प्रो. नीलम महाजन सिंह
जी-7 (G-7) में कनाॅडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं। भारत ने 15-17 जून, 2026 को फ्रांस के एविॅयन-लेस-बेन्स में आयोजित 52वें जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लिया। प्रधान मंत्री नरेंद मोदी, डॉ. एस. जयशंकर व विक्रम मिस्री ने भी सम्मेलन में भाग लिया। यद्यपि कि भारत जी-7 का औपचारिक सदस्य नहीं है, लेकिन भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक विशेष भागीदार के रूप में आमंत्रित किया गया। इसमें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गवर्नेंस, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान केंद्रित किया गया। एविॅयन में जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले जो विशेष राजनेता शामिल थे, वे हैं, कनाॅडा के प्रधान मंत्री मार्क कार्नी, मेज़बान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुॅएल मैक्रॉन, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़, इटली की प्रधान मंत्री जियोर्जिया मेलोनी, जापान की प्रधान मंत्री सनाॅए तकाइची, यूनाइटेड किंगडम के प्रधान मंत्री कीर स्टाॅरमर, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाॅल्ड ट्रम्प, यूरोपीय संघ परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और आयोग की अध्यक्षा उर्सुला वॉन डेर लेयेन। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने ‘आउटरीच नेताओं’ को भी आमंत्रित किया था। भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी, कतर के अमीर तमीम बिन हमद अल थानी, संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ाॅयद अल नाॅहयान और किन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो; विशेष आमंत्रित सदस्य थे। घोषणापत्र की मुख्य बातें वैश्विक शांति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। जी-7 नेताओं ने 2025 में शुरू की गई ‘क्रिटिकल मिनरल्स एक्शन प्लान’ (महत्वपूर्ण खनिज कार्य योजना) को याद करते हुए, देशों की आर्थिक समृद्धि और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की मूल्य श्रृंखलाओं (वैल्यू चेन) की रणनीतिक भूमिका को मान्यता दी, जिसमें डिजिटल और ऊर्जा क्षेत्र भी शामिल हैं। बाज़ार में अत्यधिक केंद्रीकरण, उन संसाधनों से जुड़ी कमज़ोरियों को कम करने की आवश्यकता व मनमाने व्यापार प्रतिबंधों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए, आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और सामूहिक लचीलापन बनाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया। गैर-बाज़ार नीतियों, प्रथाओं तथा आर्थिक दबाव के उपयोग के बारे में गंभीर चिंताएं व्यक्त की गईं, जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों और उनसे संबंधित दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं पर मनमाने निर्यात प्रतिबंध व जवाबी उपाय शामिल हैं। ये सभी आर्थिक सुरक्षा व लचीलेपन को कमज़ोर करते हैं। भाग लेने वाले देश, अहम निर्भरता को कम करने और यह पक्का करने के लिए सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने का वादा किया है, कि आर्थिक निर्भरता का हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिशें या धमकियां नाकाम हो जाएं। ग्लोबल इकॉनमी के फ़ायदे के लिए जी-7 व समान सोच वाले देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अहम भूमिका थी, ताकि उच्चतम क्वालिटी स्टैंडर्ड और पारदर्शिता पर आधारित आपसी फ़ायदे वाली पार्टनरशिप के ज़रिए विविध, मज़बूत और टिकाऊ ‘सप्लाई चेन’ पक्की की जा सके। इसके लिए, अहम खनिजों (critical minerals) के लिए स्टैंडर्ड-आधारित बाज़ारों को बढ़ावा देने वाले जी-7 रोडमैप को फिर से मंज़ूरी दी गई। जी7 की पिछली प्रतिबद्धताओं और 2025 में जी7 की कनाडाई अध्यक्षता के तहत बनाए गए ‘क्रिटिकल मिनरल्स प्रोडक्शन अलायंस’ को आगे बढ़ाते हुए, जी-7 व सहयोगी देशों के भीतरी प्रयासों में तालमेल बिठाने का वादा किया गया। इसका मकसद अहम खनिजों की वैल्यू चेन में विविधता लाने के लिए ज़रूरी प्रोसेसिंग और औद्योगिक क्षमताएं स्थापित करना और विकसित करना है, जिसमें स्थानीय स्तर पर वैल्यू बनाना व इनोवेशन को बढ़ावा देना शामिल है। जी-7 मांग को एक साथ लाकर और सार्वजनिक व निजी सामूहिक वित्तीय क्षमताओं को जुटाकर समन्वित प्रोजेक्ट्स के विकास को बढ़ावा देगा। ऐसा करके, उनका मकसद 2030 तक ‘रेयर अर्थ और परमानेंट मैग्नेट’ के लिए जी-7 व सहयोगी देशों के बाहर के किसी एक सप्लायर पर निर्भरता को काफी हद तक कम करके; 60 प्रतिशत से नीचे लाना है और समय के साथ इसे और कम करते हुए जल्द से जल्द 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखना है। जी-7 ने इन लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति का स्वागत किया, खासकर 2026 की शुरुआत से घोषित उन 195 प्रोजेक्ट्स के ज़रिए, जिनमें जी-7 से अहम खनिजों की वैल्यू चेन में 64 बिलियन यूरो का निवेश (इक्विटी भागीदारी और ऑफ़टेक समझौतों सहित) हुआ है, और रेयर अर्थ व परमानेंट मैग्नेट के लिए औद्योगिक क्षमताएं विकसित करने की संयुक्त योजना के ज़रिए फाइनेंसिंग एक अहम मुद्दा है। विविधता लाने के लिए ज़रूरी औद्योगिक क्षमता (प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग सहित) के विकास के लिए सार्वजनिक और निजी पूंजी को जुटाने की ज़रूरत है, जिसमें इक्विटी निवेश, गारंटी और ऑफ़टेक शामिल हैं। जी-7 ने सप्लाई की सुरक्षा के लिए स्थिर निवेश ढांचे और बाज़ार में पारदर्शिता व मूल्यांकन की बढ़ती ज़रूरत को पहचाना। इससे 2030 से पहले निवेश की कमी को पूरा करने के लिए ज़रूरी खनिजों की वैल्यू चेन में फाइनेंसिंग को बढ़ावा मिल सकता है। इसका मकसद ‘मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंकों’ (MDBs) और डेवलपमेंट पार्टनर्स को ऐसी रणनीतियां बनाने और लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना था, जिनसे जी-7 सदस्यों व समान सोच वाले पार्टनर्स के साथ-साथ विकासशील देशों में भी ग्लोबल माइनिंग स्टैंडर्ड्स को बेहतर बनाया जा सके। यह इंटरनेशनल पार्टनरशिप के प्रति नए नज़रिए का उदाहरण है। ज़्यादा असर सुनिश्चित करने के लिए, जी-7 डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (DFIs) व ‘एक्सपोर्ट क्रेडिट एजेंसियां’ ज़रूरी खनिजों और ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर तालमेल और सहयोग बढ़ाएंगीं। इन नीतियों और तरीकों में ज़रूरत के हिसाब से मज़बूती के पैमाने (resilience criteria), स्टैंडर्ड-आधारित तरीके, पारदर्शिता और ट्रेसिबिलिटी के तरीके शामिल हो सकते हैं। इन उपायों में उनकी ‘प्रभावशीलता व कॉम्पिटिटिवनेस’, पब्लिक फाइनेंस, कुल मिलाकर मैक्रो-इकोनॉमिक स्थितियों और खासकर मिडस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम इंडस्ट्रीज़ पर संभावित असर, साथ ही कुछ न करने की लागत जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। पारदर्शिता व ट्रेसिबिलिटी मुख्य मुद्दे हैं। जी-7 ने सप्लाई चेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने और मज़बूत मार्केट माहौल में ऊंचे स्टैंडर्ड्स का पालन करने, साथ ही ज़रूरी खनिजों की गैर-कानूनी तस्करी से निपटने के लिए मज़बूत पारदर्शिता और ट्रेसिबिलिटी फ्रेमवर्क के महत्व को पहचाना। ‘ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट’ (OECD) और इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के चल रहे काम को मानते हुए, जी-7 ने ऐसे एक जैसे और आपस में जुड़े सिस्टम बनाने की दिशा में काम करने का वादा किया जो कि सभी के हितों के अनुकूल हों व ज़रूरी खनिजों (critical minerals) के स्रोत के बारे में पता लगाने की सुविधा और पारदर्शिता को सुनिश्चित करें। इसकी शुरुआत दो ज़रूरी खनिजों: लिथियम और निकेल के पायलट प्रोजेक्ट से होगी और इसका मकसद प्रतिस्पर्धा को कम किए बिना या बहुत ज़्यादा लागत का बोझ डाले बिना कार्य करना होगा। ग्लोबल कच्चे माल के बाज़ारों और सप्लाई चेन के बारे में जानकारी में पारदर्शिता लाने की दिशा में काम करने का फ़ैसला किया गया, जिसमें साझा एनालिटिकल टूल, मार्केट इंडिकेटर और कीमतों, सप्लाई, मांग और प्रोसेसिंग क्षमता के बारे में बेहतर जानकारी का विकास, स्वैच्छिक और गोपनीय आदान-प्रदान और प्रकाशन शामिल है। इस काम को आगे बढ़ाने में डेटा की अहम भूमिका है। इन लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए, जी-7 नीचे दिए गए प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो ओ.इ.सी.डी. (OECD) व आई.ई.ऐ. (IEA) के ‘क्रिटिकल मिनरल्स सिक्योरिटी प्रोग्राम’ में मौजूदा काम और क्षमताओं को एक साथ लाता है, जिसमें व्यवसायों के साथ व्यवस्थित बातचीत भी शामिल है। इसके अलावा, सप्लाई की सुरक्षा और बाज़ार की स्थिरता को बेहतर बनाने में ‘स्टॉकपाइलिंग’ (भंडारण) की अहम भूमिका हो सकती है। जी-7 ने औद्योगिक या सार्वजनिक क्षेत्र में ज़रूरी खनिजों के भंडारण के लिए घरेलू क्षमताएं विकसित करने और बढ़ाने का वादा किया, जहाँ भी यह हमारी संबंधित अर्थव्यवस्थाओं, व्यापार और राष्ट्रीय और सामूहिक सुरक्षा के लिए उचित हो, जिसमें मौजूदा पहलें भी शामिल हैं। आई.ई.ऐ. (IEA) के ‘क्रिटिकल मिनरल्स सिक्योरिटी प्रोग्राम’ और जापान ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर मेटल्स एंड एनर्जी सिक्योरिटी (JOGMEC) जैसे संबंधित संस्थानों और पहलुओं की विशेषज्ञता का लाभ उठाने पर ज़ोर दिया गया। इस बात पर भरोसा करते हुए कि ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ और सब्स्टिट्यूशन (विकल्प का इस्तेमाल) ज़रूरी खनिजों की बढ़ती मांग को पूरा करने व उनकी सप्लाई सुरक्षित करने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने में अहम हैं। जी-7 ने ज़रूरी खनिजों से भरपूर उत्पादों और पुर्ज़ों के कुशल डिज़ाइन, दोबारा इस्तेमाल, मरम्मत और रीमैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के महत्व को पहचाना। जी-7 नेताओं ने घोषणा की, “हम रीसाइकिल किए गए ज़रूरी खनिजों की सप्लाई और मांग दोनों का समर्थन करके और रीसाइकिल किए गए कंटेंट की ज़रूरतों जैसे आर्थिक और रेगुलेटरी प्रोत्साहन के ज़रिए कुशल और प्रतिस्पर्धी सेकेंडरी कच्चे माल के बाज़ार स्थापित करके ज़रूरी खनिजों की ‘रीसाइक्लिंग’ को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगें।” भरोसेमंद साझेदारों के बीच रीसाइकिल करने लायक सामग्रियों में बचे हुए ज़रूरी खनिजों और उनसे जुड़े बाॅय-प्रोडक्ट तत्वों के लिए खदान के कचरे और टेलिंग्स की रीप्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग को मज़बूत करने के लिए तकनीकी इनोवेशन बहुत ज़रूरी हैं। ‘क्रिटिकल मिनरल्स एंड मैटेरियल्स’ पर होने वाली कॉन्फ्रेंस अहम होगी। जी-7 ने प्रगति की निगरानी और मूल्यांकन करने के वादे के साथ ज़रूरी कच्चे माल के लिए रीसाइक्लिंग दरों में तेज़ी से बढ़ोतरी पर ध्यान केंद्रित किया। ‘क्रिटिकल मिनरल्स रेज़िलिएंस एंड प्रोडक्शन अलायंस’ जी-7 2026 का मुख्य हिस्सा था। इन लक्ष्यों को पाने और अपनी कोशिशों में लंबे समय तक तालमेल बनाए रखने के लिए, एक गैर-बाध्यकारी ‘जी-7 क्रिटिकल मिनरल्स रेज़िलिएंस एंड प्रोडक्शन अलायंस’ बनाया गया है, जिसकी शर्तें इस घोषणा-पत्र के साथ जुड़ी हुई हैं। यह पहल पहले से मौजूद ‘क्रिटिकल मिनरल्स प्रोडक्शन अलायंस’ पर आधारित है और इसमें शामिल देशों की मंज़ूरी से समान सोच वाले साझेदार भी शामिल हो सकेंगे। यह अलायंस जी-7 और साझेदार देशों के बीच सहयोग के लिए एक व्यापक मंच देता है, ताकि ज़रूरी खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की वैल्यू चेन में विविधता और मज़बूती लाई जा सके और ज़रूरी कच्चे माल से जुड़ी मौजूदा पहलों को बेहतर बनाया जा सके। ‘क्रिटिकल मिनरल्स रेज़िलिएंस एंड प्रोडक्शन अलायंस’ को लागू करने में मदद के लिए, ‘जी-7 क्रिटिकल मिनरल्स कोऑपरेशन’ के लिए एक जी7 मंच बनाया जाएगा। यह मंच जी-7 और अन्य सदस्यों के साथ मिलकर चर्चा को आसान बनाएगा, डेटा-आधारित फ़ैसले लेने में मदद करेगा और सदस्यों के बीच तालमेल बढ़ाएगा। यह मंच ज़रूरत पड़ने पर IEA के ‘क्रिटिकल मिनरल सिक्योरिटी प्रोग्राम’ और OECD से सलाह लेगा। इसका मकसद बाज़ार में हो रहे बदलावों और सप्लाई चेन की कमज़ोरियों का विश्लेषण और डेटा-आधारित ऑकलन करना, स्टॉक के बारे में जानकारी साझा करना, आपातकालीन अभ्यास करना और फ़ाइनेंसिंग, विविधता और पारदर्शिता से जुड़े वादों पर हुई प्रगति की निगरानी करना होगा। जी-7 2026 का घोषणा-पत्र सदस्यों के बीच हुई चर्चा का नतीजा है, जिसमें साझेदार देशों के साथ विचारों के सार्थक आदान-प्रदान से फ़ायदा मिला है। शांति और आर्थिक विकास के लिए बातचीत और वैश्विक एकता का आदान-प्रदान ज़रूरी है। नफ़रत और युद्ध के दौर में, जी-7 शिखर सम्मेलन का घोषणा-पत्र सूखी रेत पर बारिश की बूंद की तरह है। अब यह देखना बाकी है कि इस घोषणा-पत्र का कितना हिस्सा असल में लागू किया जाता है।
प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिकविश्लेषक, दूरदर्शन न्यूज़ पर्सनैलिटी, मानवाधिकार संरक्षण सॉलिसिटर व परोपकारक )





