117 नागरिकों की अपील पर क्या रहेगा भारत का रुख ?

What will be India's stance on the appeal by 117 citizens?

अशोक भाटिया

हाल ही में भारत और पाकिस्तान के 117 नागरिकों द्वारा दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों—नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ को लिखा गया संयुक्त पत्र दक्षिण एशिया के राजनीतिक परिदृश्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक हस्तक्षेप है। इस पत्र से माना जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर जब भी भारत अपने हितों की रक्षा के लिए कोई कड़ा और निर्णायक कदम उठाता है, तो उसकी गूँज केवल सीमा पार ही सुनाई नहीं देती। आश्चर्यजनक रूप से, उसकी सबसे तीखी प्रतिक्रिया देश के भीतर बैठे एक विशिष्ट वर्ग से आती है। हाल के दिनों में जब भारत ने पाकिस्तान की ओर जाने वाली अपनी नदियों के पानी पर अपना वैधानिक हक जताते हुए उसे रोकने या मोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाए, तो सीमा पार से अधिक कोहराम भारत के लुटियंस ज़ोन, कुछ खास बौद्धिक गलियारों और स्वघोषित ‘शांति दूतों’ के खेमे में मच गया।

यह स्थिति बरबस ही एक पुरानी कहावत को चरितार्थ करती है—”पानी पाकिस्तान का बंद हुआ है, मगर गला यहाँ के ‘शांति दूतों’ का क्यों सूख रहा है?” यह केवल एक व्यंग्यपूर्ण वाक्य नहीं है, बल्कि यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, कूटनीति और वैचारिक युद्ध (नैरेटिव वॉर) की उस गहरी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जिससे हमारा देश दशकों से जूझ रहा है।

इस पूरे विवाद की जड़ को समझने के लिए हमें सबसे पहले भारत के जल कूटनीति के रुख को देखना होगा। 1960 में हुई सिंधु जल संधि दुनिया के इतिहास में सबसे उदार संधियों में से एक मानी जाती है। इस संधि के तहत भारत ने अपनी विशालकाय नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) का लगभग 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान को दे दिया, जबकि खुद के लिए केवल पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) का पानी रखा।

दशकों तक पाकिस्तान ने भारत की इस उदारता का जवाब पीठ में छुरा घोंपकर दिया। सीमा पार से आतंकवाद, घुसपैठ, और कश्मीर में अस्थिरता फैलाना पाकिस्तान की घोषित नीति बन गया। भारत सरकार ने अब ‘अमन की आशा’ के छलावे से बाहर निकलते हुए रणनीतिक बदलाव किया है। शाहपुर कंडी बांध परियोजना जैसी योजनाओं के माध्यम से रावी नदी का जो पानी तकनीकी खामियों या बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बहकर पाकिस्तान जा रहा था, उसे पूरी तरह रोककर जम्मू-कश्मीर और पंजाब के खेतों की तरफ मोड़ दिया गया है। भारत का यह संदेश साफ है: “रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकते।”

जब पाकिस्तान को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसाने की कूटनीति शुरू हुई, तो देश के भीतर एक खास तबके की छटपटाहट देखने लायक थी। इस वर्ग में कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी, चुनिंदा मानवाधिकार कार्यकर्ता, लुटियंस मीडिया के पत्रकार और तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले नेता शामिल हैं। इन्हें ही जनमानस में ‘शांति दूत’ या ‘कैंडल गैंग’ के नाम से जाना जाता है।

इनका गला सूखने यानी इनके भीतर छटपटाहट पैदा होने के पीछे निम्नलिखित चार प्रमुख कारण हैं:

1. वैचारिक और राजनीतिक प्रासंगिकता का संकट- इन तथाकथित शांति दूतों की पूरी राजनीति और बौद्धिक दुकानदारी ‘भारत-पाकिस्तान भाई-भाई’ और ‘क्रिकेट कूटनीति’ के इर्द-गिर्द घूमती है। जब भारत सरकार पाकिस्तान के खिलाफ कोई कड़ा आर्थिक या रणनीतिक कदम उठाती है, तो इन विचारकों का पूरा नैरेटिव ध्वस्त हो जाता है। इन्हें डर है कि यदि पाकिस्तान पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया, तो वैश्विक मंचों पर भारत-पाक शांति वार्ता के नाम पर मिलने वाले फंड, पुरस्कार और विदेशी दौरों के अवसर समाप्त हो जाएंगे।

2. मानवाधिकार का ‘चयनित’ चश्मा -इन शांति दूतों का सबसे पसंदीदा तर्क यह होता है कि “पानी रोकना एक अमानवीय कृत्य है, इससे पाकिस्तान के गरीब किसान और आम जनता प्रभावित होगी।” लेकिन यहाँ इनका दोहरा चरित्र उजागर हो जाता है। जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी भारत के निर्दोष नागरिकों, जवानों और कश्मीरी अल्पसंख्यकों का खून बहाते हैं, तब इन शांति दूतों के होंठ सिल जाते हैं। तब इन्हें उन भारतीय पिताओं, माताओं और अनाथ बच्चों के मानवाधिकार याद नहीं आते। पाकिस्तान के आम नागरिकों के प्रति इनकी सहानुभूति, भारत के वीर शहीदों के प्रति सम्मान पर भारी पड़ने लगती है।

  1. ‘अंतरराष्ट्रीय छवि’ का अनावश्यक भय–इस वर्ग द्वारा यह डर फैलाया जाता है कि यदि भारत ने सिंधु जल संधि के नियमों को कड़ाई से लागू किया या पानी रोका, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि एक ‘आक्रामक और अविश्वसनीय’ देश की बन जाएगी। यह तर्क पूरी तरह से खोखला है। आज का भारत वैश्विक मंच पर एक मजबूत आर्थिक और सामरिक शक्ति है। दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, न कि पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के गढ़ को। लेकिन यह शांति दूत वर्ग आज भी हीनभावना से ग्रसित है और चाहता है कि भारत हमेशा वैश्विक ताकतों के सामने एक ‘कमजोर और सहिष्णु’ देश बनकर याचना करता रहे।
  2. ‘अमन की आशा’ का छलावा और फंडिंग का खेल-यह कोई रहस्य नहीं है कि भारत में कई ऐसे थिंक-टैंक और एनजीओ काम करते रहे हैं, जिन्हें विदेशों से ट्रैक-2 कूटनीति के नाम पर भारी फंडिंग मिलती है। इनका काम दोनों देशों के बीच सिर्फ बातचीत का माहौल बनाए रखना है, चाहे नतीजा कुछ भी निकले। जब भारत सरकार सीधे तौर पर पानी रोकने या सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कड़े फैसले लेती है, तो इन संस्थाओं की प्रासंगिकता और उनके वित्तीय स्रोतों पर सीधा प्रहार होता है।

सवाल यह भी उठता है कि पानी रोकना रणनीतिक रूप से क्यों जरूरी है?पाकिस्तान जैसे देश के साथ, जो अपनी हरकतों से बाज आने को तैयार नहीं है, केवल बातों से काम नहीं चल सकता। चाणक्य नीति भी कहती है कि साम, दाम, दंड और भेद का सही समय पर उपयोग ही राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।आतंकवाद की कमर तोड़ना: पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही वेंटिलेटर पर है। यदि उसकी कृषि व्यवस्था (जो पूरी तरह सिंधु नदी तंत्र पर निर्भर है) संकट में आती है, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों और वहां की सेना पर आतंकवाद को पालना बंद करने का चौतरफा दबाव बढ़ेगा।अपने किसानों का हक: दशकों तक हमारे हिस्से का पानी पाकिस्तान में बहता रहा और हमारे पंजाब, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के किसान सूखे की मार झेलते रहे। भारत सरकार का यह कदम अपने नागरिकों को उनका हक दिलाने की दिशा में एक न्यायसंगत कदम है।

इस पूरे परिदृश्य को देखकर देश के आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी भी देश के भीतर बैठे नागरिकों की सहानुभूति अपने देश के हितों से ऊपर किसी दुश्मन देश के लिए हो सकती है?जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ छद्म युद्ध लड़ रहा है, तो भारत के भीतर बैठा यह शांति दूत वर्ग जाने-अनजाने में पाकिस्तान के ‘प्रोपोगैंडा टूल’ के रूप में काम करने लगता है। पानी बंद होने पर पाकिस्तान की छटपटाहट तो समझ आती है क्योंकि वह अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है, लेकिन भारत के भीतर बैठे वातानुकूलित कमरों के बुद्धिजीवियों का गला सूखना यह साबित करता है कि इनका मानसिक जुड़ाव भारत की मिट्टी और भारत के राष्ट्रीय हितों से नहीं, बल्कि एक खास वैचारिक एजेंडे से है।

आज का नया भारत अपनी सीमाओं की रक्षा करना भी जानता है और अपने प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग करना भी। ‘पानी बंद करने’ का फैसला किसी दुश्मनी के तहत नहीं, बल्कि देश के आत्मसम्मान और संप्रभुता की रक्षा के लिए लिया गया एक कड़ा कूटनीतिक निर्णय है।

अब समय आ गया है कि देश इन ‘शांति दूतों’ के मुखौटों को पहचाने। जो लोग देश के जवानों के खून बहने पर मौन रहते हैं, उन्हें दुश्मन देश के पानी रुकने पर आंसू बहाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। भारत को यदि आगे बढ़ना है, तो उसे सीमा पार के दुश्मनों से निपटने के साथ-साथ देश के भीतर बैठे इन वैचारिक आस्तीन के सांपों और छद्म शांतिवादियों को भी बेनकाब करना होगा। तभी जाकर देश की सुरक्षा और स्वाभिमान अक्षुण्ण रह पाएगा।