झारखंड छात्र आंदोलन: युवाओं के धैर्य और संकल्प की जीत

Jharkhand Student Movement: A Victory for the Patience and Resolve of the Youth

महेन्द्र तिवारी

झारखंड में पिछले 24 दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन आखिरकार उस मुकाम पर पहुंच गया, जिसकी प्रतीक्षा हजारों अभ्यर्थी लंबे समय से कर रहे थे। राज्य सरकार ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा सहित उस निजी संस्था के माध्यम से आयोजित सभी परीक्षाओं और उनके परिणामों को रद्द करने का निर्णय लिया है, जिस पर परीक्षा संचालन में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे थे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई महत्वपूर्ण बैठक के बाद सामने आया यह फैसला केवल एक परीक्षा रद्द किए जाने का निर्णय नहीं है, बल्कि यह उस बेचैनी और अविश्वास की अभिव्यक्ति भी है, जो लंबे समय से प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था को लेकर युवाओं के मन में जमा हो रहा था। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर लगातार 24 दिनों तक संघर्ष किया। रांची के जयपाल सिंह मुंडा खेल परिसर में धरना, प्रदर्शन और अनशन के माध्यम से अभ्यर्थियों ने सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह आंदोलन केवल परीक्षा रद्द कराने की मांग तक सीमित नहीं था। इसके पीछे वर्षों से चली आ रही भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही की मांग भी थी।

युवाओं का तर्क था कि प्रतियोगी परीक्षा उनके लिए केवल प्रश्नों और उत्तरों का खेल नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की मेहनत, परिवार का आर्थिक सहयोग, व्यक्तिगत त्याग और भविष्य के सपने जुड़े होते हैं। इसलिए परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी सीधे उनके जीवन को प्रभावित करती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला युवा सामान्यतः अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों को किताबों, कक्षाओं और अभ्यास में लगाता है। वह कई बार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद तैयारी जारी रखता है। उसके सामने सरकारी नौकरी केवल रोजगार का माध्यम नहीं होती, बल्कि परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बदलने का अवसर भी होती है। ऐसे में यदि परीक्षा की प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिह्न लग जाए तो अभ्यर्थी के भीतर केवल निराशा नहीं पैदा होती, बल्कि व्यवस्था के प्रति विश्वास भी कमजोर होता है। झारखंड के छात्रों का आंदोलन इसी टूटते विश्वास की एक मुखर अभिव्यक्ति बन गया। सरकार और छात्रों के बीच बातचीत के कई दौर हुए, लेकिन लंबे समय तक कोई समाधान नहीं निकल सका। आंदोलन बढ़ता गया और छात्रों का दबाव भी लगातार तेज होता गया। अंततः सरकार को कठोर निर्णय लेना पड़ा। मुख्यमंत्री ने परीक्षा रद्द करने के साथ ही व्यापक जांच की घोषणा भी की।

सरकार ने वर्ष 2014 से अब तक हुई भर्ती परीक्षाओं में सामने आई छोटी या बड़ी गड़बड़ियों की जांच कराने की बात कही है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जांच का दायरा किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन मामलों में नियमों का पालन नहीं हुआ या किसी प्रकार की लापरवाही और अनियमितता सामने आएगी, वहां जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच समिति बनाए जाने की बात भी सामने आई है। इसके साथ ही राज्य के अपराध अनुसंधान विभाग को भी व्यापक जांच की जिम्मेदारी दी गई है। यह कदम तभी सार्थक होगा जब जांच केवल कागजी प्रक्रिया बनकर न रह जाए, बल्कि दोषियों तक पहुंचे और पूरी प्रक्रिया जनता के सामने पारदर्शी ढंग से रखी जाए। इस आंदोलन की एक उल्लेखनीय विशेषता छात्रों का धैर्य रहा। इतने लंबे समय तक धरना देना और लगातार अपनी मांगों पर टिके रहना आसान नहीं होता। इसके साथ ही अनशन ने आंदोलन को और गंभीर बना दिया। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 16 दिनों तक भूख हड़ताल की। सरकार के निर्णय के बाद उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया और इसे छात्रों की बड़ी जीत बताया।

उनके अनशन का समाप्त होना इस संघर्ष के एक महत्वपूर्ण चरण के पूरा होने का संकेत है। रांची के खेल मैदान में सरकार के फैसले की सूचना पहुंचते ही छात्रों में भारी उत्साह दिखाई दिया। लंबे समय से धरने पर बैठे अभ्यर्थियों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी व्यक्त की। यह खुशी केवल परीक्षा रद्द होने की खुशी नहीं थी। यह उस भावना की खुशी थी कि उनकी आवाज आखिरकार सत्ता के गलियारों तक पहुंची और सरकार ने उनकी शिकायत को गंभीरता से स्वीकार किया। लोकतंत्र में किसी सरकार के लिए इससे बड़ा संदेश और क्या हो सकता है कि उसके युवा नागरिक अपनी बात कहने के लिए इतने लंबे समय तक सड़क पर बैठे रहें और अंततः सरकार को उनके प्रश्नों का उत्तर देना पड़े। हालांकि इस निर्णय को छात्रों की बड़ी जीत कहा जा रहा है, लेकिन संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अभी बाकी है। छात्रों की प्रमुख मांगों में केंद्रीय जांच संस्था से जांच कराने की मांग भी शामिल रही है। सरकार ने फिलहाल अपराध अनुसंधान विभाग और अन्य निर्धारित माध्यमों से जांच कराने का निर्णय लिया है। इसलिए आंदोलनकारी छात्रों की ओर से यह कहा जा रहा है कि परीक्षा रद्द होना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन जांच की विश्वसनीयता और दोषियों पर कठोर कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।

सबसे बड़ी चुनौती अब उन अभ्यर्थियों की है, जिन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण करके आगे की प्रक्रिया पूरी कर ली थी या नियुक्ति की उम्मीद में बैठे थे। परीक्षा रद्द होने के बाद उनके सामने फिर से परीक्षा देने की स्थिति पैदा हो सकती है। यह उनके लिए आसान नहीं होगा। सरकार को इसलिए केवल परीक्षा रद्द करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि प्रभावित अभ्यर्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे निर्दोष अभ्यर्थियों को अनावश्यक नुकसान न उठाना पड़े। जिन युवाओं ने नियमों के अनुसार परीक्षा दी है, उन्हें पूरी प्रक्रिया की खामियों का भार अकेले नहीं उठाना चाहिए। यह घटनाक्रम सरकार के लिए भी एक बड़ा सबक है। किसी भी भर्ती व्यवस्था की सफलता केवल प्रश्नपत्र तैयार करने और परिणाम घोषित करने में नहीं होती। उसकी वास्तविक सफलता इस बात में होती है कि अंतिम अभ्यर्थी तक यह विश्वास पहुंचे कि उसके साथ न्याय हुआ है। परीक्षा केंद्र से लेकर परिणाम तक हर चरण में पारदर्शिता आवश्यक है। यदि किसी परीक्षा में एक भी गंभीर गड़बड़ी सामने आती है तो उसका प्रभाव हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ता है। इसलिए परीक्षा व्यवस्था को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के साथ साथ मानवीय और प्रशासनिक स्तर पर भी कठोर निगरानी की आवश्यकता है।

सरकार ने भविष्य की परीक्षाओं को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए व्यवस्था में सुधार की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारी अमिताभ कौशल को सौंपने की जानकारी दी है। अभ्यर्थियों की शिकायतों के लिए विशेष माध्यम उपलब्ध कराने और शिकायतों को विशेषज्ञों तक पहुंचाने की बात भी कही गई है। यह पहल तभी प्रभावी होगी जब शिकायत करने वाले अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी और उस पर समयबद्ध कार्रवाई होगी। झारखंड की इस घटना का व्यापक संदेश दूसरे राज्यों के लिए भी है। आज देश के करोड़ों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से अपने भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं। भर्ती परीक्षाओं में देरी, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता में चूक, परिणामों को लेकर विवाद और चयन प्रक्रिया पर उठते सवाल युवाओं में असंतोष पैदा करते हैं। सरकारों को यह समझना होगा कि रोजगार की प्रतीक्षा कर रहा युवा केवल एक मतदाता नहीं है। वह देश की कार्यशक्ति, ऊर्जा और भविष्य है। उसके विश्वास के साथ खिलवाड़ किसी भी व्यवस्था के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

छात्र आंदोलन की यह सफलता यह भी बताती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण और संगठित जनदबाव की अपनी शक्ति होती है। जब मांग व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर व्यवस्था में सुधार और न्याय की मांग बन जाती है, तब उसका प्रभाव व्यापक होता है। झारखंड के छात्रों ने अपने संघर्ष से यही संदेश दिया है कि युवा यदि अपने अधिकारों के लिए धैर्य और एकजुटता के साथ खड़े हों तो उनकी आवाज को अनसुना करना आसान नहीं होता। लेकिन अब छात्रों की जीत को स्थायी सुधार में बदलने की जिम्मेदारी सरकार की है। केवल परीक्षाएं रद्द कर देना पर्याप्त नहीं होगा। दोषियों की पहचान, निष्पक्ष जांच, समयबद्ध कार्रवाई और भविष्य की परीक्षा व्यवस्था में ऐसे प्रबंध जरूरी हैं जिनसे दोबारा ऐसी स्थिति पैदा न हो। युवाओं को बार बार सड़क पर उतरकर अपने भविष्य की सुरक्षा मांगनी पड़े, इससे बेहतर है कि व्यवस्था इतनी विश्वसनीय बनाई जाए कि किसी आंदोलन की आवश्यकता ही न पड़े। सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती जाती रहती हैं, लेकिन युवाओं के सपने नहीं बदलते। उनके सपनों की रक्षा करना शासन का प्राथमिक कर्तव्य है और यही एक स्वस्थ और कल्याणकारी राज्य की सच्ची पहचान है।