सौरभ वार्ष्णेय
कैंसर आज केवल एक गंभीर बीमारी नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। चिकित्सा विज्ञान ने कैंसर के उपचार में उल्लेखनीय प्रगति की है और नई जीवनरक्षक दवाओं ने लाखों मरीजों को नई उम्मीद दी है। किंतु विडंबना यह है कि इन आधुनिक दवाओं की अत्यधिक कीमतें गरीब और मध्यम वर्ग के लिए इलाज को लगभग असंभव बना देती हैं। ऐसे में प्रश्न केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि जीवन के संवैधानिक अधिकार का बन जाता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की महंगी दवाओं के मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब तलब करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने उस कैंसर मरीज की मृत्यु पर गहरी चिंता व्यक्त की, जो जीवनरक्षक दवाओं को किफायती बनाने से संबंधित मामले के निर्णय की प्रतीक्षा करते-करते दुनिया से विदा हो गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह केवल दवाओं की कीमत का विवाद नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को प्राप्त जीवन और गरिमा के अधिकार का प्रश्न है। यह टिप्पणी देश की स्वास्थ्य नीति के लिए एक गंभीर संदेश है कि न्याय में देरी कई बार जीवन की हानि का कारण बन जाती है।
वास्तविकता यह है कि भारत में हर वर्ष लाखों लोग कैंसर से प्रभावित होते हैं। आधुनिक लक्षित और इम्यूनोथेरेपी दवाओं की कीमत कई बार लाखों रुपये प्रति माह तक पहुंच जाती है। अधिकांश परिवार इतनी बड़ी राशि वहन करने में सक्षम नहीं होते। परिणामस्वरूप अनेक लोग अपनी वर्षों की जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं, कर्ज लेने पर मजबूर हो जाते हैं, जमीन-जायदाद बेच देते हैं या फिर आर्थिक तंगी के कारण बीच में ही इलाज छोडऩे को विवश हो जाते हैं। ऐसे अनेक मामलों में बीमारी से पहले आर्थिक संकट परिवार को तोड़ देता है।
दूसरी ओर यह भी सत्य है कि नई दवाओं के अनुसंधान, परीक्षण और विकास में दवा कंपनियां अरबों रुपये का निवेश करती हैं। पेटेंट व्यवस्था उन्हें सीमित अवधि तक अपने आविष्कार का आर्थिक लाभ प्राप्त करने का अधिकार देती है, जिससे भविष्य के अनुसंधान को भी प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए नवाचार और अनुसंधान की रक्षा आवश्यक है। किंतु जब जीवनरक्षक दवाएं आम नागरिक की पहुंच से बाहर हो जाएं, तब सरकार का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह जनहित और व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करे।
इस दिशा में सरकार को बहुआयामी कदम उठाने होंगे। आवश्यक कैंसर रोधी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाना, गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देना, सरकारी अस्पतालों में इन दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना, आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का दायरा बढ़ाना तथा जरूरत पडऩे पर सार्वजनिक हित में पेटेंट कानूनों के अंतर्गत उपलब्ध प्रावधानों का विवेकपूर्ण उपयोग करना समय की मांग है। साथ ही, देश में दवा अनुसंधान और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित कर आयात पर निर्भरता कम करना भी दीर्घकालिक समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संरक्षक भी है। स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में समय पर निर्णय अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि यहां विलंब का अर्थ कई बार किसी व्यक्ति का जीवन समाप्त हो जाना होता है। इसलिए ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष व्यवस्था की आवश्यकता है।
एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र की पहचान केवल आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और गंभीर बीमारी से जूझ रहे नागरिकों को कितना सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन प्रदान कर पाता है। कैंसर की दवाएं कोई विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन बचाने का अनिवार्य साधन हैं। इसलिए सरकार, दवा उद्योग, चिकित्सा समुदाय और न्यायपालिका—सभी को मिलकर ऐसा संतुलित और मानवीय समाधान विकसित करना होगा, जिसमें अनुसंधान और नवाचार भी सुरक्षित रहें तथा कोई भी मरीज केवल आर्थिक अभाव के कारण जीवनरक्षक उपचार से वंचित न रह जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वास्थ्य को खर्च नहीं, बल्कि निवेश माना जाए। जब जीवन बचाने वाली दवाएं हर जरूरतमंद तक किफायती कीमत पर पहुंचेंगी, तभी संविधान में निहित जीवन के अधिकार की वास्तविक भावना साकार होगी और भारत एक संवेदनशील, समावेशी एवं उत्तरदायी स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में सशक्त कदम बढ़ा सकेगा।





