मोदी का ‘मिशन 360’: सत्ता के सुपर बहुमत की राजनीति या लोकतंत्र का नया अध्याय?

Modi's 'Mission 360': The politics of a 'super-majority' or a new chapter for democracy?

संसदीय संख्याबल, दल-बदल, संवैधानिक सुधार, विपक्ष की रणनीति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के बीच बदलते भारतीय राजनीतिक परिदृश्य का विश्लेषण।

विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक शब्द तेजी से चर्चा के केंद्र में है – मोदी महामिशन मिशन 360’। यद्यपि भारतीय जनता पार्टी ने इस नाम से किसी आधिकारिक अभियान की घोषणा नहीं की है, फिर भी सत्ता और विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि भाजपा आगामी वर्षों में संसद के दोनों सदनों में ऐसा संख्याबल अर्जित करने की रणनीति पर काम कर रही है,जिससे न केवल राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित हो, बल्कि संवैधानिक एवं नीतिगत सुधारों को भी अपेक्षाकृत सहजता से आगे बढ़ाया जा सके।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल अगले चुनाव की तैयारी नहीं,बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक वर्चस्व की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।वही दूसरी ओर विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चुनौती बताते हुए आरोप लगा रहा है कि सत्ता पक्ष विपक्षी दलों में राजनीतिक सेंध लगाने का प्रयास कर रहा है।सत्य चाहे जो हो,इतना स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति एक नए संक्रमणकाल से गुजर रही है, जहाँ चुनावी जीत के साथ-साथ संसदीय गणित, गठबंधन प्रबंधन और संवैधानिक व्याख्याएँ भी सत्ता की दिशा तय कर रही हैं।भारतीय संविधान किसी भी राजनीतिक दल को व्यापक जनादेश प्राप्त करने से नहीं रोकता।लोकतंत्र का मूल आधार ही जनता का विश्वास है।यदि कोई दल चुनाव जीतकर या वैधानिक गठबंधन के माध्यम से बहुमत प्राप्त करता है तो उसमें कोई असंवैधानिकता नहीं है।किंतु जब बहुमत प्राप्त करने की प्रक्रिया विपक्षी दलों में टूट,निर्वाचित प्रतिनिधियों के दल परिवर्तन अथवा राजनीतिक पुनर्संरेखण के माध्यम से आगे बढ़ती दिखाई देती है,तब लोकतांत्रिक नैतिकता पर बहस स्वाभाविक हो जाती है।यही कारण है कि आज ‘ मोदी महामिशन 360’ केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दिशा को लेकर उठ रहे अनेक प्रश्नों का प्रतीक बन चुका है।

लोकसभा में साधारण बहुमत सरकार चलाने के लिए पर्याप्त होता है,किंतु संविधान संशोधन जैसे विषयों पर विशेष बहुमत आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत अनेक संशोधनों के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए तथा कुछ मामलों में आधे राज्यों की स्वीकृति भी आवश्यक होती है।इसलिए किसी भी सरकार के लिए केवल सत्ता में बने रहना पर्याप्त नहीं, बल्कि संसद में व्यापक संख्याबल भी राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।इसी संदर्भ में राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि महिला आरक्षण कानून के पूर्ण क्रियान्वयन ,परिसीमन,”एक देश– एक चुनाव”,प्रशासनिक सुधार तथा भविष्य के अन्य संवैधानिक विषयों को देखते हुए भाजपा अपनी संसदीय शक्ति को और विस्तृत करना चाहती है।ज्ञायत्व रहे कि भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नया अध्याय नहीं है।वर्ष 1967 में हरियाणा के विधायक गयालाल के बार-बार दल बदलने के बाद “आया राम,गया राम” भारतीय राजनीति का स्थायी मुहावरा बन गया।इसी राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया। बाद में 91वें संविधान संशोधन (2003) ने इसे और कठोर बनाया।

फिर भी पिछले एक दशक की राजनीति ने यह दिखाया कि कानून होने के बावजूद राजनीतिक पुनर्संरचना पूरी तरह नहीं रुकी।सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र रहा। पहले शिवसेना में विभाजन हुआ और बाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो हिस्सों में बंट गई।इन घटनाओं ने केवल सरकार नहीं बदली,बल्कि दल-बदल कानून की व्याख्या, विधानसभा अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिका,निर्वाचन आयोग की शक्तियों तथा सर्वोच्च न्यायालय की सीमाओं पर भी व्यापक बहस छेड़ दी।सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्वाचित जनादेश और संवैधानिक मर्यादा दोनों की रक्षा आवश्यक है, किंतु अनेक परिस्थितियों में अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र से भी जुड़ा रहता है। इससे यह संदेश गया कि आज राजनीतिक लड़ाई केवल विधानसभा या संसद में नहीं, बल्कि न्यायालयों में भी लड़ी जा रही है।मध्य प्रदेश में सरकार परिवर्तन,कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन तथा विभिन्न राज्यों में दल-बदल की घटनाओं ने यह स्थापित किया कि संख्या का खेल अब केवल चुनाव परिणामों से तय नहीं होता, बल्कि चुनाव के बाद की राजनीतिक रणनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी है।पश्चिम बंगाल भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।विधानसभा चुनाव के पहले और बाद में कई नेताओं के दल बदलने की घटनाएँ सामने आईं।कुछ नेता तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए,जबकि बाद में कुछ पुनः वापस लौटे।इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या भारतीय राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता कमजोर हो रही है और चुनावी गणित अधिक प्रभावी बनता जा रहा है।दिल्ली और पंजाब की राजनीति में भी समय-समय पर आम आदमी पार्टी के कुछ सांसदों और नेताओं के संबंध में विभिन्न प्रकार की राजनीतिक अटकलें सामने आती रही हैं।हालाँकि अधिकाँश मामलों में न तो इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि हुई और न ही वे निर्णायक राजनीतिक घटनाक्रम में बदलीं,लेकिन इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि राष्ट्रीय राजनीति में प्रत्येक सांसद और प्रत्येक क्षेत्रीय दल भविष्य के सत्ता समीकरण का संभावित हिस्सा माना जा रहा है।यहीं से ‘ मोदी महामिशन 360’ की चर्चा को बल मिलता है।यदि किसी राजनीतिक दल का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं,बल्कि संसद में इतना व्यापक समर्थन प्राप्त करना हो कि भविष्य के बड़े संवैधानिक एजेंडे को भी आगे बढ़ाया जा सके, तो स्वाभाविक रूप से उसकी रणनीति केवल चुनावी प्रचार तक सीमित नहीं रह सकती।यद्यपि भाजपा इस प्रकार की राजनीतिक चर्चाओं पर सार्वजनिक रूप से संयमित रुख अपनाती रही है,लेकिन विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई,राजनीतिक दबाव और सत्ता के प्रभाव का उपयोग विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है।दूसरी ओर भाजपा का तर्क रहा है कि यदि विपक्ष के नेता स्वयं उसके साथ जुड़ते हैं तो वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही हिस्सा है और जनता अंततः चुनाव में इसका निर्णय करती है।यहीं भारतीय लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है -क्या दल बदलना जनादेश का सम्मान है या जनादेश का पुनर्लेखन?संविधान विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि भारतीय संविधान किसी सांसद या विधायक को आजीवन किसी दल से बंधा रहने का आदेश नहीं देता,किंतु दसवीं अनुसूची का उद्देश्य व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए निर्वाचित जनादेश को बदलने से रोकना अवश्य है।इसलिए यदि कानून की भावना और राजनीतिक व्यवहार के बीच लगातार दूरी बढ़ती है,तो भविष्य में दल-बदल विरोधी कानून की पुर्नसमीक्षा की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।भारतीय राजनीति का मौजूदा दौर केवल सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का नहीं, बल्कि राजनीतिक संगठन क्षमता, नेतृत्व,वैचारिक विस्तार और संसदीय अंकगणित की प्रतिस्पर्धा का भी है।पिछले एक दशक में भाजपा ने स्वयं को केवल एक चुनावी दल के रूप में नहीं,बल्कि देशव्यापी संगठन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।पूर्वोत्तर राज्यों में विस्तार,दक्षिण भारत में बढ़ती राजनीतिक सक्रियता,नए सामाजिक समूहों तक पहुंच और क्षेत्रीय दलों के साथ व्यावहारिक गठबंधन उसकी इसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।यदि ‘ मोदी महामिशन 360′ जैसी कोई सोच वास्तव में अस्तित्व में है,तो उसका आधार केवल विपक्ष को कमजोर करना नहीं,बल्कि पूरे देश में राजनीतिक प्रभाव का विस्तार भी है।इसके विपरीत विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं,बल्कि उसकी अपनी एकजुटता है।विचार धारा, नेतृत्व,क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और चुनावी हितों के कारण विपक्षी दलों के बीच स्थायी समन्वय अभी तक मजबूत नहीं बन सका है।कई राज्यों में जो दल राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगी हैं,वे राज्य स्तर पर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं।ऐसी स्थिति में साझा राजनीतिक रणनीति बनाना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है।राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि यदि कोई सांसद या विधायक बार-बार दल बदलने के लिए तैयार हो जाता है,तो इसका कारण केवल सत्ता पक्ष की रणनीति नहीं होती, बल्कि उसके मूल दल का संगठनात्मक असंतोष ,नेतृत्व संकट अथवा भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी हो सकती है।इसलिए हर राजनीतिक परिवर्तन को केवल “ऑपरेशन” कहकर नहीं समझा जा सकता।कई बार राजनीतिक दलों की आंतरिक कमजोरी भी उसके लिए समान रूप से जिम्मेदार होती है।संविधान विशेषज्ञों का मत है कि भारतीय लोकतंत्र में बहुमत और नैतिकता के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।संविधान सरकार को बहुमत जुटाने से नहीं रोकता,लेकिन वह यह अपेक्षा अवश्य करता है कि बहुमत प्राप्त करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक मर्यादाओं, संवैधानिक मूल्यों और जनादेश की भावना के अनुरूप हो।यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों का लगातार दल परिवर्तन सामान्य राजनीतिक संस्कृति बन जाता है,तो मतदाता का विश्वास कमजोर पड़ सकता है।यही कारण है कि अनेकसंवैधानिक विशेषज्ञ समय-समय पर सुझाव देते रहे हैं कि दल-बदल विरोधी कानून की समीक्षा की जाए।कुछ विशेषज्ञ चाहते हैं कि यदि कोई सांसद या विधायक दल बदलता है तो उसे तत्काल पुनः जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करना चाहिए।वहीं दूसरी ओर कुछ विधि विशेषज्ञों का मत है कि अत्यधिक कठोर कानून निर्वाचित प्रतिनिधियों की वैचारिक स्वतंत्रता को भी प्रभावित कर सकता है।इस प्रकार यह बहस आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।यदि भाजपा भविष्य में संसद में और अधिक मजबूत स्थिति प्राप्त करती है,तो उसके सामने केवल राजनीतिक अवसर ही नहीं,बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी।”एक देश–एक चुनाव”,परिसीमन,महिला आरक्षण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन,न्यायिक एवं प्रशासनिक सुधार जैसे विषय व्यापक राजनीतिक सहमति की मांग करते हैं।केवल संख्याबल पर्याप्त नहीं होता; ऐसे मुद्दों पर लोकतांत्रिक स्वीकार्यता और राजनीतिक संवाद भी उतने ही आवश्यक होते हैं।दूसरी ओर यदि विपक्ष इस दौर को केवल राजनीतिक हमले के रूप में देखने के बजाय अपने संगठनात्मक पुनर्निर्माण का अवसर बनाता है,तो भारतीय लोकतंत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और मजबूत हो सकती है।लोकतंत्र का सौंदर्य सत्ता परिवर्तन की संभावना में निहित है। यदि विपक्ष स्वयं को विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने में सफल होता है,तो लोकतांत्रिक संतुलन स्वतः मजबूत होगा।यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत का मतदाता पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और निर्णायक हो चुका है।वह केवल राजनीतिक नारों से प्रभावित नहीं होता,बल्कि विकास,नेतृत्व,स्थिरता, सामाजिक न्याय,राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय मुद्दों को भी समान महत्व देता है।इसलिए संसद में स्थायी बहुमत का वास्तविक आधार अंततः जनता का निरंतर विश्वास ही होता है,न कि केवल राजनीतिक जोड़-तोड़।आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या भाजपा अपने संगठनात्मक विस्तार को चुनावी सफलता में बदल पाती है,क्या विपक्ष अपनी बिखरी हुई।राजनीतिक शक्ति को संगठित कर पाता है और क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखती हैं।’मिशन 360’ आज भले ही राजनीतिक चर्चाओं और विश्लेषणों का विषय हो,लेकिन इसका वास्तविक परीक्षण संसद के भीतर नहीं,बल्कि जनता की अदालत में होगा।यदि भाजपा अपनी राजनीतिक शक्ति को जनसमर्थन के माध्यम से और विस्तृत करती है,तो वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम होगा।यदि इसके लिए विपक्षी दलों में लगातार टूट ही प्रमुख माध्यम बनती है,तो लोकतांत्रिक नैतिकता पर प्रश्न उठते रहेंगे।इसी प्रकार यदि विपक्ष अपनी कमजोरियों का आत्ममंथन किए बिना हर राजनीतिक परिवर्तन को केवल सत्ता पक्ष की रणनीति बताता रहेगा,तो वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकेगा।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थाएं, संविधान और जागरूक मतदाता हैं।संसद में दो- तिहाई बहुमत किसी भी सरकार को अधिक शक्ति अवश्य दे सकता है,किंतु वह संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। संविधान की आत्मा केवल बहुमत में नहीं,बल्कि उत्तरदायित्व,पारदर्शिता,संस्थागत संतुलन,असहमति के सम्मान और जनादेश की पवित्रता में निहित है।इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि ‘ मोदी महामिशन 360’ सफल होगा या नहीं,बल्कि यह है कि भारत की राजनीति आगे किस दिशा में जाएगी—क्या वह केवल संख्याओं का लोकतंत्र बनेगी,या संवैधानिक मूल्यों,स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और जनविश्वास पर आधारित परिपक्व लोकतंत्र के रूप में और मजबूत होगी?आने वाले वर्षों की राजनीति इसी प्रश्न का उत्तर लिखेगी।