एन जी भट्ट
भारत में इन दिनों कोकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लेकर सोशल मीडिया, राजनीतिक गलियारों और युवाओं के बीच तीखी चर्चाएँ चल रही हैं। यह शुरुआत में एक व्यंग्यात्मक डिजिटल अभियान माना गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह बेरोजगारी, युवाओं की नाराजगी और व्यवस्था-विरोधी भावना का प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है। इस पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब भारत के मुख्य न्यायाधीश से जुड़ी एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर कॉकरोच बयान के रूप में वायरल हुई। इसके बाद कई युवाओं ने इसे अपमानजनक मानते हुए व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया दी और कोकरोच जनता पार्टी नाम से एक ऑनलाइन अभियान शुरू हो गया।
सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि यह केवल मजाक नहीं रह गया, बल्कि जेन जेड यानी नई पीढ़ी की हताशा और असंतोष का डिजिटल मंच बन गया है। पार्टी की टैगलाइन वॉइस ऑफ द लेजी एंड अनम्प्लॉयड और सेक्युलर –सोशलिस्ट –डेमोक्रेटिक–लेज़ी जैसे नारे इंटरनेट पर तेजी से वायरल हुए। कई विश्लेषक मान रहे हैं कि यह ट्रेंड भारत में बढ़ती बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, सोशल मीडिया सेंसरशिप और राजनीतिक निराशा से जुड़ी भावनाओं को व्यक्त कर रहा है। सीजेपी के समर्थक इसे मीम आधारित राजनीतिक प्रतिरोध बता रहे हैं। सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर कुछ ही दिनों में लाखों लोग इससे जुड़ गए। कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि इसके फॉलोअर्स की संख्या बेहद तेजी से बढ़ी और यह ट्रेंडिंग राजनीतिक मीम आंदोलन बन गया।
इस विषय पर विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों में राजनीतिक चर्चा और बहस भी तेज हुई। कुछ विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे युवाओं की नई डिजिटल राजनीति कहा, जबकि भाजपा समर्थक समूहों ने इसे संगठित ऑनलाइन नैरेटिव और राजनीतिक अभियान करार दिया। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि “कोकरोच जनता पार्टी” भविष्य में क्या वास्तविक राजनीतिक दल बनेगा? यानी औपचारिक राजनीतिक दल बनेगी या नहीं। फिलहाल इसे अधिकतर लोग एक व्यंग्यात्मक, मीम-आधारित और डिजिटल आंदोलन के रूप में देख रहे हैं। इसके संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी कई जगह कहा कि यह युवाओं की आवाज़ और राजनीतिक संवाद का मंच है।
वर्तमान चर्चाओं का केंद्र यह है कि क्या भारत की युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीति से निराश हो चुकी है? क्या सोशल मीडिया मीम अब राजनीतिक आंदोलन का रूप ले रहे हैं? क्या यह केवल ट्रेंड है या भविष्य की नई डिजिटल राजनीति का संकेत है? कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कोकरोच जनता पार्टी भले ही व्यंग्य से शुरू हुई हो, लेकिन उसने देश में युवाओं की मानसिक स्थिति, असंतोष और इंटरनेट-आधारित राजनीतिक संस्कृति को उजागर कर दिया है। भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे समाज की मानसिकता, प्रवृत्तियों और समय की विडंबनाओं का भी प्रतिबिंब बन जाते हैं। इसी संदर्भ में यदि कोकरोच जनता पार्टी की कल्पना की जाए, तो यह केवल एक काल्पनिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक संस्कृति पर तीखा व्यंग्य प्रतीत होती है। जिस प्रकार कोकरोच हर परिस्थिति में जीवित रहने की क्षमता रखता है, उसी प्रकार राजनीति में भी कुछ प्रवृत्तियाँ ऐसी होती हैं जो हर सत्ता परिवर्तन, विचारधारा और जनभावना के बीच स्वयं को बचाए रखती हैं।
कोकरोच जनता पार्टी का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में एक ऐसी व्यवस्था की तस्वीर उभरती है जो आलोचना, विरोध, भ्रष्टाचार के आरोप और जनता की नाराजगी के बावजूद समाप्त नहीं होती। यह दल किसी एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि अवसरवाद, सत्ता-लोलुपता और राजनीतिक अनुकूलन क्षमता का प्रतीक बन जाता है। भारतीय राजनीति में अक्सर देखा गया है कि चुनावों के समय नेता दल बदलते हैं, पुराने सिद्धांत भूल जाते हैं और नई विचारधारा को अपनाने में देर नहीं लगाते। व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाए तो कोकरोच जनता पार्टी ऐसे ही नेताओं का मंच हो सकती है, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता परिस्थितियों के अनुसार रंग बदलना हो। इनके लिए न तो वामपंथ स्थायी है, न दक्षिणपंथ, न समाजवाद और न राष्ट्रवाद; स्थायी है तो केवल सत्ता।
इस काल्पनिक दल की दूसरी विशेषता उसका अद्भुत जीवट होगा। जैसे कोकरोच को समाप्त करना कठिन माना जाता है, वैसे ही राजनीति में कुछ प्रवृत्तियाँ हर घोटाले और जनविरोध के बाद भी नए रूप में लौट आती हैं। जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करती है, नई राजनीति की मांग उठती है, लेकिन कुछ समय बाद वही पुराने चेहरे नए नारों के साथ सामने आ जाते हैं। “कोकरोच जनता पार्टी” इसी राजनीतिक पुनर्जन्म की संस्कृति पर व्यंग्य है। यह पार्टी चुनावी घोषणापत्र में संभवतः ऐसे वादे करेगी जिनका वास्तविकता से कम और भावनाओं से अधिक संबंध होगा। जनता को मुफ्त सुविधाओं, जातीय समीकरणों, धार्मिक भावनाओं और सोशल मीडिया प्रचार के जरिए प्रभावित करना इसका मुख्य हथियार होगा। आधुनिक राजनीति में विचारों की जगह इमेज मैनेजमेंट और नैरेटिव ने ले ली है। इस दृष्टि से यह काल्पनिक दल आज की चुनावी राजनीति की सटीक तस्वीर प्रस्तुत करता है।
सोशल मीडिया के दौर में कोकरोच जनता पार्टी सबसे अधिक सफल दिखाई दे सकती है। कारण यह कि आज सूचना से अधिक भ्रम तेजी से फैलता है। ट्रोल आर्मी, फर्जी वीडियो, आधे-अधूरे तथ्य और भावनात्मक नारों के माध्यम से जनमत को प्रभावित करना आसान हो गया है। इस पार्टी का आईटी सेल शायद तथ्य से अधिक शोर पर भरोसा करेगा।
हालाँकि यह केवल नेताओं पर व्यंग्य नहीं है। कहीं न कहीं यह जनता के व्यवहार पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। लोकतंत्र में वही राजनीति फलती-फूलती है जिसे जनता स्वीकार करती है। यदि मतदाता जाति, धर्म, तात्कालिक लाभ या भावनात्मक नारों से प्रभावित होकर मतदान करता है, तो अवसरवादी राजनीति को बढ़ावा मिलता है। इसलिए कोकरोच जनता पार्टी वास्तव में समाज और राजनीति दोनों की कमजोरियों का संयुक्त प्रतीक बन जाती है।
इसके बावजूद लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि उसमें आत्मसुधार की क्षमता होती है। समय-समय पर जनता ने सत्ता परिवर्तन करके यह दिखाया है कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति मतदाता के पास ही रहती है। इसलिए यह व्यंग्य केवल निराशा का चित्र नहीं, बल्कि चेतावनी भी है कि यदि राजनीति को स्वस्थ बनाना है तो जनता को अधिक जागरूक, तथ्यपरक और उत्तरदायी बनना होगा। अंततः कोकरोच जनता पार्टी कोई वास्तविक दल नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की उन प्रवृत्तियों का प्रतीकात्मक चित्र है जो हर दौर में नए रूप में सामने आती रहती हैं। यह व्यंग्य हमें हँसाता भी है और सोचने पर मजबूर भी करता है कि लोकतंत्र को केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नैतिकता, पारदर्शिता और जन-जवाबदेही से मजबूत बनाया जा सकता है।





