केरल से कांग्रेस आलाकमान का संदेश: जमीनी नेताओं को मिलेगी कमान

Congress high command's message from Kerala: Grassroots leaders will take charge

दिलीप कुमार पाठक

केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की बंपर जीत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने एक बहुत बड़ा और सकारात्मक राजनीतिक फैसला लिया है। दिल्ली दरबार ने किसी भी गुटबाजी के आगे न झुकते हुए केरल के लोकप्रिय नेता वी. डी. सतीशन को नया मुख्यमंत्री चुनकर देश भर के कार्यकर्ताओं को एक ठोस संदेश दिया है। यह संदेश जनता की तरफ से नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आया है, जिसने यह जता दिया है कि अब पार्टी पुराने ढर्रे और गलतियों से सबक सीख चुकी है।

आलाकमान का यह कदम साफ इशारा करता है कि संगठन को मजबूत करने के लिए अब केवल जमीन पर पसीना बहाने वाले चेहरों को ही तवज्जो दी जाएगी।कांग्रेस के इतिहास में लंबे समय से एक बड़ी कमजोरी रही है, जहां जमीन पर रात-दिन काम करने वाले जनप्रिय नेताओं की जगह दिल्ली में लॉबिंग करने वाले नेताओं को कमान सौंप दी जाती थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों में जनता और कार्यकर्ता दिल से चाहते थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे ऊर्जावान युवाओं को मुख्यमंत्री बनाया जाए। लेकिन दिल्ली दरबार ने पुराने समीकरणों को प्राथमिकता देते हुए कमलनाथ और अशोक गहलोत के हाथों में सत्ता सौंप दी। नतीजा यह हुआ कि संगठन कमजोर होता गया और अंदरूनी कलह से राज्यों में बनी-बनाई सरकारें हाथ से निकल गईं या कमजोर हो गईं। ठीक ऐसा ही हाल आज कर्नाटक और हरियाणा में भी देखने को मिल रहा है। कर्नाटक में सिद्धासरमैया और डी. के. शिवकुमार के बीच की खींचतान और हरियाणा की आंतरिक गुटबाजी ने पार्टी संगठन को भारी नुकसान पहुंचाया है। केरल के ताजा फैसले से कार्यकर्ताओं में यह बड़ी उम्मीद जगी है कि आलाकमान अब बहुत जल्द कर्नाटक और हरियाणा की इस आपसी लड़ाई को भी इसी कड़े नेतृत्व के साथ हमेशा के लिए दूर करेगा। पार्टी के शीर्ष नेताओं को अब बिना वक्त गंवाए इन दोनों राज्यों के मतभेदों को सुलझाना चाहिए ताकि वहां भी संगठन को एकजुट और मजबूत किया जा सके। केरल में लिया गया यह फैसला पूरी पार्टी के लिए एक बेहतरीन नजीर बन गया है।

वी. डी. सतीशन पिछले पांच सालों से विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में लगातार सरकार को घेर रहे थे और कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में साथ खड़े थे। आलाकमान ने जमीनी हकीकत को सर्वोपरि मानकर उनके नाम पर मुहर लगाई। इससे पैराशूट नेताओं का दौर खत्म हुआ है और कार्यकर्ताओं में नया उत्साह जागा है। उन्हें यह भरोसा मिला है कि अब दिल्ली की पैरवी नहीं, बल्कि जमीन पर किया गया काम ही नेता तय करेगा। इस निर्णय के साथ ही विपक्ष का वह एजेंडा भी पूरी तरह हवा में उड़ गया, जिसमें दुष्प्रचार किया जा रहा था कि होने वाले मुख्यमंत्री इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के पसंदीदा हैं और कांग्रेस तुष्टिकरण के रास्ते पर चल रही है। सतीशन की धर्मनिरपेक्ष और बेदाग छवि ने इस पूरे राजनीतिक एजेंडे को ध्वस्त कर दिया है। क्यों कि मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने से ठीक पहले, वी. डी. सतीशन ने तिरुवनंतपुरम के ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर जाकर भगवान विष्णु की पूरी विधि-विधान से पूजा-पाठ की और उनका आशीर्वाद लिया। पारंपरिक सफेद मुंडू और शॉल में उनकी मंदिर की ये तस्वीरें यह साफ करती हैं कि वे जनता की सांस्कृतिक आस्थाओं का कितना गहराई से सम्मान करते हैं और सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। कुल मिलाकर, केरल के बहाने कांग्रेस आलाकमान ने खुद को बदलने और सुधारने का एक बड़ा संदेश दिया है। अब पार्टी को बिना समय गंवाए कर्नाटक और हरियाणा जैसे राज्यों में चल रहे पुराने मकड़जाल को भी पूरी तरह साफ करना होगा। जब तक दिल्ली से थोपे जाने वाले फैसलों को बंद करके जमीनी संघर्ष करने वालों को हक नहीं मिलेगा, तब तक पूरे देश में संगठन मजबूत नहीं हो सकता। केरल का यह नया मॉडल ही कांग्रेस के भविष्य की असली राह है जिससे पूरे देश की राजनीति प्रभावित होगी।