दिलीप कुमार पाठक
सोचिए, अगर हाथ की सिर्फ एक उंगली से किसी भारी चीज को उठाने की कोशिश करें, तो क्या होगा? शायद उंगली में मोच आ जाएगी। लेकिन जब पांचों उंगलियां मिलकर मुट्ठी बन जाती हैं, तो ताकत कई गुना बढ़ जाती है। बस यही सीधा सा फंडा है सहकारिता का। आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर ‘मैं, मेरा और मुझे’ में खोए रहते हैं। लेकिन साल में एक दिन ऐसा आता है जो हमें याद दिलाता है कि जिंदगी की असली गाड़ी अकेले नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने से ही सुचारू रूप से चलती है। जुलाई का पहला शनिवार इसी एकता और भाईचारे के नाम होता है, जिसे लोग तकनीकी भाषा में अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस कह देते हैं।
बहुत से लोग इस भारी-भरकम शब्द को सुनकर कन्फ्यूज हो जाते हैं, लेकिन इसका मतलब बहुत ही सीधा है – एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ना। हमारे समाज में हर किसी के पास बहुत सारा पैसा या बड़ी-बड़ी सिफारिशें नहीं होतीं। किसी के पास कोई छोटा सा हुनर होता है, तो किसी के पास थोड़ी सी जमीन। अब अकेले दम पर तो बड़ा बिजनेस खड़ा करना मुमकिन नहीं है। ऐसे में कुछ लोग आपस में मिलते हैं, अपनी थोड़ी-थोड़ी जमापूंजी एक जगह जमा करते हैं और मिलकर काम शुरू कर देते हैं। यहां कोई बड़ा बॉस या नौकर नहीं होता। जितने लोग, उतने मालिक। सब मिलकर फैसला लेते हैं और जो भी फायदा होता है, उसे आपस में खुशी-खुशी बांट लेते हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था है जहां कोई किसी का हक नहीं मार सकता। इस जादुई फॉर्मूले की सबसे बड़ी मिसाल हमारे घरों में सुबह-सुबह आने वाला ‘अमूल’ दूध है। बरसों पहले गुजरात के कुछ सीधे-साधे किसानों ने मिलकर बिचौलियों की मनमानी के खिलाफ एक छोटी सी मंडली बनाई थी। आज वही छोटी सी शुरुआत दुनिया का इतना बड़ा ब्रांड बन चुकी है कि हर घर की सुबह उसके बिना अधूरी है। इसी तरह सिर्फ सात महिलाओं ने अस्सी रुपये उधार लेकर पापड़ बनाने का काम शुरू किया था, जिसे आज हम ‘लिज्जत पापड़’ के नाम से जानते हैं। आज इस काम से देश की हजारों महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हैं और गर्व से अपना घर चला रही हैं। ये कहानियां गवाह हैं कि जब आम लोग एक साथ आ जाते हैं, तो बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने भी उनके आगे फीके पड़ जाते हैं।आज के समय में जब हर तरफ सिर्फ अपना फायदा देखने की होड़ मची है, वहां यह सोच किसी ठंडी हवा के झोंके जैसी है। बड़ी-बड़ी कंपनियां सिर्फ अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगी रहती हैं, चाहे उसके लिए उन्हें किसी का भी नुकसान करना पड़े। लेकिन जब लोग मिलकर कोई समिति या ग्रुप बनाते हैं, तो वे सिर्फ पैसे के पीछे नहीं भागते। वे अपने साथ-साथ अपने गांव, अपने पड़ोसियों और पर्यावरण का भी ख्याल रखते हैं। यहां अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। सबके वोट की कीमत बराबर होती है। यही वजह है कि यह मॉडल समाज से मंदी और बेरोजगारी जैसी बीमारियों को जड़ से खत्म करने की ताकत रखता है। खासकर हमारे गांवों और छोटे कस्बों में यह सोच किसी वरदान से कम नहीं है। छोटे किसानों को सस्ते दाम पर खाद-बीज दिलाना हो, महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई के जरिए आत्मनिर्भर बनाना हो या कम ब्याज पर लोन देना हो, यह आपसी सहयोग हर जगह ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। यह हमें सिखाता है कि अगर हम अपनी छोटी-छोटी ताकतों को मिला लें, तो एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी की जा सकती है जो हर मुसीबत को रोक देगी। तो चलिए, आज के दिन से एक नई शुरुआत करते हैं। अपने आस-पास की ऐसी छोटी समितियों, स्थानीय कारीगरों और मिलकर काम करने वाले ग्रुप्स को सपोर्ट करें। बाजार से सामान खरीदते वक्त बड़े ब्रांड्स के चमकीले विज्ञापनों में फंसने के बजाय अपने ही लोगों की मेहनत को तवज्जो दें। जब हम एक-दूसरे का सहारा बनेंगे, तभी देश का हर कोना तरक्की करेगा। आखिर असली मजा तो सबके साथ आगे बढ़ने में ही है!





