भारत को खनिज संरक्षण और सतत विकास का वैश्विक मॉडल बनने की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता

India needs to take concrete steps towards becoming a global model for mineral conservation and sustainable development

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

वैश्विक स्तरपर भारत प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक रहा है। रेत, मुरुम, गिट्टी, पत्थर, मिट्टी और अन्य गौण खनिजों ने न केवल देश के निर्माण क्षेत्र को गति दी है बल्कि ग्रामीण और शहरी विकास की आधारशिला भी रखी है।किंतु पिछले कुछ दशकों में जिस तीव्र गति से इन संसाधनों का दोहन हुआ है, उसने एक गंभीर राष्ट्रीय संकट को जन्म दिया है। यह संकट केवल अवैध खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय विनाश, प्रशासनिक भ्रष्टाचार व राजनीतिक संरक्षण का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण राजस्व हानि और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुका है। भारत में खनन गतिविधियों का संचालन मुख्य रूप से खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम,1957 (एमएमडीआर एक्ट) के तहत होता है।मेरा सुझाव है कि इसमें प्रशासनिक तंत्र, स्थानीय प्रभावशाली तत्वों,खनन माफिया और राजनीतिक संरक्षण के खिलाफ़ विशेष कठोर प्रावधान के उल्लेख की आवश्यकता है,क्योंकि अवैध खनन प्राय इन्हीं लोगों के इशारों या सलंग्नता में होता है यानें शासन प्रशासन व इस वर्ग के साथ यह खेला सुचारू रूप से चलता है। यह प्राय सभी लोगों को मालूम है लेकिन सभ मूक रहते हैं। बता दूं क़ि इस कानून के अनुसार गौण खनिजों के नियमन और प्रबंधन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई है। राज्यों को अधिकार दिए गए कि वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नियम बनाएं,पट्टे जारी करें, रॉयल्टी निर्धारित करें तथा अवैध उत्खनन पर कार्रवाई करें।सिद्धांत रूप से यह व्यवस्था अत्यंत प्रभावी दिखाई देती है,किंतु व्यवहार में अनेक राज्यों में स्थिति चिंताजनक है। कानून मजबूत हैं,नियम पर्याप्त हैं, दिशा निर्देश मौजूद हैं,लेकिन क्रियान्वयन अक्सर कमजोर पड़ जाता है।यही वह स्थान है जहां प्रशासनिक तंत्र, स्थानीय प्रभावशाली तत्वों,खनन माफिया और राजनीतिक संरक्षण के आरोप सामने आते हैं।देश के लगभग हर राज्य में समय-समय पर अवैध रेत खनन,नदी घाटों से चोरी, पहाड़ियों की कटाई और वन क्षेत्रों में अवैध उत्खनन की खबरें सामने आती रही हैं। कई मामलों में स्थानीय नागरिकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ईमानदार अधिकारियों ने इसका विरोध किया, लेकिन उन्हें दबाव, धमकियों और हिंसा तक का सामना करना पड़ा अभी हाल ही में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक नायब तहसीलदार पर हमला इसी मामले की कड़ी है,यह स्थिति दर्शाती है कि अवैध खनन केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि कानून के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए भी चुनौती बन चुका है।

साथियों, महाराष्ट्र विधानसभा में गुरुवार 25 जून 2026 को राजस्व मंत्री द्वारा प्रस्तुत जानकारी महाराष्ट्र विधानमंडल के पावसाळी अधिवेशन (मानसून सेशन 2026) के चौथे दिन,विधानसभा में चर्चा के दौरान उन्होंने आधिकारिक घोषणाएं कीं और सीधे विधानसभा से लाइव आकर भी इसकी जानकारी साझा की, राज्य में हो रहे अवैध गौण खनिज उत्खनन को रोकने और अपराधियों पर मकोका/ एमपीडीए जैसी सख्त कार्रवाई के लिए एक स्वतंत्र ‘टास्क फोर्स’ का गठन कियाजाएगा इसी व्यापक राष्ट्रीय समस्या की ओर संकेत करती है।सरकार ने स्पष्ट कहा कि अवैध खनन में लिप्त अधिकारियों के विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच की जाएगी। संयुक्त उड़नदस्ते बनाए जाएंगे,ड्रोन तकनीक का उपयोग होगा,अवैध परिवहन करने वाले वाहनों को जब्त किया जाएगा तथा जिलाधिकारियों को व्यापक अधिकार दिए जाएंगे। यह नीति और दृष्टिकोण निश्चित रूप से सराहनीय है। किंतु बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन आदेशों का धरातल पर कठोर और निरंतर क्रियान्वयन हो पाएगा ? क्योंकि भारत में समस्या कानूनों की कमी नहीं,बल्कि उनके निष्पक्ष और सटीकता से प्रभावी पालन की है।

साथियों, अवैध खनन का सबसे पहला और सबसे गंभीर प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। जब नदियों से अनियंत्रित मात्रा में रेत निकाली जाती है, तो नदी की प्राकृतिक संरचना बिगड़ जाती है। नदी का तल गहरा होने लगता है, जलधारण क्षमता प्रभावित होती है और आसपास के भूजल स्तर में गिरावट आने लगती है। परिणामस्वरूप कुएं, हैंडपंप और बोरवेल सूखने लगते हैं। कई क्षेत्रों में किसानों को सिंचाई संकट का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार कुछ लोगों के अल्पकालिक आर्थिकr लाभ के कारण संपूर्ण क्षेत्र का जल संतुलन बिगड़ जाता है।रेत केवल निर्माण सामग्री नहीं है;यह नदियों केपारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग है। रेत नदी के प्रवाह को नियंत्रित करती है, तटों को स्थिर रखती है तथा अनेक जलीय जीवों के लिए आवास का कार्य करती है। जब इसका अत्यधिक उत्खनन होता है, तो नदी किनारों का कटाव बढ़ जाता है। कई स्थानों पर पुलों की नींव कमजोर हुई है, सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं और नदी तटों पर बसे गांवों को खतरा उत्पन्न हुआ है। यह समस्या केवल वर्तमान की नहीं, बल्कि आने वाले दशकों तक प्रभाव डालने वाली बहुत गंभीर समस्या है।

साथियों अवैध खनन का दूसरा बड़ा प्रभाव जैव विविधता पर पड़ता है। नदी, पहाड़, वन और मिट्टी केवल खनिजों के भंडार नहीं हैं बल्कि हजारों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का घर हैं। जब बड़े पैमाने पर उत्खनन होता है, तो प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं। पक्षियों के घोंसले,मछलियों के प्रजनन क्षेत्र,वन्यजीवों के आवागमन मार्ग और वनस्पतियों की प्राकृतिक श्रृंखला प्रभावित होती है। पर्यावरण वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो कई स्थानीय प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं।भूमि क्षरण भी अवैध खनन की एक गंभीर समस्या है। जब पहाड़ियों और कृषि भूमि के आसपास बिना वैज्ञानिक अध्ययन के खनन किया जाता है, तो मिट्टी की उर्वरता घटती है। भूमि कटाव बढ़ता है और कई बार खेती योग्य क्षेत्र बंजर बन जाते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जो कृषि पर आधारित है, धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। इसका सीधा प्रभाव किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार पर पड़ता है।

साथियों, अवैध खनन का संबंध जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ता जा रहा है। बड़े पैमाने पर भूमि विनाश, वन कटाई और पारिस्थितिक असंतुलन के कारण कार्बन अवशोषण की प्राकृतिक क्षमता घटती है। नदियों और जल स्रोतों के क्षरण से सूखे और बाढ़ जैसी चरम घटनाओं का खतरा बढ़ता है। आज भारत पहले ही जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में अवैध खनन स्थिति को और अधिक जटिल बना सकता है।आर्थिक दृष्टि से भी यह एक राष्ट्रीय नुकसान है।अवैध खनन से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी और कर राजस्व का बड़ा हिस्सा चोरी हो जाता है।जो धन सार्वजनिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और जल परियोजनाओं में लगना चाहिए,वह कुछ लोगों की निजी संपत्ति में परिवर्तित हो जाता है।इस प्रकार अवैध खनन केवल पर्यावरण की चोरी नहीं बल्कि जनता केअधिकारों और सरकारी राजस्व की भी चोरी है।अक्सर देखा गया है कि अवैध खनन का नेटवर्क बहुत संगठित होता है। इसमें स्थानीय स्तर से लेकर बड़े आर्थिक हित जुड़े हो सकते हैं। कई बार रात के अंधेरे में नदी घाटों से रेत निकाली जाती है, नकली दस्तावेजों के माध्यम से परिवहन किया जाता है और बाजार में बेचा जाता है। यदि इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक निगरानी कमजोर हो या कुछ अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंद लें, तो अवैध कारोबार फलता-फूलता रहता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ केवल दंडात्मक कार्रवाई ही नहीं बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने पर भी सटीकता से जोर देते हैं।

साथियों महाराष्ट्र सरकार द्वारा ड्रोन निगरानी, संयुक्त जांच दल, ऑनलाइन मॉनिटरिंग और जिलाधिकारियों को विशेष अधिकार देने जैसी पहलें इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। आधुनिक तकनीक भ्रष्टाचार और मानव हस्तक्षेप को कम कर सकती है। ड्रोन सर्वेक्षण से वास्तविक उत्खनन क्षेत्र की निगरानी संभव है। जीपीएस आधारित वाहन ट्रैकिंग, ई-परमिट प्रणाली और उपग्रह चित्रों का उपयोग अवैध गतिविधियों को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। किंतु तकनीक तभी सफल होगी जब उसके साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ईमानदारी भी सटीकता से जुड़ी हो।

साथियों, इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अंतरपीढ़ी न्याय अर्थात इंटरजनरेशनल जस्टिस है। पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं। इन पर आने वाली पीढ़ियों का भी समान अधिकार है। यदि वर्तमान पीढ़ी लालच, भ्रष्टाचार और अल्पकालिक लाभ के कारण प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त कर देगी, तो भविष्य की पीढ़ियों के पास क्या बचेगा? उन्हें स्वच्छ नदियां,उपजाऊ भूमि,स्थिर पर्यावरण और पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराना हमारी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है। कल्पना कीजिए कि यदि अगले 20 से 30 वर्षों तक वर्तमान गति से अवैध खनन चलता रहा तो कई नदियां अपने प्राकृतिक स्वरूप को खो सकती हैं।भूजल संकट और गहरा हो सकता है। निर्माण उद्योग के लिए आवश्यक खनिजों की कमी पैदा हो सकती है। पर्यावरणीय आपदाएं बढ़ सकती हैं। किसानों, मछुआरों और ग्रामीण समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी होगा।
साथियों, समाधान केवल सरकार के पास नहीं है। नागरिक समाज, मीडिया, न्यायपालिका, स्थानीय समुदाय और जनप्रतिनिधियों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। प्रत्येक खनन पट्टे की जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होनी चाहिए। ग्राम सभाओं को निगरानी में शामिल किया जाना चाहिए। अवैध खनन की सूचना देने वालों को सुरक्षा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। पर्यावरणीय क्षति का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर दोषियों से वास्तविक क्षतिपूर्ति वसूली जानी चाहिए।साथ ही विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।वास्तव में अवैध खनन का प्रश्न केवल रेत,मुरुम या पत्थर का प्रश्न नहीं है। यह सुशासन,पर्यावरणीय न्याय,कानून के शासन और राष्ट्र के भविष्य का प्रश्न है। यदि कानूनों का कठोरता से पालन हो, तकनीक का प्रभावी उपयोग हो, दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई हो और राजनीतिक इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। लेकिन यदि मिलीभगत, भ्रष्टाचार और संरक्षण का चक्र चलता रहा, तो प्राकृतिक संसाधनों की यह लूट आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसे संकट को जन्म दे सकती है जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगेकि आज आवश्यकता केवल अवैध खनन रोकने की नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के प्रति राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने की है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करना ही वास्तविक प्रगति है। अन्यथा अल्पकालिक लाभ के लिए किया गया यह अंधाधुंध दोहन भविष्य में जल, भूमि, जैव विविधता और खनिज संसाधनों के ऐसे संकट को जन्म देगा, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। यही समय है जब भारत को खनिज संपन्न राष्ट्र से आगे बढ़कर “खनिज संरक्षण और सतत विकास का वैश्विक मॉडल” बनने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।