अशोक भाटिया
सरकारी हॉस्पिटल के सामने बनी मेडिकल, दवाइयां या सर्जिकल सामान इतना महंगा देते क्योकि उनको अपने व्यपार का मुनाफा सुविधा शुल्क के रूप में इन सभी सरकारी हॉस्पिटल के डॉक्टर कर्मचारी उस एरिया का ड्रग इंस्पेक्टर पुलिस म्युनिसिपेलिटी आदि को हिस्सा देना होता है. इसलिए जो चीज ₹100 की आती है उसे 400 में देते हैं क्योकि वो व्यापर करते है इंसानियत नहीं. सरकारी हॉस्पिटल ज़्यादातर गरीब लोग जाते है इसलिए यह ज्यादा तकलीफदेह हो जाता है. प्राइवेट हॉस्पिटल वाले तो लोगो को लूटने के लिए खुद अपना फार्मेसी हॉस्पिटल के अंदर के रखते है जो इंजेक्शन बाहर मार्किट की फार्मेसी से 2750 का मिल सकता है वही प्राइवेट हॉस्पिटल की फार्मेसी आपको 8000 में देते है. दिल्ली एनसीआर में मेदांता हॉस्पिटल है गुरुग्राम में यह मेरा निजी अनुभव है लेकिन डॉक्टर बहुत अच्छे तजुर्बेकार है इलाज अच्छा होता है लेकिन पैसे आप को उनके मनमाने हिसाब से देना होता है जिनका हेल्थ इन्शुरन्स होता है या CGHS वाले सभी को परेशान ही देखा है
इसके अलावा आज कल देश में दवाओं की कीमत सरकार नहीं बल्कि डॉक्टर खुद तय कर रहे हैं। डॉक्टर अपने मुताबिक ब्रांड बनवाते हैं। कीमत फिक्स करते हैं। 38 रुपए की दवा की एमआरपी 1200 रुपए कर दी जा रही है। यह महज एक एग्जाम्पल है, ऐसा तमाम दवाओं में किया जा रहा है। एक्सपर्ट मानते हैं, 20 साल में 40 हजार करोड़ से दवा का कारोबार 2 लाख करोड़ के पास पहुँच गया है। इसका बड़ा कारण वह एमआरपी में बड़े खेल को मानते हैं। 2005 से 2009 तक 50 प्रतिशत एमआरपी पर दवाएँ बिक रही थी। अगर 1200 रुपए की एमआरपी है तो डीलर को 600 रुपए में दी जाती थी। अब डॉक्टर अपने हिसाब से ही एमआरपी तय करवा रहे हैं जबकि नियमों के अनुसार डॉक्टर दवाओं के रेट तय नहीं करते। दवाओं के रेट, दवा बनाने वाली कंपनियाँ तय करती हैं। दवाओं के रेट तय करने में कई कारक शामिल होते हैं। दवाओं पर व्यापारियों को अच्छा मुनाफा होता है।
ब्रांडेड दवाओं पर रिटेलर ज्यादा से ज्यादा 20 25 प्रतिशत तक की छूट देते हैं। जेनेरिक दवाओं पर 50-70 प्रतिशत तक की छूट मिलती है। जेनेरिक दवाएँ सस्ती होती हैं क्योंकि उन्हें महंगी जांचों से नहीं गुजरना पड़ता। दवा खरीदते समय, दवा के रैपर पर क्यूआर कोड होना चाहिए, दवा के रैपर पर क्यूआर कोड से दवा का नाम, बैंड का नाम, मैन्युफैक्करर की जानकारी, मैन्युफैक्करिंग की तारीख और एक्सपायरी की तारीख मिलती है। दवाओं या उनके अवयवों के बारे में जानकारी के लिए, डॉक्टर या फार्मासिस्ट से पूछा जा सकता है मगर जो दवाएँ सरकार के कंट्रोल से बाहर, उनमें मनमानी दवा की क्वालिटी और एमआरपी की निगरानी के लिए भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइस अथॉरिटी काम करती है। सरकार ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के माध्यम से दवा की एमआरपी पर नियंत्रण रखती है। आवश्यक और जीवन रक्षक दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य निर्धारित करने के साथ डीपीसीओ की जिम्मेदारी मरीजों के लिए दवाएँ सस्ती और सुलभ कराने की भी है।
सरकार जिन दवा को डीपीसीओ के अंडर में लाती है, उनकी एमआरपी तो कंट्रोल में होती है, लेकिन सैकड़ों फॉमूलें की दवाएँ आज भी सरकार के कंट्रोल से बाहर है जिसकी एमआर पी में मनमानी चल रही है। दवाओं की कीमतों में इजाफे को लेकर सरकार की गाइडलाइन है कि एक साल में 10 प्रतिशत ही एमआरपी बढ़ाई जा सकती है लेकिन कंपनियाँ प्रोडक्ट्स का नाम बदलकर हर साल डॉक्टरों की डिमांड वाली एमआरपी बना रही हैं। कंपनियाँ अलग डिवीजन और ब्रांड बदलकर एमआरपी अपने हिसाब से फिक्स कर देती हैं।
फार्मा फैक्ट्रियों से ही देश में दवाएँ सप्लाई की जाती हैं। कंपनियों और डॉक्टरों के इस खेल में कंपनियाँ अपने मुनाफे के लिए नियमों को ताक पर रखकर डॉक्टरों के हिसाब से न सिर्फ, दवाएँ बनाने को तैयार हो जाती है बल्कि मनमानी कीमत भी तय कर देती है। यही नहीं, इन कंपनियों से मोबाइल पर ही डील हो जाती है। तभी तो देश भर में डॉक्टर और हॉस्पिटल खुद अपनी दवाएँ बनवा ही रहे हैं और मनमाफिक मूल्य पर बेच रहे है। डॉक्टर और हॉस्पिटल तो खुद अपनी दवाएँ बनवा रहे हैं और माइक्रो पायलट का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे ही एक्सपायरी निर्धारित होती है।
अगर दवा में माइक्रो पायलट की क्वालिटी थोड़ी डाउन कर दी जाए वो मार्जिन बढ़ जाएगा लेकिन एक्सपायरी का समय कम हो जाएगा। इसके पीछे कारण यह कि मटेरियल और एक्सपायरी को लेकर सरकार की कोई गाइडलाइन नहीं है। एक्सपायरी की डेट भी कंपनियाँ तय करती हैं। सरकार के कंट्रोल में जो दवाएँ हैं, इसे लेकर थोड़ी सख्ती है। बाकी मेडिसिन पर कोई खास निगरानी नहीं है। ये एक गंभीर विषय है कि दवा का निर्माण, आयात या बिक्री करने वाली कंपनियाँ ही दवा की कीमतें निर्धारित करती हैं।
नियमों में कहा गया है कि केवल प्रिस्क्रिप्शन वाली दवा और ओवर-द-काउंटर दवा के प्रकार जो केवल फार्मेसियों में बेचे जा सकते हैं, उन्हें सभी फार्मेसियों में बिल्कुल एक ही कीमत पर बेचा जाना चाहिए। इसलिए, की दवाओं की कीमतें फार्मेसियों के बीच उतार-चढ़ाव नहीं करती हैं, जिसका अर्थ है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपना प्रिस्क्रिप्शन भरने के लिए किस फामेर्सी को चुनते हैं। यही नहीं, दवा बनाने वाली कंपनियों पर ये नियम सख्ती से लागू किये जाए कि वह हर साल्ट का मूल्य भारत सरकार के नियमानुसार एक जैसा निर्धारित करे चाहे ब्रांड कोई भी हो। मूल्य ब्रांड पर न होकर साल्ट पर हो ताकि डॉक्टरों और कंपनियों के काले धंधे पर लगाम लगे और मरीज को 300 रुपए का इंजेक्शन बारह हजार में न खरीदना पड़े।
हर्बल दवाइयों और ओवर-द-काउंटर दवाइयों के प्रकार जो फामेसी के अलावा अन्य दुकानों, जैसे सुपरमार्केट और कियोस्क में बेची जा सकती हैं, उनकी की कीमतों में बदलाव की अनुमति सरकार से हो। ये कीमतें पूरी तरह से स्टोर द्वारा निर्धारित की जाती हैं, इसलिए आपको एक स्टोर से दूसरे स्टोर में कीमतों में अंतर का अनुभव होता है।





