“अखिल भारतीय किसान महासंघ ‘आईफा’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा पत्र ; भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के किसान विरोधी कृषि प्रावधानों को निरस्त अथवा पुनर्समीक्षित करने की मांग
रायपुर / नई दिल्ली : भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर देशभर में चल रही चर्चाओं और आशंकाओं के बीच देश के 40 से अधिक किसान संगठनों के साझा राष्ट्रीय मंच अखिल भारतीय किसान महासंघ (AIFA) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विस्तृत पत्र भेजकर प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के उन सभी कृषि संबंधी प्रावधानों एवं उपबंधों को निरस्त अथवा व्यापक रूप से पुनर्समीक्षित करने की मांग की है, जो भारतीय किसानों, डेयरी क्षेत्र, पशुपालकों तथा देश की खाद्य सुरक्षा के हितों के प्रतिकूल हों।
महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. राजाराम त्रिपाठी द्वारा आज सीधे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रेषित पत्र में कहा गया है कि भारत की कृषि केवल व्यापार का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा तथा राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का आधार है। इसलिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते में किसान हित सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए।
पत्र में कहा गया है कि अमेरिका के किसानों को भारी सरकारी सब्सिडी, अत्याधुनिक तकनीक, विशाल कृषि जोत तथा बड़े पैमाने पर यंत्रीकृत उत्पादन का लाभ प्राप्त है। ऐसी परिस्थितियों में यदि अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में कम कीमतों पर प्रवेश करते हैं तो भारत के छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। इसका प्रतिकूल प्रभाव किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार, कृषि आधारित उद्योगों तथा देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
महासंघ ने प्रधानमंत्री का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि हाल के दिनों में समाचार माध्यमों में प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनेक प्रकार की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे किसानों में स्वाभाविक चिंता और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। यद्यपि प्रधानमंत्री स्वयं सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत के किसानों, डेयरी क्षेत्र और पशुपालकों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, फिर भी इस विषय पर सरकार को पूरी पारदर्शिता अपनाते हुए किसान संगठनों का विश्वास कायम रखना चाहिए।
डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि विशेष चिंता उन प्रस्तावों को लेकर है जिनमें कृषि आयात शुल्क में कमी, अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक छूट अथवा कृषि बाजार तक उनकी आसान पहुंच जैसे प्रावधानों की चर्चा सामने आई है। यदि ऐसे प्रावधान भारतीय परिस्थितियों और किसानों के हितों की अनदेखी करते हुए लागू किए गए, तो इसका प्रभाव केवल वर्तमान किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की कृषि सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्रीय खाद्य संप्रभुता भी प्रभावित हो सकती है।
पत्र में यह भी कहा गया है कि भविष्य में यदि किसी भी देश के साथ कृषि क्षेत्र से संबंधित कोई महत्वपूर्ण व्यापार समझौता प्रस्तावित हो तो उसे अंतिम रूप देने से पूर्व अखिल भारतीय किसान महासंघ आईफा सहित देश के प्रमुख किसान संगठनों से औपचारिक परामर्श किया जाना चाहिए। किसानों की सहभागिता से लिए गए निर्णय अधिक व्यावहारिक, संतुलित तथा राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होंगे।
महासंघ ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि जिस प्रकार उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए किसान हितों के प्रश्न पर तत्कालीन केंद्र सरकार के समक्ष भी निर्भीक और दृढ़ रुख अपनाया था, आज उसी दृढ़ता की आवश्यकता भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के साथ होने वाली वार्ताओं में भी है। किसान संगठनों का विश्वास है कि प्रधानमंत्री किसी भी बाहरी दबाव से ऊपर उठकर भारतीय किसानों, पशुपालकों, डेयरी क्षेत्र तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के हितों की रक्षा के लिए चट्टान की तरह खड़े होंगे।
महासंघ ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते का विरोधी नहीं है। संगठन का आग्रह केवल इतना है कि ऐसे सभी कृषि संबंधी प्रावधान, जो भारतीय किसानों, डेयरी क्षेत्र, पशुपालकों, कृषि आत्मनिर्भरता तथा देश की खाद्य सुरक्षा के प्रतिकूल हों, उन्हें निरस्त किया जाए अथवा उनकी व्यापक पुनर्समीक्षा कर किसान हितों के अनुरूप बनाया जाए। महासंघ ने विश्वास व्यक्त किया कि केंद्र सरकार राष्ट्रहित और किसान हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ऐसा निर्णय करेगी, जिससे भारत की कृषि, करोड़ों किसानों की आजीविका तथा देश की खाद्य सुरक्षा किसी भी प्रकार से प्रभावित न हो।
अखिल भारतीय किसान महासंघ ने कहा कि भारत की कृषि केवल अर्थव्यवस्था का एक क्षेत्र नहीं, बल्कि देश की खाद्य संप्रभुता, ग्रामीण संस्कृति और करोड़ों परिवारों के जीवन का आधार है। इसलिए किसी भी व्यापारिक समझौते में आर्थिक लाभ के साथ-साथ किसान हित, राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए।





