बूंद-बूंद का संकट : शुद्ध पेयजल की किल्लत और हमारा भविष्य

The Crisis of Every Drop: The Scarcity of Clean Drinking Water and Our Future

सत्य भूषण शर्मा

धरती को “नीला ग्रह” कहा जाता है क्योंकि इसका लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से आच्छादित है। किंतु विडंबना यह है कि इस विशाल जलराशि का अधिकांश भाग खारा है और मानव उपयोग के योग्य नहीं है। पीने योग्य मीठा जल पृथ्वी पर कुल जल का अत्यंत सीमित हिस्सा है। आज विश्व के अनेक देशों की तरह भारत भी शुद्ध पेयजल के गंभीर संकट से जूझ रहा है। यह संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता का संकट अधिक चिंताजनक है। यदि समय रहते इस दिशा में प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में जल का प्रश्न मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

पानी केवल जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, पर्यावरण और आर्थिक विकास की धुरी भी है। यही कारण है कि जल को प्रकृति का अमूल्य उपहार कहा गया है। किंतु जनसंख्या वृद्धि, अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों के अंधाधुंध दोहन तथा पर्यावरणीय असंतुलन ने इस अमूल्य संसाधन को संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है।

आज देश के अनेक गांवों और शहरों में लोग स्वच्छ पेयजल के लिए लंबी कतारों में खड़े होने को विवश हैं। कहीं टैंकरों पर निर्भरता है तो कहीं हैंडपंप सूख चुके हैं। अनेक स्थानों पर भूजल स्तर इतना नीचे चला गया है कि पुराने कुएँ और बावड़ियाँ केवल इतिहास बनकर रह गई हैं। गर्मी के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब जल संकट सामाजिक तनाव का कारण बनने लगता है।

शुद्ध पेयजल की कमी के पीछे अनेक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण भूजल का अनियंत्रित दोहन है। कृषि, उद्योग और घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लगातार भूजल निकाला जा रहा है, जबकि वर्षाजल का पर्याप्त पुनर्भरण नहीं हो पा रहा। परिणामस्वरूप भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। इसके साथ ही नदियों, तालाबों और झीलों में घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्टों का प्रवाह जल को प्रदूषित कर रहा है। अनेक जल स्रोतों में रासायनिक पदार्थ, प्लास्टिक, कीटनाशक और भारी धातुएँ मिल जाने से पानी पीने योग्य नहीं रह जाता।

जलवायु परिवर्तन ने भी इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। वर्षा का असमान वितरण, अनियमित मानसून, लंबे सूखे और अचानक आने वाली बाढ़ें जल प्रबंधन की पारंपरिक व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। कई क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा होने के बावजूद जल संरक्षण के अभाव में वर्षाजल बहकर नदियों और समुद्र में चला जाता है। यदि यही जल संरक्षित किया जाए तो पूरे वर्ष पेयजल की आवश्यकता काफी हद तक पूरी की जा सकती है।

शुद्ध पेयजल की कमी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और ग्रामीण वर्ग पर पड़ता है। महिलाओं और बालिकाओं को प्रतिदिन कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है, जिससे उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका प्रभावित होती है। दूसरी ओर दूषित पानी के सेवन से हैजा, टाइफाइड, डायरिया, पीलिया, पेचिश तथा अनेक जलजनित रोग फैलते हैं। विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों से बचा सकती है।

भारत के अनेक क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन और नाइट्रेट की अधिकता भी गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे जल के लगातार सेवन से दांतों और हड्डियों की विकृतियाँ, त्वचा रोग, कैंसर तथा अन्य जटिल स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए केवल पानी उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका शुद्ध और सुरक्षित होना भी उतना ही आवश्यक है।

कृषि क्षेत्र देश में सर्वाधिक जल की खपत करता है। परंपरागत सिंचाई पद्धतियों में बड़ी मात्रा में पानी व्यर्थ चला जाता है। यदि ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर प्रणाली, माइक्रो इरिगेशन तथा जल दक्ष कृषि तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए तो जल की भारी बचत संभव है। इसी प्रकार जल की अधिक खपत वाली फसलों के स्थान पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना भी समय की मांग है।

शहरों में पाइपलाइन से होने वाला जल रिसाव भी एक बड़ी समस्या है। अनेक नगरों में लाखों लीटर पानी केवल वितरण व्यवस्था की खामियों के कारण प्रतिदिन नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त घरेलू स्तर पर पानी की अनावश्यक बर्बादी भी चिंता का विषय है। नल खुला छोड़ना, वाहनों को पाइप से धोना, अत्यधिक जल उपयोग जैसी छोटी-छोटी लापरवाहियाँ मिलकर बड़े संकट को जन्म देती हैं।

सरकार ने जल संरक्षण और पेयजल उपलब्धता के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएँ प्रारंभ की हैं। जल जीवन मिशन के माध्यम से हर घर तक नल से जल पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। अमृत सरोवर अभियान, अटल भूजल योजना, वर्षाजल संचयन, नदी संरक्षण कार्यक्रम तथा विभिन्न राज्य सरकारों की जल संरक्षण योजनाएँ सकारात्मक पहल हैं। किंतु केवल सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं होंगी, जब तक जनभागीदारी इनके साथ न जुड़े।

वर्षाजल संचयन आज की सबसे प्रभावी आवश्यकता बन चुका है। प्रत्येक घर, विद्यालय, कार्यालय, उद्योग और सार्वजनिक भवन में वर्षाजल संग्रहण प्रणाली अनिवार्य की जानी चाहिए। इससे भूजल पुनर्भरण होगा और भविष्य की जल आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही पारंपरिक जल स्रोतों—कुओं, बावड़ियों, तालाबों और झीलों—का संरक्षण एवं पुनर्जीवन भी अत्यंत आवश्यक है। हमारे पूर्वजों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण की जो व्यवस्थाएँ विकसित की थीं, वे आज भी अनुकरणीय हैं।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में जल संरक्षण को व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों में प्रारंभ से ही जल बचाने की आदत विकसित की जाए। सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, धार्मिक संस्थानों और मीडिया को भी इस दिशा में व्यापक जनजागरण अभियान चलाने चाहिए। प्रत्येक नागरिक यदि प्रतिदिन कुछ लीटर पानी बचाने का संकल्प ले, तो राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों लीटर जल की बचत संभव है।

जल संरक्षण केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक कर्तव्य भी है। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए हमें आज ही जल के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। हमें यह समझना होगा कि जल का कोई विकल्प नहीं है। यदि पानी रहेगा तो जीवन रहेगा, विकास रहेगा और सभ्यता सुरक्षित रहेगी।

समय की पुकार है कि हम जल को केवल प्राकृतिक संसाधन न समझें, बल्कि जीवन की सबसे मूल्यवान धरोहर मानकर उसका संरक्षण करें। शुद्ध पेयजल की उपलब्धता प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, किंतु इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। यदि आज हमने हर बूंद का सम्मान करना सीख लिया, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी; अन्यथा इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा जिसने अपने ही हाथों जीवन के सबसे अनमोल संसाधन को संकट में डाल दिया।