प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
कॉर्पोरेट दफ्तरों की जगमगाहट, कांच की ऊँची इमारतों का मोहक आभास और “प्रोफेशनलिज़्म” के बड़े-बड़े दावे—यदि इनके भीतर भय, शोषण और दबाव का अंधकार पलता हो, तो यह किसी एक कंपनी की चूक नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की गहरी असफलता का संकेत है। अप्रैल 2026 में नासिक स्थित एक आईटी इकाई (टीसीएस) से सामने आया प्रकरण इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ महिला कर्मियों के सपनों को सुनियोजित ढंग से रौंद दिया गया। रोजगार, सम्मान और आत्मनिर्भरता की आकांक्षा लेकर आई इन महिलाओं को अपने ही कार्यस्थल पर ऐसे असहनीय दबावों का सामना करना पड़ा, जो किसी भी सभ्य समाज के मूल्यों के सर्वथा विपरीत हैं।
यह मामला केवल यौन शोषण के आरोपों तक सीमित नहीं है; इसके भीतर भय, मानसिक उत्पीड़न, धार्मिक आस्था पर दबाव और अधिकारों के खुले दुरुपयोग की कहीं अधिक गंभीर परतें छिपी हुई हैं। सामने आई शिकायतों के अनुसार, कुछ वरिष्ठ कर्मचारियों ने महिला कर्मियों पर अनुचित प्रस्तावों, अश्लील टिप्पणियों और निजी संबंध बनाने के लिए निरंतर दबाव डाला। जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो उन्हें पदोन्नति रोकने, नौकरी समाप्त करने और उनके निजी जीवन को बदनाम करने की धमकियाँ दी गईं। सत्ता और पद के बल पर किया गया यह आचरण केवल अनैतिकता की पराकाष्ठा नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से कानूनन दंडनीय अपराध है, जो किसी भी कार्यस्थल की गरिमा, सुरक्षा और विश्वास को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है।
यह प्रकरण और भयावह तब बनता है, जब स्पष्ट होता है कि यह छिटपुट घटनाएँ नहीं, बल्कि लंबे समय से सक्रिय संगठित तंत्र का परिणाम था। पुलिस जांच और शिकायतों के अनुसार, आठ महिला कर्मचारियों की नौ एफ़आईआर्स में सामने आया कि टीम लीडर्स सहित वरिष्ठों ने 2022 से 2026 तक करीब चार वर्षों तक सुनियोजित ढंग से उन्हें निशाना बनाकर दबाव में रखा। पुलिस ने फरवरी से 40 दिन तक महिला पुलिसकर्मियों के जरिए अंडरकवर ऑपरेशन चलाकर साक्ष्य जुटाए। आरोप हैं कि निजी तस्वीरें-वीडियो से ब्लैकमेल करना, नमाज पढ़ने और गोमांस खाने को मजबूर करना, जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव और मानसिक रूप से तोड़ना—ये सब उसी तंत्र के औजार थे। यह स्थिति दिखाती है कि जब शक्ति का दुरुपयोग संस्थागत रूप ले लेता है, तो पीड़ितों के लिए आवाज उठाना कठिन और जोखिम भरा हो जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पक्ष मानव संसाधन विभाग की भूमिका पर उठते सवाल हैं। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (पोश) के तहत हर संगठन में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) और समयबद्ध, निष्पक्ष जांच अनिवार्य है। इसके बावजूद आरोप हैं कि शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, ईमेल और लिखित आवेदन दबाए गए, और पीड़ितों को चुप रहने के लिए मजबूर किया गया—यहाँ तक कि एक एचआर असिस्टेंट जनरल मैनेजर को भी अनदेखी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जिस विभाग पर कर्मचारियों की सुरक्षा और न्याय की जिम्मेदारी होती है, यदि वही निष्क्रिय या सहभागी दिखे, तो यह कानून की अवहेलना के साथ विश्वास का गंभीर हनन भी है।
चार वर्षों तक लगातार उठती शिकायतों के बावजूद कार्रवाई का अभाव यह स्पष्ट करता है कि समस्या कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की गहरी खामियों में जड़ें जमाए हुए थी। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (पोश) के दिशानिर्देश स्पष्ट करते हैं कि 24 घंटे के भीतर संज्ञान लिया जाए और 90 दिनों में जांच पूरी हो, परंतु यहाँ इन प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी की गई। यह मात्र लापरवाही नहीं, बल्कि कानूनी दायित्वों से बचने की प्रवृत्ति का संकेत देता है। ऐसे मामलों में देरी न केवल पीड़ित के मानसिक आघात को गहरा करती है, बल्कि आरोपियों के हौसले भी बढ़ाती है।
“जीरो टॉलरेंस” की नीति का हवाला तब खोखला लगता है, जब सवाल उठता है कि वर्षों तक शिकायतें दबने और पीड़ितों की आवाज अनसुनी रहने के दौरान यह लागू क्यों नहीं हुई। टीसीएस द्वारा उच्च प्रबंधन स्तर पर जांच (सीओओ के निर्देशन में) के आदेश और आरोपियों का निलंबन आवश्यक कदम हैं, पर पर्याप्त नहीं—क्योंकि नेसेंट इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एम्प्लॉइज़ सीनेट ने श्रम मंत्रालय से पोश कंप्लायंस ऑडिट की मांग की है। जवाबदेही केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; उसे उन सभी स्तरों तक तय होना चाहिए जहाँ लापरवाही या मिलीभगत रही हो। कॉर्पोरेट संस्थानों की साख मुनाफे या छवि से नहीं, बल्कि कर्मचारियों की सुरक्षा, सम्मान, पारदर्शिता और विश्वास से बनती है।
यह घटना किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे आईटी क्षेत्र में कार्यस्थल की सुरक्षा पर गहरे और असहज प्रश्न खड़े करती है। क्या आधुनिक दफ्तर वास्तव में सुरक्षित हैं, या केवल बाहर से सजे-धजे और आकर्षक दिखते हैं? क्या महिलाओं और अन्य कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ेगा? यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि जब तक शिकायत तंत्र मजबूत, पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं होगा, तब तक किसी भी कानून का प्रभाव सीमित और अधूरा ही रहेगा। कर्मचारियों के भीतर यह विश्वास होना चाहिए कि उनकी आवाज न दबेगी, न अनसुनी होगी—बल्कि उसे गंभीरता से सुना जाएगा और उन्हें समयबद्ध न्याय अवश्य मिलेगा।
अब समय केवल औपचारिक प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि ठोस और निर्णायक सुधार का है। इस प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यापक जांच होनी चाहिए, दोषियों को कठोर दंड मिले और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (पोश) के अनुपालन की स्वतंत्र ऑडिट पूरे आईटी क्षेत्र में कराई जाए। साथ ही मानव संसाधन तंत्र को स्पष्ट रूप से जवाबदेह बनाना और कर्मचारियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। कार्यस्थल केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और विश्वास का वातावरण होना चाहिए। यदि इस घटना से भी ठोस सबक नहीं लिया गया, तो यह महज़ एक और मामला बनकर रह जाएगा—और यह किसी भी समाज की सबसे बड़ी विफलता होगी।





