अपने दल से अलग क्यों जा रहे सांसद

Why are MPs leaving their parties?

सुरेश हिंदुस्तानी

राजनीति में अवसर की तलाश करना आज के राजनेताओं का प्रिय विषय बनता जा रहा है। सीधे शब्दों इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि राजनीति अब सेवा का मार्ग न होकर अवसरवादिता के आवरण को ओढ़ चुकी है। विपक्षी दलों खास कर तृणमूल कांग्रेस और अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सांसदों का अलग होना कहीं न कहीं यही संकेत करता है कि ये सांसद अपने पार्टी के सिद्धांतों से किसी भी प्रकार का कोई सरोकार नहीं रखते थे, लिहाजा उन्होंने अपना खुद का एक राजनीतिक पाला बना लिया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही माना जा रहा है कि अब विपक्ष की संभावनाएं धूमिल होती दिखाई दे रही हैं। विपक्ष की राजनीति का एक ही मुद्दा रह गया है, वह है आरोप की राजनीति। तुम आरोप लगाते रहो, हम काम करते जाएंगे। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कुछ इसी प्रकार का खेल चल रहा है। यह बात सच है कि केवल आरोप लगाने की राजनीति के माध्यम से सत्ता का सिंहासन प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय हित और जनहित की ओर जाना ही होगा। आज की राजनीतिक स्थिति का विचार किया जाए तो यह कहना उचित ही होगा कि भाजपा का प्रचार सत्ता पक्ष की ओर से कम विपक्ष की ओर से ज्यादा किया जा रहा है। आज विपक्ष के नेताओं के बयान बिना भाजपा के अधूरे ही रहते हैं।

राजनीति में कब क्या हो जाए, कोई भी व्यक्त नहीं कर सकता। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि आज का राजनेता किसी न किसी हेतु के लिए ही राजनीति कर रहा है, ऐसे राजनेता की न तो किसी दल से वैचारिक समानता होती है और न ही किसी राजनीतिक नेतृत्व के प्रति निष्ठा ही रहती है। ऐसे राजनेता अपने स्वार्थ को पूरा करने के अवसर की तलाश करते हैं। वर्तमान में विपक्षी राजनीतिक दलों के जो सांसद अपने दलों को छोड़ रहे हैं या छोड़ने का मन बना रहे हैं, वे अब शायद यह समझने लगे हैं कि उनका भविष्य अपने दल के साथ सुरक्षित नहीं है। इसका कारण यही है कि भारत की जनता को भारत के विकास की राजनीति पसंद आने लगी है। दूसरा बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि भाजपा की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है। विपक्ष के राजनीतिक दल पूरा जोर लगाने के बाद भी पराजित होते जा रहे हैं। भविष्य में इनको सफलता मिलेगी, इसकी फिलहाल कोई गुंजाईश भी नहीं है।

वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस के कई विधायक और सांसद ममता बनर्जी का साथ छोड़कर अलग राह पर जा चुके हैं। इससे ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत भी बेअसर हो गई है। और इसी कारण उनकी पार्टी आज एक डूबता हुआ जहाज की परिकल्पना को चरितार्थ करती हुई दिखाई दे रही है। कहा जाता कि जब किसी के ताकत होती है, तो उसके पास अनेक लोग खड़े हो जाते हैं, और उसके शक्तिहीन होने पर कभी खास बनने वाले लोग भी दूरी बना लेते हैं। विपक्ष की राजनीति के लिए सबसे ज्यादा चिंता करने वाली बात यह है कि विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए एक समय ताल ठोकने वाली ममता बनर्जी के पास अब पहले जैसा रुतबा नहीं होगा और न ही विपक्ष में उनकी बात को कोई तबज्जो मिलेगा। इतना ही नहीं एक समय कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ मुखर होने वाली ममता के लिए अब कांग्रेस के नेतृत्व में राजनीति करने की मज़बूरी बन गई है, जो ममता बनर्जी को न तो पहले स्वीकार था और न ही वे अब स्वीकार करेंगी।

जहाँ तक तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की पार्टी के सांसदों के अपने दल से बागी होने की बात है तो यह कहना समीचीन ही होगा कि आज के राजनीतिक परिदृश्य में विपक्ष के भविष्य की संभावनाओं पर एक बहुत बड़ा विराम सा लगा हुआ दिखाई देता है। विपक्ष के राजनीतिक दल किसके नेतृत्व में एक होंगे, यह बड़ा सवाल है। जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों के वे नेता जो हाँ में हाँ मिलाते हुए राजनीति करते थे वे अब प्रासंगिक होने लगे हैं। इनका प्रासंगिक होना ही विपक्षी एकता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। क्योंकि शक्ति केंद्र एक स्थान पर होता है तो उसकी बात का महत्त्व होता है, लेकिन यही शक्ति जब विभाजित हो जाती है, तब वह शक्तिहीन की श्रेणी में ही आती है। आज विपक्ष के राजनीतिक दल किसी एक दल के नेतृत्व में आने के लिए तैयार नहीं हैं। जहाँ तक क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व की बात है तो वह कम से कम अपने प्रभाव क्षेत्र वाले राज्य में किसी दूसरे दल को अपने ऊपर प्रभावी होने नहीं देगा।

वर्तमान राजनीति का अध्ययन किया जाए तो विपक्ष की राजनीति में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का ही बोलबाला है। विपक्ष की ओर ये दोनों दल ही प्रभावी अस्तित्व में हैं। लेकिन कांग्रेस की नियति ऐसी हो गई है कि वह बिना किसी सहारे के आगे नहीं बढ़ सकती। उसको हमेशा क्षेत्रीय दलों की बैसाखी चाहिए। मुख्य बात यह है कि क्षेत्रीय दलों के पास स्वयं की ताकत ख़त्म होती जा रही है। जहाँ तक समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव की बात है तो वह पारिवारिक पृष्ठभूमि से बने राजनेता होने के कारण केवल उत्तरप्रदेश की राजनीति तक ही सीमित हैं। यह बात सही है कि उत्तरप्रदेश में बिना समाजवादी पार्टी के कोई गठबंधन हो ही नहीं सकता। अगर होगा भी तो उसकी प्रासंगिकता नहीं के बराबर ही होगी।

विपक्ष के सपने को तार तार करने के लिए कौन जिम्मेदार है? उद्धव ठाकरे की पार्टी के सांसद यह कहते हुए अलग हुए हैं कि ठाकरे की पार्टी अपनी विचारधारा से भटक गई है। यह बात शत प्रतिशत सही भी है। इसलिए जो नेता विचार की राजनीति के सहारे चल रहा था, उसको तालमेल बनाने में असहज ही होगा। इसके अलावा विपक्ष की पूरी राजनीति तुष्टिकरण को ज्यादा महत्त्व देने की रही है। यह विचार राष्ट्रीय राजनीति के लिए अत्यंत घातक है। आज देश को सकारात्मक राजनीति की आवश्यकता है। देश की जनता भी ऐसा ही चाहती है। इसलिए विपक्षी दलों को जन भावनाओं के अनुसार ही चिंतन और मंथन करना होगा। अगर ऐसा करते हैं तो उनको भविष्य के सपने बुनने का भी अधिकार है। और इस पर ध्यान नहीं दिया तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब पूरी पार्टी में केवल कुछ ही नेता बचेंगे।