जयदेव राठी
भारत का इतिहास छात्र आंदोलनों की उन पवित्र कथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने न केवल शिक्षा प्रणाली को सुधारा, बल्कि समय-समय पर राष्ट्र के गतिरोधों को भी तोड़ा। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर हाल के दशकों में विभिन्न विश्वविद्यालयों तक, छात्रों का आक्रोश हमेशा एक ‘वैध कारण’ और ‘सिस्टमेटिक रिफॉर्म’ के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। लेकिन जब हम हाल के दिनों में ‘नीट’ पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में व्याप्त अनियमितताओं के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन को देखते हैं, तो एक बेहद चिंताजनक और विस्फोटक तस्वीर सामने आती है।
शुरुआत एकदम स्पष्ट और मध्यम वर्ग की पीड़ा को दर्शाने वाली थी। नीट जैसी प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा में पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स का अवैध बंटवारा और टॉपर्स की संदिग्ध रैंकिंग ने लाखों मेधावी छात्रों के सपनों को कुचल दिया था। इसका सीधा और स्वाभाविक निष्कर्ष यह था कि शिक्षा प्रणाली के प्रमुख, तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को नैतिकता के आधार पर पद से इस्तीफा देना चाहिए और जांच की जिम्मेदारी किसी निष्पक्ष एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए। यह आंदोलन ‘योग्यता’ और ‘पारदर्शिता’ की लड़ाई थी। लेकिन जैसे-जैसे यह आंदोलन सड़कों पर उतरा और समय बीता, एक अजीबोगरीब और चिंताजनक विचलन देखने को मिला। मूल एजेंडे का अपहरण कर छात्रों के मंच पर विचारधाराओं का जमावड़ा हो गया, आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि इसका मूल एजेंडा ‘हमें हमारा हक और पारदर्शी परीक्षा दो’ धीरे-धीरे हाशिए पर पड़ता गया। इसके स्थान पर मंचों पर ऐसे मुद्दों, नारों और विचारधाराओं ने जगह बना ली, जिनका नीट या शिक्षा प्रणाली से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
सड़कों और मंचों पर जो नारे लगने लगे, वे छात्रों की पीड़ा का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘कल्चर वॉर’ का हिस्सा लग रहे थे। जब मंच से यह कहा जाने लगा कि “उमर खालिद के पक्ष में बोलो तो देश द्रोही नहीं हो सकता,” तो यह स्पष्ट था कि मुद्दा अब ‘पेपर लीक’ नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्र-विरोध’ के बहस का अखाड़ा बन चुका है। इसी कड़ी में पहचान की राजनीति और लैंगिक विमर्श के ऐसे नारे ‘मेरा लिंग मेरी मर्जी’ शामिल किए गए, जो भारतीय मध्यम वर्ग और मुख्यधारा के छात्रों के तत्कालीन संघर्ष से पूरी तरह अप्रासंगिक थे।
सबसे चिंताजनक बात जो रही, वह थी सनातन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ की गईं भड़काऊ टिप्पणियां। “सीता के पति, बस नाम रहेगा अल्लाह का” जैसे अत्यंत विभाजनकारी और उत्तेजक नारे किसी छात्र आंदोलन की उपज नहीं हो सकते। ये नारे किसी गहरी साजिश और विचारधारात्मक घृणा का प्रतीक हैं। सवाल यह उठता है कि क्या नीट के पीड़ित छात्रों ने अपने भविष्य को बर्बाद होते देख यह आंदोलन किया था ताकि मंचों पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ा जा सके? या ताकि भारतीय सभ्यता और आस्था के केंद्रों पर प्रहार किया जा सके?
यह स्पष्ट संकेत था कि आंदोलन का ‘हाईजैक’ हो चुका है। छात्रों का गुस्सा एक ‘ट्रोजन हॉर्स’ बन गया, जिसके भीतर छिपकर कुछ विशिष्ट विचारधाराएं, जो देश की मुख्यधारा से कटी हुई हैं, अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश कर रही थीं
जिस तरह विचारधारात्मक तत्वों ने मंचों पर कब्जा किया, उसी तरह राजनीतिक दलों ने भी इस आंदोलन को अपने वोट-बैंक और संसदीय घमासान का हथियार बना लिया। विपक्षी पार्टियों का जमावड़ा लगना स्वाभाविक था, क्योंकि सरकार के खिलाफ एक मुद्दा हाथ लगा था। लेकिन विपक्ष की भूमिका भी अत्यंत अवसरवादी रही।
विपक्षी दलों को इस बात की चिंता नहीं थी कि नीट की परीक्षा प्रणाली को कैसे सुधारा जाए, या भविष्य में सीबीआई, एसआईटी जांच के साथ-साथ परीक्षा कराने वाली संस्थाओं एनटीए को कैसे जवाबदेह बनाया जाए। उनका पूरा फोकस इस बात पर था कि कैसे सड़क पर शोर मचाकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाए और संसद में गतिरोध पैदा किया जाए। छात्रों की असली समस्या जो थी ‘सिस्टम की मरम्मत’ विपक्ष के शोर-शराबे में कहीं दब गई। जब आंदोलन का रूप ‘छात्र आक्रोश’ से बदलकर ‘राजनीतिक महोत्सव’ और ‘विपक्ष का रोड-शो’ लेने लगा, तो आम जनमानस और मुख्यधारा के छात्र इससे दूर होने लगे।
आज के छात्र आंदोलनों में कोई ऐसा केंद्रीय नेतृत्व नहीं है जो यह तय कर सके कि आंदोलन की ‘लक्ष्मण रेखा’ क्या है। जब मंच पर माइक उन लोगों के हाथ में चला जाता है जिनका मकसद शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि समाज में विष घोलना या राजनीतिक रोटी सेंकना होता है, तो आंदोलन की दिशा भटकना तय है।
नीट जैसे मुद्दे पर पूरा भारतीय मध्यम वर्ग छात्रों के साथ खड़ा था। लेकिन जब मंचों से सनातन विरोधी नारे और देश-विरोधी तत्वों का समर्थन करने वाली बयानबाजी होने लगी, तो मध्यम वर्ग ने खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया। भारतीय समाज अपनी आस्था और राष्ट्रवाद से समझौता नहीं करता। विचारधाराओं ने इस आंदोलन को अपने हाथों से उसकी सबसे बड़ी ताकत ‘जनसमर्थन’ को छीन लिया। आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर जो नारे और विचारधाराएं वायरल की गईं, वे छात्रों की जमीनी हकीकत नहीं थीं, बल्कि कुछ विशिष्ट ‘इको चैंबर्स’ उपज थीं। इन तत्वों ने छात्रों की भावनाओं का इस्तेमाल करके अपने एजेंडे को ‘मेनस्ट्रीम’ करने की कोशिश की।
अंततः, इस पूरे विमर्श और आंदोलन में सबसे बड़ी हार ‘छात्र’ की हुई है। नीट के वो छात्र, जिन्होंने रात-रात भर जाकर मेहनत की थी और जिनके साथ धोखाधड़ी हुई थी, उनका न्याय कहीं गुम हो गया। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे या एनटीए के पुनर्गठन की मांग अब केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है। आंदोलन के नाम पर जो ‘विचारधाराओं का जमावड़ा’ लगा, उसने यह साबित कर दिया कि भारत में जब भी कोई वैध और जन-समर्थित मुद्दा उठता है, तो कुछ ऐसे तत्व सक्रिय हो जाते हैं जो उस मुद्दे को ‘कल्चर वॉर’ और ‘राजनीतिक हथकंडे’ में बदलने का कोई मौका नहीं चूकते।
यह समय सरकार और समाज दोनों के लिए एक चेतावनी है। सरकार को परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि छात्रों का विश्वास बहाल हो सके। लेकिन समाज और छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनके वैध अधिकारों की लड़ाई को किन्हीं ‘एंटी-नेशनल’ या ‘एंटी-सनातन’ विचारधाराओं के घुड़सवारों को अपने कंधों पर नहीं बैठने देना चाहिए। नीट का घोटाला एक आपराधिक और प्रशासनिक विफलता थी, उसे एक विचारधारात्मक या राजनीतिक युद्ध का मोहरा बनने देना, उन लाखों छात्रों के भविष्य के साथ सबसे बड़ा धोखा होगा, जिन्होंने सिर्फ ‘न्याय’ मांगा था, ‘अराजकता’ नहीं।





