डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत आज विश्व में सड़क दुर्घटनाओं से सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024 में लगभग 1.77 लाख लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई। यह संख्या किसी प्राकृतिक आपदा या महामारी से कम नहीं है। प्रत्येक दिन सैकड़ों परिवार अपने किसी प्रियजन को खो देते हैं, हजारों लोग स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाते हैं और देश को उत्पादक मानव संसाधन तथा अरबों रुपये की आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है। इसलिए सड़क दुर्घटनाओं को केवल चालक की लापरवाही, तेज गति या यातायात नियमों के उल्लंघन तक सीमित करके देखना वास्तविक समस्या से आँखें मूँदने जैसा है। यह वस्तुतः सार्वजनिक स्वास्थ्य, सड़क अवसंरचना, कानून प्रवर्तन, आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं तथा प्रशासनिक समन्वय की व्यापक विफलता का परिणाम है।
सड़क सुरक्षा का प्रश्न सीधे नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ा है, जिसकी गारंटी भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21 देता है। यदि कोई नागरिक सुरक्षित रूप से सड़क पर चल भी नहीं सकता, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत असावधानी नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी और शासन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक मामलों में सरकारों को सुरक्षित सड़क अवसंरचना, वैज्ञानिक सड़क निर्माण तथा प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
भारत में अधिकांश दुर्घटनाओं के पीछे सड़कों की खराब इंजीनियरिंग एक प्रमुख कारण है। अनेक राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों पर ब्लैक स्पॉट, अपर्याप्त संकेतक, टूटी हुई सड़कें, अवैज्ञानिक मोड़, प्रकाश व्यवस्था का अभाव तथा पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित मार्ग न होना दुर्घटनाओं को आमंत्रित करता है। शहरों में फुटपाथों पर अतिक्रमण, अवैध पार्किंग तथा अनियोजित यातायात व्यवस्था भी दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाती है। सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की अनदेखी अंततः आम नागरिकों के जीवन पर भारी पड़ती है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन का अभाव है। मोटर वाहन अधिनियम में कठोर दंड का प्रावधान होने के बावजूद तेज गति, शराब पीकर वाहन चलाना, हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग न करना तथा ओवरलोडिंग जैसी समस्याएँ लगातार बनी हुई हैं। कई स्थानों पर यातायात नियमों का पालन केवल पुलिस की उपस्थिति तक सीमित रहता है। यदि निगरानी व्यवस्था तकनीक आधारित और पारदर्शी हो, तो नियमों का पालन स्वतः बढ़ सकता है।
सड़क दुर्घटनाओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट इसलिए भी माना जाता है क्योंकि दुर्घटना के बाद समय पर उपचार उपलब्ध न होना बड़ी संख्या में मौतों का कारण बनता है। स्वर्णिम घंटा (Golden Hour) के दौरान यदि पीड़ित को उचित चिकित्सा सहायता मिल जाए तो अनेक जीवन बचाए जा सकते हैं, किंतु ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में एंबुलेंस सेवाओं की कमी, ट्रॉमा सेंटरों का अभाव तथा अस्पतालों तक पहुँचने में देरी के कारण स्थिति गंभीर हो जाती है। कई बार पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के बीच समन्वय की कमी भी राहत कार्यों को प्रभावित करती है।
प्रशासनिक स्तर पर भी सड़क सुरक्षा अनेक विभागों में विभाजित उत्तरदायित्व का विषय है। सड़क निर्माण एक विभाग करता है, यातायात नियंत्रण पुलिस के पास होता है, स्वास्थ्य सेवाएँ किसी अन्य विभाग के अधीन होती हैं और स्थानीय निकायों की अपनी अलग भूमिका होती है। इस विखंडित व्यवस्था के कारण दुर्घटना रोकथाम के लिए समन्वित रणनीति विकसित नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप जवाबदेही भी स्पष्ट नहीं रहती।
सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले सड़कों की इंजीनियरिंग को वैज्ञानिक और सुरक्षित बनाना आवश्यक है। प्रत्येक सड़क परियोजना में सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाए तथा दुर्घटना संभावित स्थानों की शीघ्र पहचान कर उनका सुधार किया जाए। पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों तथा दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को भी सड़क डिजाइन का अभिन्न भाग बनाया जाना चाहिए।
यातायात नियमों के पालन हेतु तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था को व्यापक बनाया जाना चाहिए। स्वचालित स्पीड कैमरे, सीसीटीवी नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित यातायात प्रबंधन तथा ई-चालान प्रणाली भ्रष्टाचार को कम करने के साथ-साथ नियमों के पालन को भी बढ़ावा देंगे। बार-बार नियम तोड़ने वालों के लाइसेंस निलंबित करने तथा कठोर दंड लागू करने की आवश्यकता है।
आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को सुदृढ़ करना भी अत्यंत आवश्यक है। राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों पर निश्चित दूरी पर आधुनिक ट्रॉमा सेंटर स्थापित किए जाएँ, एंबुलेंस सेवाओं का विस्तार किया जाए तथा सभी अस्पतालों को दुर्घटना पीड़ितों का तत्काल उपचार सुनिश्चित करने के लिए बाध्य किया जाए। ‘गुड समैरिटन’ दिशा-निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है, ताकि घायल व्यक्ति की सहायता करने वाले नागरिक किसी कानूनी परेशानी के भय से पीछे न हटें।
सड़क सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार का भी प्रश्न है। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक सड़क सुरक्षा शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से नागरिकों में जिम्मेदार वाहन संचालन की संस्कृति विकसित की जानी चाहिए। अभिभावकों, शिक्षकों, मीडिया तथा नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
दीर्घकालिक समाधान के लिए संस्थागत सुधार भी आवश्यक हैं। केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित सड़क सुरक्षा ढाँचा विकसित किया जाए, जिसमें नीति निर्माण, वित्तपोषण, निगरानी तथा जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था हो। जिला स्तर पर सड़क सुरक्षा समितियों को अधिक अधिकार और संसाधन दिए जाएँ। दुर्घटनाओं से संबंधित पुलिस, परिवहन और स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों को एकीकृत कर राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय डेटाबेस तैयार किया जाए, जिससे साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण संभव हो सके।
भारत यदि विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तो सुरक्षित सड़कें उसकी प्राथमिक शर्त हैं। सड़क दुर्घटनाएँ भाग्य या संयोग नहीं, बल्कि अधिकांश मामलों में रोकी जा सकने वाली घटनाएँ हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन्हें केवल व्यक्तिगत गलती न मानकर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुशासन की चुनौती के रूप में देखा जाए। सुरक्षित सड़क अवसंरचना, कठोर एवं पारदर्शी कानून प्रवर्तन, आधुनिक आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएँ, जन-जागरूकता तथा प्रभावी प्रशासनिक समन्वय के माध्यम से ही दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। जब तक शासन व्यवस्था सड़क सुरक्षा को विकास के मूल एजेंडे का हिस्सा नहीं बनाएगी, तब तक प्रत्येक वर्ष लाखों परिवारों का दर्द और देश की अपूरणीय क्षति जारी रहेगी। सुरक्षित सड़कें केवल सुविधा नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक और मानवीय अधिकार हैं।





