अमेरिका–ईरान युद्धविराम टूटने से दुनिया फिर संकट में, मेलबोर्न से प्रधानमंत्री मोदी का शांति का संदेश

World in crisis again as US-Iran truce collapses; PM Modi sends message of peace from Melbourne

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के टूटने के साथ ही पश्चिम एशिया एक बार फिर तनाव के भंवर में फंस गया है। हाल के दिनों में दोनों पक्षों की ओर से फिर सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों ने यह संकेत दिया है कि संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। युद्धविराम के टूटने से वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। तेल की कीमतों में तेजी, समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ता खतरा और महाशक्तियों की सक्रियता इस संघर्ष को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बना रही है।

भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता बढ़ती है तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिसका सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत और आर्थिक विकास पर पड़ेगा। यही कारण है कि भारत लगातार संवाद और कूटनीतिक समाधान की वकालत करता रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच बने शांति समझौते का स्वागत करते हुए इसे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति और वैश्विक आर्थिक स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि विवादों का समाधान युद्ध नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति से ही संभव है।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी का ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए दिया गया संदेश भी उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा कि भारत विस्तारवाद में नहीं, बल्कि विकासवाद में विश्वास रखता है। भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र “वसुधैव कुटुम्बकम्” है और उसका उद्देश्य दुनिया को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। मेलबोर्न के मंच से उन्होंने भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, लोकतांत्रिक मूल्यों और शांति आधारित विकास मॉडल को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उनका यह संदेश ऐसे समय में आया है जब विश्व के अनेक हिस्से युद्ध और संघर्ष की आग में झुलस रहे हैं।

आज की वैश्विक परिस्थितियों में भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। रूस–यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया का संकट, भारत ने किसी पक्ष का अंध समर्थन करने के बजाय शांति, संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को विश्वसनीय वैश्विक साझेदार बनाता है।

युद्धविराम का टूटना यह भी दर्शाता है कि केवल अस्थायी समझौते स्थायी शांति की गारंटी नहीं बन सकते। जब तक राजनीतिक विश्वास बहाल नहीं होगा, सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान नहीं होगा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे संघर्ष दोबारा भड़कते रहेंगे। संयुक्त राष्ट्र सहित वैश्विक संस्थाओं की भूमिका भी इस समय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व इसकी आर्थिक और रणनीतिक कीमत चुकाएगा। तेल बाजार में अस्थिरता, वैश्विक मुद्रास्फीति, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और निवेश पर नकारात्मक प्रभाव जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। विकासशील देशों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ेगा।

ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शांति, विकास और सहयोग का संदेश विश्व समुदाय के लिए प्रासंगिक प्रतीत होता है। मेलबोर्न से दिया गया उनका यह संदेश केवल भारतीय प्रवासियों के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए था कि 21वीं सदी युद्ध की नहीं, बल्कि विकास, साझेदारी और मानव कल्याण की सदी होनी चाहिए।

स्पष्ट है कि अमेरिका–ईरान युद्धविराम का टूटना विश्व शांति के लिए गंभीर चेतावनी है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सभी पक्ष संयम बरतें, संवाद का रास्ता अपनाएं और स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ें। विश्व को आज हथियारों की नहीं, विश्वास, सहयोग और विकास की राजनीति की आवश्यकता है।