धरती की कोख उजाड़कर कितने दिन चमकेगा सोने का वैभव?

For how long will the splendor of gold shine after ravaging the womb of the earth?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

सोने का भाव जितनी ऊंचाई छू रहा है, धरती उतनी ही गहराई में धंस रही है। वित्तीय बाजार इसे सुरक्षित निवेश का स्वर्णकाल मान रहे हैं, जबकि प्रकृति इसे अपने अस्तित्व का काला अध्याय। तिजोरियां भर रही हैं, लेकिन नदियां विष से, जंगल वीरानी से और आदिवासी अंचल भय से भर रहे हैं। कभी वैभव, विश्वास और स्थिरता का प्रतीक रही यह पीली धातु आज पर्यावरणीय संहार, संगठित अपराध और वैश्विक अस्थिरता की नई मुद्रा बन चुकी है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बाजार सोने का मूल्य चुकाता है, उसकी पर्यावरणीय कीमत नहीं। हर बढ़ता भाव किसी जंगल की हरियाली, किसी नदी की निर्मलता और किसी समुदाय के भविष्य को गिरवी रखकर हासिल हो रहा है।

उन्नीसवीं सदी की गोल्ड रश अवसरों की कहानी थी, इक्कीसवीं सदी की यह स्वर्ण-दौड़ अस्तित्व का संकट है। सोने की ऊंची कीमतों ने लघु स्वर्ण खनन (आर्टिजनल एंड स्मॉल-स्केल गोल्ड माइनिंग) को अभूतपूर्व रफ्तार दे दी है। छोटे और अवैध खनिक अब केवल धरती की छाती नहीं चीर रहे, पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर शिकंजा कस रहे हैं। घाना, अमेज़न, इंडोनेशिया और अफ्रीका के कई इलाकों में जंगल ऐसे उजाड़े जा रहे हैं, मानो वे धरती के फेफड़े नहीं, लालच के रास्ते की बाधा हों। खनन अब उद्योग नहीं, प्रकृति पर संगठित डकैती है। जहां कभी पक्षियों का कलरव था, वहां अब मशीनों का शोर और विस्फोट हैं।

इस विनाश की सबसे भयावह तस्वीर नदियों में दिखाई देती है। सोना निकालने की सबसे सस्ती तकनीक—पारा (मरकरी) और सायनाइड—आज भविष्य की सबसे महंगी कीमत वसूल रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, दुनिया में मरकरी प्रदूषण का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा केवल आर्टिजनल एंड स्मॉल-स्केल गोल्ड माइनिंग (एएसजीएम) से आता है। हर वर्ष 800 टन से अधिक पारा हवा और जल स्रोतों में घुलकर मछलियों के जरिए पूरी खाद्य श्रृंखला में फैलता है तथा बच्चों के मस्तिष्क विकास पर स्थायी चोट करता है। घाना इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है, जहां लगभग 60 प्रतिशत जल स्रोत दूषित हो चुके हैं और अनेक नदियां पीने योग्य नहीं रहीं। यह केवल जल प्रदूषण नहीं, मानव सभ्यता की जीवनरेखा में घोला जा रहा धीमा ज़हर है।

यह केवल पर्यावरण का नहीं, संगठित अपराध के फैलते साम्राज्य का भी वृत्तांत है। अमेज़न के जंगलों में स्वर्ण खनन अब ड्रग कार्टेलों और अपराधी गिरोहों का नया अड्डा बन चुका है। अनेक क्षेत्रों में इसका मुनाफा कोकीन के कारोबार से भी अधिक माना जा रहा है। चीनी अपराधी नेटवर्क “फ्लाइंग मनी” के जरिए सोने का इस्तेमाल अवैध वस्तुओं के विनिमय और काले धन के लेन-देन में कर रहे हैं। नतीजा यह है कि वहां केवल जंगल ही नहीं उजड़ रहे, कानून का राज भी मिटता जा रहा है। जैव विविधता सिमट रही है, आदिवासी अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं और हिंसा जीवन की सामान्य सच्चाई बनती जा रही है। ब्राजील के मुंडुरुकु आदिवासी क्षेत्र में खनन थमने के बाद भी स्वास्थ्य संकट कायम है। संदेश साफ है—खदानें बंद हो सकती हैं, लेकिन प्रकृति और समाज पर पड़े उनके घाव पीढ़ियों तक नहीं भरते।

यह मानना भूल होगी कि यह संकट केवल अमेज़न या अफ्रीका तक सीमित है। भारत में कर्नाटक, झारखंड, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अवैध स्वर्ण खनन तेजी से समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले रहा है। सरकारी राजस्व लूट रहा है, वन सिकुड़ रहे हैं और नदियां ज़हर निगल रही हैं। यहां भी पारे का अंधाधुंध इस्तेमाल मछलियों, खेती और ग्रामीण स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है। वैश्विक बाजार में सोने की कीमत चढ़ते ही स्थानीय जंगलों पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है। वैश्वीकरण का यही कठोर सच है कि लंदन और न्यूयॉर्क के निवेशकों का मुनाफा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जंगलों की कीमत पर लिखा जा रहा है।

सबसे बड़ा भ्रम यही है कि सोना आज भी केवल आभूषण या निवेश है। सच यह है कि वह अब भू-राजनीति, प्रतिबंधों से बच निकलने, भ्रष्टाचार और राजनीतिक वित्तपोषण का भी सशक्त माध्यम बन चुका है। विकसित देशों के बाजारों तक पहुंचने वाला सोना अपने पीछे छूटे विनाश के निशान साथ नहीं ले जाता। शायद ही किसी उपभोक्ता को पता हो कि उसकी उंगली में चमकती एक साधारण शादी की अंगूठी के पीछे लगभग 20 टन जहरीला खनन अपशिष्ट छिपा है। बाजार धातु की शुद्धता तो परखता है, लेकिन उसके उत्पादन की नैतिकता पर चुप्पी साध लेता है। आधुनिक अर्थव्यवस्था की यही सबसे बड़ी विडंबना है—मुनाफा कुछ हाथों में सिमटता है, जबकि उसकी पर्यावरणीय कीमत पूरी पृथ्वी चुकाती है।

समाधान केवल अवैध खनन पर छापेमारी में नहीं, बल्कि वैश्विक जवाबदेही में है। पारा-मुक्त तकनीकों को बढ़ावा देना होगा, छोटे खनिकों के लिए वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित करनी होगी और पूरी आपूर्ति श्रृंखला को पारदर्शी बनाना होगा, ताकि बाजार तक पहुंचने वाले हर ग्राम सोने की पूरी यात्रा दर्ज रहे। जब तक दुनिया केवल हॉलमार्क देखेगी और उसके पर्यावरणीय पदचिह्न नहीं पूछेगी, तब तक यह संकट थमेगा नहीं। विकास का अर्थ प्रकृति की कीमत पर समृद्धि नहीं, बल्कि संसाधनों और संवेदनाओं के बीच संतुलन है।

प्रकृति कभी अदालत नहीं लगाती, वह केवल अपना फैसला सुनाती है। अब फैसला हमें करना है—सोना बचाना है या धरती। क्या चमकती धातु के लिए हम पृथ्वी की धड़कनें गिरवी रखते रहेंगे? आने वाली पीढ़ियों को विरासत में स्वर्ण भंडार चाहिए या स्वच्छ नदियां, जीवित जंगल और सुरक्षित भविष्य? इतिहास बताता है कि सभ्यताएं खदानों से नहीं, प्रकृति से जीवित रहती हैं। यदि इस अंधी स्वर्ण-दौड़ पर समय रहते अंकुश नहीं लगा, तो तिजोरियां भरती जाएंगी और धरती खाली होती जाएगी। तब मानवता को स्वीकार करना पड़ेगा कि दुनिया की सबसे अनमोल संपत्ति सोना नहीं, प्रकृति थी—जिसे हमने सबसे सस्ता समझकर खो दिया।