सत्य भूषण शर्मा
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है; उसकी वास्तविक शक्ति सत्ता और विपक्ष के बीच स्वस्थ संवाद, विचारों के सम्मान और असहमति को स्वीकार करने की संस्कृति में निहित होती है। संसद तभी जीवंत रहती है जब वहां प्रश्न पूछे जाएं, उत्तर दिए जाएं और मतभेदों के बावजूद राष्ट्रहित सर्वोपरि बना रहे।
स्वतंत्रता के बाद भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में डॉ. भीमराव आंबेडकर को कानून मंत्री और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा जाना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि राष्ट्र-निर्माण केवल एक विचारधारा का नहीं, बल्कि विविध प्रतिभाओं के सामूहिक योगदान का परिणाम है। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।
भारतीय संसदीय इतिहास में अनेक प्रसंग ऐसे मिलते हैं जो बताते हैं कि तीखी आलोचना को भी लोकतांत्रिक गरिमा के साथ सुना जाता था। पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी की वाक्पटुता की सराहना से जुड़ी चर्चित घटना अक्सर इस परंपरा के उदाहरण के रूप में उद्धृत की जाती है। इसी प्रकार 1963 में आचार्य कृपलानी द्वारा लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर कई दिनों तक हुई विस्तृत चर्चा यह दर्शाती है कि विपक्ष को लोकतंत्र का आवश्यक अंग माना जाता था।
1971 के युद्ध के बाद अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा इंदिरा गांधी के नेतृत्व की सार्वजनिक प्रशंसा और बाद के वर्षों में विदेश मंत्री बनने पर नेहरू की तस्वीर को सम्मानपूर्वक पुनः स्थापित करवाना इस बात की याद दिलाता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान और संस्थाओं के प्रति आदर कायम रह सकता है।
भारतीय राजनीति में मानवीय संवेदनाओं के भी अनेक उल्लेखनीय उदाहरण मिलते हैं। राजीव गांधी द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी के उपचार में सहयोग से जुड़ी घटना हो या 1991 के आर्थिक संकट के समय विभिन्न दलों के नेताओं के बीच व्यापक विमर्श—इन प्रसंगों से यही संदेश उभरता है कि राष्ट्रीय संकटों का समाधान संवाद और सहमति से अधिक मजबूत बनता है।
2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर संसद में चली लंबी बहस भी इस बात का संकेत थी कि बड़े राष्ट्रीय निर्णयों पर विस्तृत चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। मतभेद थे, लेकिन तर्क भी थे और संसद बहस का मंच बनी रही।
आज का राजनीतिक वातावरण पहले की तुलना में अधिक ध्रुवीकृत दिखाई देता है। आलोचकों का कहना है कि संसद में व्यवधान, लगातार निलंबन, जांच एजेंसियों के उपयोग को लेकर उठते प्रश्न और सार्वजनिक विमर्श में बढ़ती कटुता लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए चिंता का विषय हैं। वहीं सरकार का पक्ष यह रहता है कि कानून का पालन सभी पर समान रूप से लागू होता है और संसदीय अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं नागरिकों के विश्वास को लगातार मजबूत कर पा रही हैं।
लोकतंत्र में सत्ता की मजबूती उतनी ही आवश्यक है जितनी विपक्ष की प्रभावी भूमिका। विपक्ष केवल विरोध करने के लिए नहीं होता; वह सरकार को अधिक जवाबदेह, सतर्क और पारदर्शी बनाने का माध्यम भी होता है। इसी प्रकार सत्ता की जिम्मेदारी केवल निर्णय लेना नहीं, बल्कि असहमति को भी गरिमा के साथ सुनना है।
आज आवश्यकता किसी एक दल की विजय की नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कार की पुनर्स्थापना की है जिसमें मतभेद दुश्मनी नहीं बनते, आलोचना देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाती और संसद सचमुच विचारों के महाकुंभ के रूप में कार्य करती है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता रही है; इसलिए भविष्य का भारत भी संवाद, सहिष्णुता और संवैधानिक मर्यादा के सहारे ही अधिक सशक्त बन सकेगा।





