्य पर खर्च किसी भी राष्ट्र के भविष्य में निवेश होता है। एक स्वस्थ नागरिक ही देश की प्रगति में योगदान दे सकता है। यदि अस्पताल मजबूत होंगे, तो समाज मजबूत होगा।

सरकारों को रक्षा, सड़क और अन्य विकास कार्यों की तरह स्वास्थ्य क्षेत्र को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। आधुनिक मशीनों से लैस अस्पताल केवल अमीर देशों की पहचान नहीं, बल्कि हर विकासशील राष्ट्र की आवश्यकता हैं।

निष्कर्ष

अस्पताल केवल इमारतों से नहीं चलते, बल्कि आधुनिक संसाधनों, प्रशिक्षित कर्मचारियों और तकनीकी सुविधाओं से मजबूत बनते हैं। महंगी मशीनों को विलासिता समझना एक बड़ी भूल है। ये मशीनें मरीजों की जिंदगी बचाने का माध्यम हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था की आधारशिला हैं।

यदि हम सचमुच एक स्वस्थ और विकसित भारत का सपना देखते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि अस्पतालों में आधुनिक मशीनें कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी अधिकार हैं। क्योंकि जब अस्पताल मजबूत होंगे, तभी समाज सुरक्षित और स्वस्थ बन पाएगा।