अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस : प्लास्टिक बैग से जकड़ी जीवन-शैली से पर्यावरण तबाह

International Plastic Bag Free Day: Environment devastated by a lifestyle shackled to plastic bags

ललित गर्ग

पृथ्वी आज जिस सबसे बड़े पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है, उसमें जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का क्षरण और प्रदूषण के साथ-साथ प्लास्टिक प्रदूषण भी एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुका है। कभी आधुनिक जीवन की सुविधा और विकास का प्रतीक मानी जाने वाली प्लास्टिक आज मानव सभ्यता के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है। विशेष रूप से सिंगल-यूज प्लास्टिक बैग ने हमारी जीवन-शैली को इतना जकड़ लिया है कि उससे मुक्ति के बिना न स्वच्छ पर्यावरण की कल्पना की जा सकती है और न ही स्वस्थ भविष्य की। इसी चिंता को लेकर प्रतिवर्ष 3 जुलाई को ‘अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस’ मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी का दिन है कि यदि अब भी हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

आज विश्व में हर वर्ष लगभग 40 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार इसका एक बड़ा हिस्सा केवल एक बार उपयोग के बाद कचरे में बदल जाता है। अनुमान है कि प्रतिवर्ष लगभग 1.1 से 1.4 करोड़ टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुँच जाता है। यदि यही स्थिति बनी रही तो वर्ष 2050 तक समुद्रों में मछलियों से अधिक प्लास्टिक होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यह केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए भयावह भविष्य का संकेत है। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि प्लास्टिक अब केवल धरती पर बिखरा कचरा नहीं रहा, बल्कि हमारे शरीर का भी हिस्सा बन चुका है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हवा, पानी, भोजन, नमक, दूध, शहद और यहाँ तक कि मानव रक्त, फेफड़ों तथा गर्भनाल में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए जा चुके हैं। एक सामान्य व्यक्ति प्रतिवर्ष हजारों सूक्ष्म प्लास्टिक कण भोजन, पेयजल और साँस के माध्यम से अपने शरीर में पहुँचा रहा है। यह स्थिति कैंसर, हार्मोनल असंतुलन, हृदय रोग, प्रजनन संबंधी समस्याओं और प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी अनेक स्वास्थ्य चुनौतियों को जन्म दे रही है।

आधुनिक जीवनशैली में प्लास्टिक बैग हमारी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। सब्ज़ी और किराने की खरीदारी से लेकर कपड़े, दवाइयाँ, भोजन, ऑनलाइन डिलीवरी, उपहार पैकिंग और घरेलू सामान तक लगभग हर कार्य में प्लास्टिक बैग का उपयोग हो रहा है। सुविधा और सस्तेपन के कारण इनका प्रयोग लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे हमारा जीवन मानो प्लास्टिक की गिरफ्त में आ गया है। एक बार उपयोग के बाद फेंके जाने वाले ये बैग पर्यावरण, जल स्रोतों, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। इसलिए समय की मांग है कि हम कपड़े, जूट या कागज़ के थैलों को अपनाकर प्लास्टिक बैग से मुक्ति का संकल्प लें।

प्लास्टिक केवल मनुष्य के स्वास्थ्य का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पर्यावरण का भी शत्रु है। यह मिट्टी की उर्वरता को कम करता है, जल स्रोतों को प्रदूषित करता है, नालियों को जाम कर शहरी बाढ़ का कारण बनता है तथा पशु-पक्षियों और समुद्री जीवों की असमय मृत्यु का कारण बनता है। गायों के पेट से कई-कई किलो प्लास्टिक निकलने की घटनाएँ अब सामान्य हो गई हैं। समुद्री कछुए, डॉल्फिन, व्हेल और पक्षी प्लास्टिक को भोजन समझकर निगल लेते हैं और धीरे-धीरे मृत्यु का शिकार बन जाते हैं। इस प्रकार प्लास्टिक केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि जीवन के पूरे जैविक तंत्र को नष्ट कर रहा है। विडम्बना यह है कि प्लास्टिक का सबसे बड़ा आकर्षण उसकी सुविधा है और यही सुविधा सबसे बड़ा संकट बन गई है। कुछ मिनटों के उपयोग के लिए बना प्लास्टिक बैग सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होता। जिस वस्तु का उपयोग हम कुछ मिनट करते हैं, उसका दुष्प्रभाव कई पीढ़ियाँ भुगतती हैं। सुविधा की यह संस्कृति वास्तव में विनाश की संस्कृति बनती जा रही है।

भारत में भी प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर चुनौती है। देश में प्रतिदिन हजारों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसका बड़ा भाग खुले में पड़ा रहता है या नदियों एवं समुद्र तक पहुँच जाता है। विभिन्न राज्यों ने सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया है, किन्तु प्रतिबंध का प्रभाव तभी दिखाई देगा जब समाज स्वयं इसके प्रति जागरूक होगा। केवल कानून से आदतें नहीं बदलतीं, उसके लिए सामाजिक चेतना आवश्यक होती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस दिशा में अनेक सकारात्मक पहल की हैं। स्वच्छ भारत अभियान, सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व जैसी नीतियाँ महत्त्वपूर्ण कदम हैं। किंतु इनकी सफलता तभी संभव है जब उद्योग, व्यापार, स्थानीय निकाय और आम नागरिक समान रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाएं।

आज आवश्यकता केवल प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की नहीं, बल्कि जीवनशैली बदलने की है। जब तक हमारी खरीदारी की आदतें नहीं बदलेंगी, तब तक प्लास्टिक का उपयोग कम नहीं होगा। कपड़े या जूट का थैला साथ रखना, पुनः उपयोग योग्य बोतलों और डिब्बों का प्रयोग करना, अनावश्यक पैकेजिंग से बचना तथा स्थानीय स्तर पर पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देना-ये छोटे-छोटे कदम बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। उद्योगों की भी बड़ी जिम्मेदारी है। उत्पादों की पैकेजिंग को पर्यावरण-अनुकूल बनाना, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री का उपयोग करना और प्लास्टिक कचरे के संग्रह एवं पुनर्चक्रण की व्यवस्था सुनिश्चित करना समय की माँग है। केवल लाभ कमाने की मानसिकता से प्रकृति का संरक्षण संभव नहीं है। उद्योगों को ‘ग्रीन बिजनेस’ की दिशा में आगे बढ़ना होगा। शिक्षा संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि विद्यालयों और महाविद्यालयों में पर्यावरणीय जीवनशैली को व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए, बच्चों को कपड़े के थैले उपयोग करने, प्लास्टिक-मुक्त परिसर बनाने और पर्यावरण संरक्षण की गतिविधियों से जोड़ा जाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ अधिक संवेदनशील बनेंगी। पर्यावरण शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तक का विषय नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार बननी चाहिए।

आज पूरी दुनिया ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ की ओर बढ़ रही है, जहाँ उत्पादों का पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और संसाधनों का न्यूनतम दोहन प्रमुख लक्ष्य है। भारत के लिए भी यही भविष्य का मार्ग है। यदि हम पारंपरिक भारतीय जीवन-पद्धति को देखें तो वहाँ कपड़े के झोले, मिट्टी के बर्तन, धातु के पात्र और प्राकृतिक संसाधनों का पुनः उपयोग सामान्य जीवन का हिस्सा थे। आधुनिकता के नाम पर हमने इन्हें छोड़ दिया और प्लास्टिक को अपना लिया। अब समय आ गया है कि आधुनिक विज्ञान और भारतीय परंपरा का समन्वय करते हुए टिकाऊ जीवनशैली अपनाई जाए। यह भी समझना होगा कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल सरकार का विषय नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प ले ले कि वह प्लास्टिक बैग स्वीकार नहीं करेगा, उसी दिन इस समस्या का बड़ा समाधान प्रारम्भ हो जाएगा। बाजार वही वस्तु देता है जिसकी माँग होती है। यदि माँग समाप्त होगी तो आपूर्ति भी स्वतः कम हो जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस हमें केवल प्लास्टिक छोड़ने का संदेश नहीं देता, बल्कि यह प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते को पुनर्जीवित करने का अवसर भी है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। यदि हम इसे सुरक्षित नहीं रख पाए तो विकास के सारे दावे अर्थहीन हो जाएँगे। महात्मा गांधी ने कहा था-‘‘प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक के लालच को नहीं।’’ आज यह कथन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। प्लास्टिक का अनियंत्रित उपयोग हमारी आवश्यकताओं का नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी लालच का परिणाम है।

आइए इस 3 जुलाई को केवल एक दिवस न मानें, बल्कि एक जन-आंदोलन का प्रारंभ करें। अपने घर, परिवार, विद्यालय, कार्यालय और बाजार से प्लास्टिक बैग को विदा करने का संकल्प लें। कपड़े का थैला हमारी पहचान बने, पर्यावरण हमारी प्राथमिकता बने और स्वच्छ पृथ्वी हमारी विरासत बने। जब प्लास्टिक का उपयोग घटेगा, तभी प्रकृति मुस्कुराएगी, जब प्रकृति मुस्कुराएगी, तभी मानवता का भविष्य सुरक्षित होगा। यही अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस का वास्तविक संदेश है और यही हमारे समय का सबसे बड़ा पर्यावरणीय धर्म भी।