दहेज के कारण आखिर कब तक जान गंवाती रहेंगी महिलाएं ?

How long will women continue to lose their lives due to dowry?

अशोक भाटिया

नोएडा की 33 वर्षीय ट्विशा शर्मा, जो पूर्व मिस पुणे भी रह चुकी थीं, मात्र पांच महीने की शादी के बाद भोपाल के कटारा हिल्स स्थित ससुराल में 12 मई 2026 की रात संदिग्ध परिस्थितियों में फांसी पर लटकी मिलीं। शादी दिसंबर 2025 में डेटिंग ऐप पर मिले वकील समर्थ सिंह के साथ हुई थी। ट्विशा हाल ही में दो महीने की प्रेग्नेंट थीं, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में एक हफ्ते पहले मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) का खुलासा हुआ। मायके पक्ष का दावा है कि यह जबरन अबॉर्शन था, जिसमें सास रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह और पति समर्थ सिंह ने मानसिक यातना देकर ट्विशा को मजबूर किया। परिवार ने आरोप लगाया कि ट्विशा को पितृत्व पर संदेह कर उसके चरित्र पर सवाल उठाए गए, जिससे उस पर जबरदस्त मेंटल टॉर्चर हुआ। इस मामले में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मल्टीपल एंटीमॉर्टम इंजरी (मौत से पहले की कई चोटें) मिलने से हत्या की आशंका और मजबूत हो गई है। मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि पति समर्थ सिंह पेशे से वकील हैं और उनके माता-पिता रिटायर्ड जज रह चुके हैं। ट्विशा के परिवार ने इसे आत्महत्या नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या करार दिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जबरन गर्भपात, शरीर पर चोटों के निशान और मौत से पहले की आखिरी कॉल जैसे कई तथ्य अब इस मामले को और रहस्यमयी बना रहे हैं।

चूंकि आरोपी परिवार न्यायिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है, इसलिए ट्विशा के परिजनों ने स्थानीय पुलिस जांच पर सवाल उठाए हैं। परिवार का आरोप है कि प्रभाव के चलते पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई नहीं कर रही। इसी वजह से परिवार ने मध्य प्रदेश से बाहर सीबीआई जांच की मांग की है। वहीं, सास को अग्रिम जमानत मिलने के बाद परिवार ने शव लेने से इनकार करते हुए दिल्ली एम्स में दोबारा पोस्टमार्टम कराने की मांग उठाई है।

वैसे गिरिबाला सिंह के खिलाफ शुक्रवार को भोपाल पुलिस ने दहेज हत्या का मामला दर्ज किया है । इसके बाद गिरिबाला सिंह ने भोपाल जिला अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगा दी। शुक्रवार देर शाम तक चली सुनवई और परिजनों के विरोध के बावजूद जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत से गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत मिल गई। सिंह को अग्रिम जमानत मिलने के बाद से परिजन और आक्रोशित हो गए और कहने लगे कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सभी चीजों का उल्लेख नहीं है, इसलिए लिए अग्रिम जमानत मिल गई है। सोमवार 18 मई को ट्विशा के पति और अधिवक्ता समर्थ सिंह की अग्रिम जमानत पर भोपाल जिला न्यायालय में सुनवाई होनी है। अग्रिम जमानत मिलने के बाद से ही परिजन अधिक आक्रोशित हैं। खैर अब यह न्यायिक प्रतिक्रिया में उलझा मामला चलता रहेगा व इसके रिजल्ट की हमें प्रतिक्षा ही करनी होगी ।

वैसे ट्विशा शर्मा की दहेज़ हत्या का सामने आया पहला मामला नहीं है । इसके पहले भी केरल के कोल्लम ज़िले में बीते 21 मार्च को एक 27 साल की महिला थूशरा की मौत हो गई। मौत के वक्त उसका वज़न महज़ बीस किलो रह गया था। दरअसल, थूशरा की शादी के वक्त दो लाख रुपए दहेज की मांग रखी गई थी जो उसके माता-पिता नहीं दे पाए। दहेज की मांग पूरी न होने के कारण उसका पति और सास उसका शोषण करते थे। उन्होंने स्वीकार भी किया कि थूशरा को खाने के लिए रोज़ पानी मिलाकर चावल और चीनी के अलावा कुछ और नहीं दिया जाता था। वहां के पोस्टमैन ने पुलिस को बताया कि इस घटना की जानकारी पड़ोसियों को न हो, इसके लिए थूशरा को टिन की घेराबंदी वाले घर के भीतर कैद कर के रखा गया था। यह घटना भारत के सर्वाधिक शिक्षित राज्य की है। यह घटना आज की है। यह घटना दहेज हत्या की श्रेणी में ही आएगी। वह दहेज हत्या जो उत्तर-आधुनिक समय में भी न जाने कितनी महिलाओं की मौत का कारण बनती है।

गौरतलब है कि शादी-शुदा महिलाओं की हत्याएं, जिन्हें ससुराल में पति और अन्य सदस्यों ने दहेज के लिए या तो क़त्ल कर दिया गया हो अथवा लगातार उत्पीड़न और यातना देकर आत्महत्या के लिए बाध्य किया जाए, दहेज हत्या कहलाती है। दहेज हत्या एक ऐसा अपराध है जहां महिलाओं के लिए उनके अपने घर ही सबसे असुरक्षित स्थान बन जाते हैं। दहेज और उससे जुड़े अपराधों के मामले में भारत दुनियाभर में पहले स्थान पर आता है। इसके बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और ईरान आते हैं, जहां दहेज हत्या एक बड़ी समस्या बन चुकी है।

दहेज हत्या मूल रूप से पितृसत्ता का ही एक रूप है जिसकी जड़ें प्राचीन इतिहास के कबीलाई परंपराओं में छिपी हैं। लिंग आधारित श्रम विभाजन के बाद कबीलों में एक संस्कृति विकसित हुई जिसके तहत महिलाओं का आदान-प्रदान होता था। कबीले के अस्तित्व के लिए महिलाएं चुप रहती थी जो बाद में संस्कृति के रूप में उनके शोषण का आधार बनी। इस प्रक्रिया में महिलाओं के साथ-साथ पशुओं, कीमती पत्थरों और ज़रूरी सामानों का भी आदान-प्रदान होता था जिससे बेहतर संबंध स्थापित हो। बाद में इस प्रक्रिया के तहत महिलाएं पुरुषों की संपत्ति मानी जाने लगी और उनका अपने पर कोई अधिकार नहीं रहा।

आज के उत्तर-आधुनिक समाज में भी स्त्री दर्जे में पुरूष से कमतर मानी जाती हैं, इसलिए उसकी स्वीकारोक्ति के लिए शादी में धन की कई बार खुली और कभी मूक मांग रखी जाती है। इस मांग को यह कहकर जायज़ ठहराया जाता है कि लड़की के माता-पिता जो कुछ भी दे रहे हैं, उनकी बेटी के लिए ही हैं। यह एक तरह से सौदा होता है, जिसमें किसी लड़की को ब्याहने के लिए लड़का और उसके परिवार वाले मोटी रक़म चाहते हैं। दहेज की मांग भारतीय समाज में सामान्य बात हो चुकी है। दहेज की प्रथा मानो शादी का एक अभिन्न अंग बन चुकी है। यह प्रथा सभी समूहों में मौजूद है चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग, धर्म के हों। लड़की ब्याहने के लिए लड़के के परिवार की हैसियत के अनुसार दहेज देना पड़ता है। यह ब्याह होने की अनिवार्य शर्त भी है। रूढ़िवादी भारतीय समाज शादी की संस्था और पारिवारिक संरचना में सुधार करने की बजाय इसे पारंपरिक रूप में ही चलाना चाहता है। इस समाज के लिए यह महत्वपूर्ण है ही नहीं कि शादी से पहले लड़के और लड़की में सामंजस्य और आपसी समझ विकसित हो, जिससे बेहतर समाज बन सके। यहां रिश्ते की नींव ही लड़की के घर से मिलने वाला दहेज तय करता है।

हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में दहेज के कारण रोज़ 21 महिलाओं की मौत होती है। शोध और अध्ययन से पता चलता है कि दहेज हत्या से संबंधित कुल घटनाएं, जो दर्ज होती हैं, उनमें से 93 फ़ीसद मामलों में चार्जशीट दाख़िल होती है और उनमें से केवल 1/3 मामले में आरोपी दोषी साबित हो पाते हैं। दहेज हत्या के संबंध में न्यूनतम दंड 7 साल की उम्रक़ैद है। दहेज हत्या के मामले में जज के पास यह अधिकार भी है कि वह अपने विवेक से आजीवन कारावास तक की सज़ा सुना सकता है। इतनी कठोरता के बाद भी दहेज के मामले कम नहीं हो रहे यह सोचनीय है।

दहेज लेना एक रूढ़ीवादी सांस्कृतिक परंपरा है जो पितृसत्ता को पोषित करती है। संस्कृति के रूप में इसे चलाए रखा जाता है और आगे आने वाली पीढ़ियों को हस्तांतरित किया जाता है,जिससे पितृसत्ता का वजूद बना रहे और पुरुष स्त्री को संपत्ति की तरह हासिल कर उसका स्वामी बन सके। दहेज प्रथा के कारण महिलाएं समाज में दोयम दर्जे की मानी जाती हैं। जन्म से ही उन्हें ‘पराया धन’ कहकर परिवार के सभी संसाधनों से अलग-थलग कर दिया जाता है। उन्हें यह संदेश दिया जाता है कि परिवार की संपत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं है, उन्हें तो ‘दूसरे के घर’ जाना है। ‘दूसरे के घर’ जाने का तर्क हमारे घरों में लैंगिक असमानता की नींव भी रखता है। लड़कियों को दूसरे के घर जाना होता है इसलिए उनसे पारंपरिक गुण यानी खाना पकाने से लेकर, सिलाई-बुनाई और घर चलाने के कौशल में पारंगत होने की उम्मीद की जाती है। इसीलिए, जहां भाई पढ़ता है, वहीं लड़की चौके में रोटियां बेलती है यानी पत्नी बनने की ट्रेनिंग बचपन से शुरू हो जाती है और उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है।

दहेज प्रथा के कारण लिंग परीक्षण और भ्रूण हत्याओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। लड़कियों को जन्म से पहले मार दिया जाता है। यह समझा जाता है कि जन्म से पहले 500 रुपए खर्च करना 5 लाख खर्च करने से बेहतर है। साथ ही, लड़के को दहेज लाने वाले ‘एसेट’ की तरह देखा जाता है। वहीं लड़की परिवार पर वित्तीय बोझ मानी जाती है। फ़ीमेल इंफेंटीसाइड वर्ल्डवाइड: द केस फ़ॉर एक्शन बाय द यू एन ह्यूमन राइट्स काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में लड़कियों को ‘अनअफॉर्डेबल इकोनॉमिक बर्डन’ के रूप में देखा जाता है जिसके कारण लगभग 117 मिलियन लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है।

वैसे दहेज की मांग और उसके बाद ससुराल में महिला शोषण की रोकथाम के लिए सरकारों से लगातार प्रयास किए गए हैं। कानून निर्माताओं ने पति और उसके परिवार वालों ने महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार को रोकने के लिए समय-समय पर नियम व कानून पारित किए हैं। इसके बावजूद भी ससुराल में महिलाओं की संदेहास्पद मौतें होती हैं। 1961 का दहेज निषेध अधिनियम, विवाह के लिए दहेज, जिसे एक उपहार के रूप में परिभाषित किया जाता है या विवाह के लिए पूर्व शर्त माना जाता है की अनुरोध, भुगतान या स्वीकृति पर प्रतिबंध लगाता है। दहेज मांगने या देने पर छह महीने की कैद या 5,000 रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। दहेज के संबंध में हत्या और आत्महत्या के मामले क्रिमिनल पीनल कोड और इंडियन पीनल कोड के तहत देखे जाते हैं।अब देखते है ट्विशा शर्मा को कानूनी रूप से क्या इंसाफ मिलता है ।