दिलीप कुमार पाठक
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर है जहां हमारे ‘जेन जी’ का सब्र अब पूरी तरह टूट रहा है। अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक ऐसा तूफान आया जिसने बड़े-बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी। इंटरनेट पर खड़े हुए एक डिजिटल आंदोलन ने सिर्फ चार-पांच दिनों के भीतर इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स जोड़ लिए। इस मोर्चे ने देश की दिग्गज राजनीतिक पार्टियों को भी सोशल मीडिया की दौड़ में पीछे छोड़ दिया। यह कोई हंसी-मजाक या मीम नहीं है, बल्कि देश के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं का गुस्सा है, जिसे सरकार अब हल्के में नहीं ले सकती।
जेन जी के इस जुड़ाव का अंदाजा इसी से लगा लीजिए कि आंदोलन की वेबसाइट पर कुछ ही दिनों में दस लाख से ज्यादा लोगों ने अपना नाम लिखवा दिया और पेपर लीक के खिलाफ छह लाख से ज्यादा लोगों ने ऑनलाइन दस्तखत कर दिए। इस पूरे बवाल की चिंगारी सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान भड़की। अदालत में एक केस के दौरान चीफ जस्टिस ने टिप्पणी कर दी कि कुछ बेरोजगार युवा सिस्टम, मीडिया, कानून और आरटीआई के भीतर ‘कॉकरोच’ की तरह घुस जाते हैं और हर किसी पर हमला करने लगते हैं। जब देश भर के जेन जी में इस बात को लेकर गुस्सा फैला तो चीफ जस्टिस को सफाई भी देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत समझा गया और उनका इशारा सभी बेरोजगारों की तरफ नहीं, बल्कि नकली डिग्री वालों और सिस्टम का फायदा उठाने वालों की तरफ था। लेकिन जेन जी इस सफाई से शांत नहीं हुए। उन्होंने इस अपमान को अपनी लाचारी और बेरोजगारी से जोड़कर देखा और सोशल मीडिया पर एक तगड़ा डिजिटल मोर्चा खोल दिया। यह गुस्सा सिर्फ एक बयान से नहीं भड़का है, बल्कि इसके पीछे सालों से जमा हो रही हताशा है।
भारत हर साल करीब अस्सी लाख से ज्यादा ग्रेजुएट्स तैयार करता है वहीँ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट कहती है कि देश के कुल बेरोजगारों में तिरासी प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले जेन जी की है। सबसे डरावनी बात यह है कि ऊंचे पढ़े-लिखे लोगों में बेरोजगारी दर उनतीस प्रतिशत के आसपास है। इसका सीधा मतलब यह है कि डिग्री जितनी बड़ी है, नौकरी की गारंटी उतनी ही कम है। बेरोजगारी का यह तनाव युवाओं को मानसिक रूप से इस कदर तोड़ रहा है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, कुल खुदकुशी के मामलों में बेरोजगारों की हिस्सेदारी जो साल पंचांगबे में सिर्फ एक दशमलव आठ प्रतिशत थी, वह अब बढ़कर नौ दशमलव दो प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है। यह चार सौ ग्यारह प्रतिशत की भयानक बढ़ोतरी है। इसके ऊपर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में पिछले कुछ सालों में दर्जनों बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं या उन्हें रद्द किया गया है। यूपी पुलिस भर्ती, बिहार शिक्षक भर्ती और राजस्थान में रीट जैसी बड़ी परीक्षाओं के बार-बार लीक होने से करोड़ों लोगों का भविष्य अधर में लटक गया है। सालों तक कमरों में बंद रहकर तैयारी करने वाले युवाओं का पैसा, समय और मानसिक संतुलन इस भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है। ऊपर से महंगाई की मार ऐसी है कि खाने-पीने से लेकर पढ़ाई और रहने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। आत्मनिर्भर बनने की उम्र में देश का पढ़ा-लिखा तबका अपने मां-बाप के पैसों पर जीने को मजबूर है।
देश की पैंसठ प्रतिशत आबादी पैंतीस साल से कम उम्र की है। आज का जेन जी चुपचाप अपमान सहकर घर बैठने वाली पीढ़ी नहीं है। वे तकनीक को बेहतर समझते हैं, जब सरकार ने इस बढ़ते डिजिटल प्रभाव को देखकर उनका मुख्य सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक करवाया तो जेन जी ने तुरंत दूसरा मोर्चा खड़ा कर दिया। यह जिद्द और तेवर साफ बताते हैं कि अब उनकी आवाज को दबाना नामुमकिन है। इस पीढ़ी ने व्यवस्था को आईना दिखा दिया है कि तुम भले ही हमें हाशिए पर धकेल दो, हम लड़ना जानते हैं। सरकार को अब यह गहराई से समझना होगा कि करोड़ों लोगों का यह डिजिटल जुड़ाव हवा का रुख मोड़ सकता है। इस गंभीर संकट से निकलने के लिए सरकारों को अब बिना देरी किए कुछ पक्के कदम उठाने होंगे। सबसे पहले पेपर लीक के खिलाफ बने कानून को पूरी ईमानदारी से जमीन पर उतारना होगा। इसके साथ ही यूपीएससी की तर्ज पर सभी राज्यों को एक तय परीक्षा कैलेंडर जारी करना चाहिए। खाली पड़े लाखों सरकारी पदों को तुरंत बिना किसी धांधली के भरा जाना जरूरी है। अगर पेपर लीक, महंगाई और बेरोजगारी पर अब भी ऐसी ठोस नीतियां नहीं बनाई गईं और जेन जी की दिक्कतों को सिर्फ इंटरनेट का एक अस्थाई ट्रेंड समझकर छोड़ दिया गया, तो आने वाले समय में यह शांत आक्रोश सड़कों पर उतरेगा। यह स्थिति किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनेगी क्योंकि आज की इस नई पीढ़ी को अब सिर्फ खोखले वादे नहीं बल्कि इज्ज़त और रोजगार चाहिए।





