सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा, इसे अपराध नहीं माना जा सकता: बॉम्बे हाई कोर्ट

Criticizing the government is part of democracy; it cannot be considered a crime: Bombay High Court

प्रीती पांडेय

लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकार की नीतियों से असहमति जताने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है। केवल सरकार के खिलाफ नारे लगाने या विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के आधार पर किसी व्यक्ति को उसके अपने शहर से बाहर नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए महाराष्ट्र पुलिस द्वारा जारी एक वर्ष के एक्सटर्नमेंट (निर्वासन) आदेश को रद्द कर दिया।

यह फैसला न्यायमूर्ति माधव जामदार की पीठ ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महाराष्ट्र महासचिव और पूर्व लोकसभा प्रत्याशी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका पर सुनाया। अदालत ने माना कि प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों की अनदेखी करते हुए नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए। न्यायमूर्ति जामदार ने मौखिक रूप से कहा कि नागरिकों को सरकार की नीतियों का विरोध करने, प्रदर्शन करने और अपनी असहमति दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि केवल “बीजेपी सरकार मुर्दाबाद” या “अमित शाह मुर्दाबाद” जैसे नारे किसी व्यक्ति के खिलाफ निर्वासन जैसी कठोर कार्रवाई का आधार कैसे बन सकते हैं।

उन्होंने हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि ऐसे मामलों पर जनता विरोध जताती है और उसके जवाब में प्रदर्शनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए जाते हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस जनता की सेवक है और उसकी जवाबदेही नागरिकों के प्रति है, किसी राजनीतिक दल या सरकार के प्रति नहीं।

लिखित आदेश में क्या कहा गया
अपने लिखित आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार के कुछ निर्णयों का विरोध करना किसी व्यक्ति को उसके निवास क्षेत्र से बाहर करने का वैध आधार नहीं हो सकता। अदालत के अनुसार ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा गरिमा के साथ जीवन जीने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ पारित एक्सटर्नमेंट आदेश का वास्तविक आधार उनके द्वारा विभिन्न विरोध प्रदर्शनों का आयोजन और उनमें भागीदारी था। न्यायालय ने माना कि केवल इसी कारण किसी नागरिक के खिलाफ इतनी कठोर प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।

किन मुद्दों पर दर्ज हुए थे मामले
सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), बाबरी मस्जिद विवाद, ज्ञानवापी मस्जिद प्रकरण, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार तथा ईंधन की बढ़ती कीमतों सहित कई सार्वजनिक मुद्दों पर आयोजित आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं।

रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2019 से 2024 के बीच विरोध प्रदर्शनों से जुड़े विभिन्न मामलों में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थीं। इन्हीं मामलों के आधार पर अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत एक्सटर्नमेंट की प्रक्रिया शुरू की गई।

एक वर्ष के लिए मुंबई से किया गया था बाहर
दिसंबर 2025 में चेंबूर के पुलिस उपायुक्त ने आदेश जारी कर चौधरी को 12 महीने के लिए मुंबई शहर और मुंबई उपनगर की सीमाओं से बाहर रहने का निर्देश दिया। आदेश में दावा किया गया था कि उनकी गतिविधियों से लोगों में भय का वातावरण बना और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है।

इसके बाद कोंकण मंडल के मंडलायुक्त ने भी पुलिस के आदेश को बरकरार रखा। दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए चौधरी ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिका में क्या कहा गया
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि एक्सटर्नमेंट आदेश ऐसे समय लागू किया गया जब मुंबई नगर निकाय चुनाव की तैयारियां चल रही थीं और उन्हें अपनी राजनीतिक पार्टी के लिए संगठनात्मक तथा प्रचार संबंधी कार्य करने थे। उनका कहना था कि प्रशासन ने असहमति की आवाज को दबाने के उद्देश्य से कानून का दुरुपयोग किया।

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा लगाया गया यह आरोप कि उनकी गतिविधियों से आतंक या भय का माहौल बना, स्थानीय लोगों के बयानों से मेल नहीं खाता और इसका कोई ठोस आधार नहीं है।

बचाव पक्ष की दलील
चौधरी की ओर से अधिवक्ता पायोशी रॉय और इब्राहिम हरबत ने अदालत में कहा कि महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 का प्रयोग इस मामले में कानून की मंशा के विपरीत किया गया। उनका तर्क था कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्ज भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के मामलों को एक्सटर्नमेंट का आधार नहीं बनाया जा सकता।

उन्होंने अदालत को बताया कि धारा 56 का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई करना है जिनसे समाज, जीवन या संपत्ति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न होता हो। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों को इस श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना शक्ति का दुरुपयोग
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पुलिस द्वारा उपलब्ध कानूनी शक्तियों का उचित उपयोग नहीं बल्कि दुरुपयोग किया गया। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री एक्सटर्नमेंट जैसी कठोर कार्रवाई को उचित नहीं ठहराती।

इसी आधार पर न्यायालय ने पुलिस आयुक्त द्वारा पारित आदेश और उसके विरुद्ध अपील में पारित आदेश—दोनों को निरस्त कर दिया।

फैसले पर प्रतिक्रियाएं
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला दिखाता है कि न्यायपालिका में अब भी ऐसे न्यायाधीश मौजूद हैं जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार से सवाल पूछने का साहस रखते हैं।

उधर एसडीपीआई ने इस निर्णय को संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की महत्वपूर्ण जीत बताया। पार्टी का कहना है कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और सरकारी नीतियों के खिलाफ नारे लगाना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षित अधिकार हैं। पार्टी ने इसे राज्य शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध एक मजबूत संदेश बताते हुए लोकतांत्रिक असहमति व्यक्त करने वालों के खिलाफ कार्रवाई बंद करने की मांग की।

कौन हैं न्यायमूर्ति माधव जामदार
न्यायमूर्ति माधव जामदार का जन्म 13 जनवरी 1967 को महाराष्ट्र में हुआ। उन्होंने नासिक के पेटे हाई स्कूल और मुंबई के बालमोहन विद्यामंदिर से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कीर्ति कॉलेज से बीएससी तथा रामनारायण रुइया कॉलेज से इंडस्ट्रियल-एनालिटिकल केमिस्ट्री में डिप्लोमा किया। कुछ समय तक उन्होंने फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भी कार्य किया।

बाद में उन्होंने दादर स्थित न्यू लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और वरिष्ठ अधिवक्ता एम. ए. राणे के साथ वकालत शुरू की। उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में सिविल, आपराधिक और संवैधानिक मामलों की पैरवी की तथा अनेक जनहित याचिकाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पर्यावरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध, रेलवे दुर्घटनाओं, हिरासत में मौत, मेडिकल शिक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़े अनेक मामलों में उन्हें अदालत ने एमिकस क्यूरी भी नियुक्त किया।

उन्होंने महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, महाराष्ट्र स्टेट टेक्सटाइल कॉरपोरेशन सहित कई संस्थाओं का प्रतिनिधित्व किया और कुछ समय तक भारत सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता (ग्रुप-2) के रूप में भी सेवाएं दीं। 7 जनवरी 2020 को उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया।