संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में गूंजा भारत का जलवायु-अनुकूल कृषि मॉडल

India's climate-friendly agriculture model resonates at the UN Human Rights Council

डॉ. अरविंद कुमार ने कहा—खाद्य प्रणाली में बदलाव मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अनिवार्य

रविवार दिल्ली नेटवर्क

नई दिल्ली/जिनेवा : जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्य सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच गहरे संबंधों पर भारत की मजबूत पहल को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के 62वें सत्र में प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर इंडिया वाटर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. अरविंद कुमार ने कहा कि वैश्विक खाद्य प्रणाली में परिवर्तन केवल कृषि क्षेत्र की आवश्यकता नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए भी अनिवार्य है।

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण पर आयोजित विशेष संवाद (इंटरैक्टिव डायलॉग) को संबोधित करते हुए डॉ. कुमार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और खाद्य असुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए संकट हैं। इनमें से किसी एक समस्या का समाधान दूसरे को संबोधित किए बिना संभव नहीं है। इसलिए खाद्य प्रणाली को अधिक टिकाऊ, समावेशी और जलवायु-अनुकूल बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि बढ़ता तापमान, सूखा, बाढ़ और अन्य चरम मौसमीय घटनाएँ वैश्विक खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। इसके कारण फसलों की उत्पादकता घट रही है, पशुपालन पर दबाव बढ़ रहा है, आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो रही है और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो रही है। इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य को भी प्रभावित कर रहा है, जिससे दुनिया भर में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

डॉ. अरविंद कुमार ने इस चुनौती से निपटने के लिए भारत द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने ऐसी जलवायु-अनुकूल फसल किस्में विकसित की हैं, जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं। इससे न केवल किसानों की जलवायु संबंधी जोखिमों से मुकाबला करने की क्षमता बढ़ी है, बल्कि पोषण सुरक्षा को भी मजबूती मिली है।

उन्होंने वर्ष 2024 में भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह मिशन पारिस्थितिकी आधारित कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ खेती और किसानों की आजीविका को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

डॉ. कुमार ने कहा कि इंडिया वाटर फाउंडेशन वैश्विक स्तर पर ऐसे प्रयासों का समर्थन करता रहेगा, जिनमें जलवायु कार्रवाई और खाद्य प्रणाली में परिवर्तन के केंद्र में मानवाधिकारों को रखा जाए। उन्होंने इस दिशा में सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) और अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर भी बल दिया।

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र के समानांतर इंडिया वाटर फाउंडेशन की टीम ने जिनेवा के प्रसिद्ध ब्रोकन चेयर स्क्वायर में एक विशेष फोटो प्रदर्शनी का भी आयोजन किया। प्रदर्शनी में स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता (वॉश) तथा सामुदायिक कल्याण के क्षेत्र में भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियों को प्रदर्शित किया गया।

प्रदर्शनी के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि स्वास्थ्य, पोषण तथा स्वच्छ जल और स्वच्छता एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। असुरक्षित पेयजल और खराब स्वच्छता व्यवस्था के कारण डायरिया तथा परजीवी संक्रमण जैसी बीमारियाँ बढ़ती हैं, जो शरीर से आवश्यक पोषक तत्वों की कमी का कारण बनती हैं। ऐसे में केवल पौष्टिक भोजन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि स्वच्छ जल और बेहतर स्वच्छता व्यवस्था भी समान रूप से आवश्यक है।

प्रदर्शनी में यह भी दर्शाया गया कि भारत में स्वास्थ्य, जल, स्वच्छता और पोषण के क्षेत्र में समन्वित निवेश के माध्यम से अधिक स्वस्थ, सशक्त और जलवायु-अनुकूल समुदायों के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है। भारत के इस समग्र विकास मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिल रही है।