एडवोकेट जयदेव राठी
हाल ही में सोशल मीडिया पर ‘कोकरोच जनता पार्टी’ नामक एक सैटायरिकल मूवमेंट ने भारतीय राजनीतिक चर्चाओं में तेजी से जगह बनाई है। इसकी शुरुआत 30 वर्षीय अभिजीत दीपके ने की, जो वर्तमान में अमेरिका के बॉस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशन्स में मास्टर की पढ़ाई कर रहे हैं। यह मूवमेंट मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक टिप्पणी के बाद वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने बेरोजगार युवाओं को ‘कोकरोच’ जैसा संबोधित किया था। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका तात्पर्य नकली डिग्री वाले लोगों से था, न कि सामान्य बेरोजगार युवाओं से । न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के मुख से निकले ये शब्द देश के उस युवा वर्ग के घाव पर नमक की तरह थे, जो पहले से ही बेरोजगारी और निराशा के दलदल में धँसा हुआ है। अभिजीत दीपके, जो एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं और जो 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया और चुनाव अभियान टीम से जुड़े रहे थे, ने “कॉकरोच जनता पार्टी” के नाम से एक सोशल मीडिया अभियान खड़ा कर दिया।
दीपके के अनुसार यह बिल्कुल आवेग में लिया गया निर्णय था। उन्होंने एक्स पर लिखा, “क्या हो अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएँ?” और इस एक पोस्ट को 700 से 800 बार रीपोस्ट किया गया, जिसके बाद लहर उठती चली गई।
एक सप्ताह से भी कम समय में इस व्यंग्यात्मक पार्टी के इंस्टाग्राम पर 1 करोड़ 90 लाख से अधिक फॉलोवर हो गए। जो भाजपा के इंस्टाग्राम अकाउंट की संख्या से लगभग दोगुनी है।
यहाँ विचार करने योग्य पहला प्रश्न यह है कि यह सब इतनी तेज़ी से कैसे हुआ? क्या यह केवल न्यायाधीश के बयान की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी, या फिर किसी सुनियोजित डिजिटल रणनीति का परिणाम? दीपके ने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने आप के लिए मीम आधारित डिजिटल अभियानों में काम किया था। अर्थात् वे भारतीय डिजिटल राजनीति के भीतरी पेंच जानते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो अमेरिका में बैठकर भारत की न्यायपालिका, सरकार और मीडिया पर एक साथ प्रहार करता है, और जो कहता है कि “भारत आज एक सड़े हुए स्थान की तरह है जहाँ कॉकरोच पैदा होते हैं” उसकी मंशा केवल व्यंग्य तक सीमित नहीं लगती।
पार्टी के घोषणापत्र में अंबानी और अडानी के स्वामित्व वाले सभी मीडिया संस्थानों के लाइसेंस रद्द करने की माँग है, जिन्हें मोदी के करीबी माना जाता है। इसके अतिरिक्त भाजपा को अनफॉलो करने का आह्वान भी किया जा रहा है। यह देखना सहज है कि निशाने पर केवल एक ही पार्टी है, वह पार्टी जो आज विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सरकार चला रही है। यदि यह आंदोलन वास्तव में युवाओं की पीड़ा की अभिव्यक्ति होता, तो यह सभी दलों की नाकामियों को समान रूप से कटघरे में खड़ा करता। परंतु ऐसा नहीं हो रहा।
भारत में बेरोजगारी की पीड़ा वास्तविक है। परंतु इस पीड़ा को एक विदेशी धरती से संचालित सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से राजनीतिक हथियार बनाना, यह प्रश्न उठाता है कि इस अभियान का असली उद्देश्य क्या है?
दक्षिण एशिया में जेन-जी के नेतृत्व में चले आंदोलनों ने श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में सरकारें पलट दी हैं। इन देशों में जो हुआ उसके बाद वहाँ स्थिरता आई या और अधिक अराजकता यह किसी से छिपा नहीं है। बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद वहाँ हिंदुओं पर जो अत्याचार हुए, वे इतिहास की काली स्याही से लिखे जाएँगे। अब जब कोई यही मॉडल भारत में आजमाने की कोशिश करता है, तो यह सतर्कता की नहीं, सावधानी की नहीं, बल्कि गहरी चिंता की माँग करता है।
भारत का युवा आज एक विचित्र दोराहे पर खड़ा है। एक ओर है असली पीड़ा, रोजगार की कमी, महँगाई, व्यवस्था में विश्वास का क्षरण। दूसरी ओर है एक सुनियोजित डिजिटल जाल, जिसमें व्यंग्य का चोला पहनाकर विरोध को भड़काया जा रहा है। जो युवा वर्ग देश की उन्नति का स्तंभ बनना चाहिए, उसे “कीड़े-मकोड़े” की पहचान स्वीकार करने पर उकसाया जा रहा है। यह एक मनोवैज्ञानिक खेल है, जब आप किसी को बार-बार यह बताते हैं कि “तुम कीड़े हो, तुम्हारी कोई नहीं सुनता” तो उसके भीतर एक पराजयबोध और व्यवस्था-विरोध की जो भावना जन्म लेती है, वह विनाशकारी परिणाम दे सकती है।
स्वयं दीपके ने कहा है कि भारत का युवा परिपक्व है और वह केवल संवैधानिक तरीकों से विरोध व्यक्त करेगा। यदि यह बात सच है, तो फिर भाजपा को अनफॉलो करने का आह्वान क्यों? अगर यह केवल व्यंग्य था, तो घोषणापत्र क्यों बनाया? अगर यह केवल रचनात्मकता थी, तो आप से पुराना नाता क्यों जोड़ा? ये प्रश्न अनुत्तरित हैं और इन्हें अनुत्तरित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
भारत आज विश्व की पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। चंद्रयान की सफलता से लेकर डिजिटल इंडिया की छलाँग तक, देश ने जो उपलब्धियाँ अर्जित की हैं, वे विदेशी ताकतों की आँखों की किरकिरी बनी हुई हैं। जब देश मजबूत होता है, तो उसे कमजोर करने के नए-नए तरीके खोजे जाते हैं। पहले किसान आंदोलन में यही हुआ, जब विदेशी हस्तियाँ भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगी थीं। आज डिजिटल माध्यम से यही कोशिश नए रूप में सामने है।
चाणक्य ने कहा था, “शत्रु तभी मजबूत होता है जब उसे भीतर से सहयोग मिले।” आज जब देश के कुछ बुद्धिजीवी और पत्रकार भी इस अभियान को महिमामंडित करने में जुटे हैं, तो वह चाणक्य-वचन और भी प्रासंगिक हो उठता है। बाहर का शत्रु उतना खतरनाक नहीं होता जितना वह जो भीतर से मार्ग प्रशस्त करे।
अंत में यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है, युवाओं की पीड़ा को नकारना न तो उचित है, न संभव। बेरोजगारी एक वास्तविक समस्या है जिसका समाधान निकालना सरकार का दायित्व है। परंतु जो युवा स्वयं को शेर बनने की क्षमता रखता है, उसे “कीड़े-मकोड़े” की पार्टी का सदस्य बनने के लिए प्रेरित करना, यह उसकी शक्ति को नष्ट करने का षड्यंत्र है, उसकी पीड़ा का उपचार नहीं। देश के युवाओं को यह समझना होगा कि उनका विवेक ही उनका सबसे बड़ा हथियार है। उसे किसी बोस्टन की प्रयोगशाला में तैयार किए गए डिजिटल अभियान के हाथों बंधक मत बनने दो।





