डॉ वंदना शर्मा
तीज का त्यौहार सुहागिन महिलाओं के लिए बनाया गया था। इसी बहाने बहनें अपने मायके आती। अपनी घर गृहस्ती की बातें अपनी सखी मंडली को बताती। सावन में प्रकृति भी अपना श्रृंगार करती। तीज का मतलब था – सावन में बहनों का मायके आना, चौड़े आंगन में झूले पड़ना, सखियों के साथ गीत गाना। प्रकृति भी अपना श्रृंगार करती थी और महिलाएं भी।
आज फ्लैटों की संस्कृति में ना आंगन बचे, ना झूले। बहनें मायके नहीं आतीं। तीज अब सिर्फ हरी साड़ी, हरी चूड़ियों और सोशल मीडिया पर फोटो डालने तक सिमट गई है। त्यौहार का असली अर्थ कहीं खो गया है। बस इसी बहाने महिलाएं 16 श्रंगार कर लेती हैं। और अपने सुंदर-सुंदर फोटो सोशलमडिया पर अपलोड करती हैं। लो जी हो गई तीज।
राखी: डाक और UPI तक सीमित
राखी का त्यौहार भी अब औपचारिकता रह गया है।
राखी की स्थिति भी कुछ अलग नहीं। अगस्त में स्कूल खुले होते हैं, छुट्टी सिर्फ एक दिन की। इसलिए दूर रहने वाले भाई-बहन घर आना टाल देते हैं। राखी डाक से आ जाती है और “भेंट” के रूप में पैसे UPI से।
पहले संयुक्त परिवारों में चाचा-ताऊ, बुआ-मौसी का मेला लगता था। अब एकल संतान की परंपरा ने रिश्तों को ही खत्म कर दिया। ना भाई, ना बहन, ना कोई और। “परिवार” नाम की संस्था ही सिकुड़ गई है।
जिम्मेदारियों से पलायन
आज का युवा तो शादी से भी कतराने लगा है। लिव-इन आसान लगता है क्योंकि शादी का मतलब दो परिवारों की जिम्मेदारी निभाना है। लोग रिश्तों का बोझ उठाना नहीं चाहते।
चिंताजनक भविष्य
आने वाला समय और भी कठिन है। आज अर्थी को चार कंधे मिल जाते हैं, कल शायद वो भी न मिलें। कहीं ऐसा ना हो कि भविष्य मेंअंतिम संस्कार की सुविधा देने वाली संस्था ही खुल जाए । बुकिंग अपने जीवन काल में ही कराए। और कीमत के हिसाब से अंतिम संस्कार की भव्यता तय की जाए। धनलोलुपता इतनी बढ़ गई है कि इंसान दूसरे इंसान से डरने लगा है। बात करना भी शक के दायरे में आ गया है।
समाधान क्या है?
समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। अगर समाज को बचाना है तो संवाद को फिर से शुरू करना होगा। त्यौहार दिखावे के लिए नहीं, रिश्ते जोड़ने के लिए मनाने होंगे।
तभी हमारे त्यौहार अपना रंग वापस पा सकेंगे।





