ललित गर्ग
दुनिया एक बार फिर ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहाँ दो महाशक्तियों-अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते संवाद, आपसी मुलाकातों और कूटनीतिक समीकरणों को केवल द्विपक्षीय संबंधों के रूप में नहीं देखा जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संवाद और संभावित समझौतों को लेकर पूरी दुनिया में चर्चाओं का दौर चल रहा है। एक वर्ग इसे विश्व अर्थव्यवस्था के लिए राहतकारी कदम मान रहा है, क्योंकि इससे बढ़ती महंगाई, व्यापारिक अवरोधों और युद्धजन्य संकटों में कमी आने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है, वहीं दूसरी ओर अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि यह निकटता भविष्य में एक ऐसे विश्व संरचना को जन्म दे सकती है जहाँ दुनिया की दिशा पुनः कुछ महाशक्तियों के हाथों में सिमट जाए और विकासशील तथा अर्धविकसित देशों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो जाएँ। भारत जैसे देशों के लिए यह परिस्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है।
आज अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 44 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करते हैं। विश्व व्यापार, तकनीकी विकास, ऊर्जा बाजार, वैश्विक निवेश, वित्तीय संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक निर्णयों पर इन दोनों देशों का गहरा प्रभाव है। ऐसे में इनके संबंधों में किसी भी प्रकार का बदलाव पूरी दुनिया की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, टैरिफ विवाद, तकनीकी प्रतिबंध और ताइवान से जुड़े तनावों ने विश्व अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाला। कोरोना महामारी के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ टूट गईं, रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा संकट बढ़ाया और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। इन परिस्थितियों में यदि अमेरिका और चीन संवाद और सहयोग की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो इससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता को बल मिल सकता है।
विश्व अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखा जाए तो अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने से सबसे पहले वैश्विक बाजारों को राहत मिलेगी। निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, आपूर्ति श्रृंखलाओं में सुधार होगा और इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, तकनीक तथा विनिर्माण क्षेत्रों में लागत घट सकती है। इससे महंगाई पर भी नियंत्रण संभव है। किंतु यह केवल तस्वीर का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि यदि दोनों महाशक्तियाँ वैश्विक व्यापारिक नियमों और आर्थिक नीतियों को अपने हितों के अनुसार तय करने लगें तो छोटे देशों की आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। दुनिया पहले भी उपनिवेशवाद और आर्थिक नियंत्रण की राजनीति देख चुकी है, अब आशंका यह है कि कहीं आर्थिक वैश्वीकरण का नया स्वरूप महाशक्तियों के संयुक्त वर्चस्व में परिवर्तित न हो जाए। इसी संदर्भ में “जी-2” यानी अमेरिका और चीन केंद्रित विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हुई है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विश्व धीरे-धीरे बहुधू्रवीय व्यवस्था से हटकर दो महाशक्तियों के प्रभाव वाले ढाँचे की ओर बढ़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो वैश्विक नीतियों, व्यापारिक समझौतों और सुरक्षा संबंधी निर्णयों में छोटे देशों की भूमिका सीमित हो सकती है। यह स्थिति भारत जैसे देशों के लिए विशेष चिंता का विषय है क्योंकि भारत हमेशा से बहुधू्रवीय विश्व व्यवस्था और सामूहिक वैश्विक नेतृत्व का समर्थक रहा है।
भारत की स्थिति यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत न तो पूरी तरह अमेरिकी खेमे में है और न ही चीन के प्रभाव क्षेत्र में। भारत ने लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है। अमेरिका के साथ भारत के रक्षा, तकनीकी और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। क्वाड जैसे मंचों में भारत की सक्रिय भूमिका है। दूसरी ओर चीन भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच सीमा विवादों के बावजूद व्यापारिक संबंध व्यापक हैं। यही कारण है कि अमेरिका और चीन की बढ़ती निकटता भारत के लिए केवल बाहरी घटना नहीं बल्कि रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन का विषय है। भारत और चीन की तुलना करें तो चीन ने पिछले तीन दशकों में विनिर्माण, निर्यात, आधारभूत संरचना और तकनीकी उत्पादन के माध्यम से स्वयं को वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित किया। चीन की आर्थिक नीति केंद्रीकृत और तीव्र निर्णय क्षमता वाली रही है। इसके विपरीत भारत का विकास लोकतांत्रिक व्यवस्था, विविधता और संस्थागत संतुलन पर आधारित रहा है। भारत की शक्ति उसकी युवा आबादी, लोकतंत्र, सेवा क्षेत्र और डिजिटल क्षमता में निहित है, जबकि चीन की शक्ति विनिर्माण, निर्यात और पूंजी निवेश में रही है। अमेरिका के साथ चीन के संबंधों में सुधार होने की स्थिति में भारत के सामने यह चुनौती होगी कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक उपयोगिता को और अधिक प्रभावशाली बनाए।
भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर “चाइना प्लस वन” रणनीति में निहित है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने पिछले वर्षों में चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयास किए हैं। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन के विकल्प के रूप में भारत, वियतनाम और अन्य देशों की ओर बढ़ी हैं। भारत यदि अपनी औद्योगिक नीतियों, आधारभूत संरचना, श्रम सुधार और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है तो वह वैश्विक निवेश का प्रमुख केंद्र बन सकता है। किंतु यदि भारत आवश्यक गति से सुधार नहीं कर पाया तो यह अवसर अन्य देशों के पास चला जाएगा। तकनीकी क्षेत्र में भी अमेरिका-चीन संबंधों का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स नई शक्ति राजनीति के केंद्र बन चुके हैं। अमेरिका तकनीकी श्रेष्ठता बनाए रखना चाहता है जबकि चीन तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। भारत इन दोनों के बीच एक तीसरे विकल्प के रूप में उभर सकता है, लेकिन इसके लिए अनुसंधान, नवाचार और शिक्षा में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। भारत के पास प्रतिभा है, लेकिन प्रतिभा को वैश्विक नेतृत्व में बदलने के लिए दीर्घकालिक दृष्टि चाहिए।
भू-राजनीतिक दृष्टि से भी यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है। ताइवान, दक्षिण चीन सागर, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संकटों पर अमेरिका और चीन की भूमिका निर्णायक है। यदि दोनों देशों के बीच समझ बढ़ती है तो सैन्य टकरावों की आशंका कम हो सकती है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे और तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह अत्यंत लाभकारी स्थिति होगी। लेकिन यदि दोनों महाशक्तियाँ अपने प्रभाव विस्तार के लिए संकटों का उपयोग करती हैं तो विश्व अस्थिरता और बढ़ सकती है। भारत की विदेश नीति के लिए यह समय अत्यंत निर्णायक है। भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए चीन के साथ व्यावहारिक संबंधों का संतुलन बनाना होगा। साथ ही उसे वैश्विक दक्षिण यानी विकासशील देशों के नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत करनी होगी। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने जिस “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” की अवधारणा प्रस्तुत की थी, वह भविष्य की विश्व व्यवस्था का वैकल्पिक मॉडल बन सकती है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो अमेरिका और चीन जहाँ शक्ति संतुलन की राजनीति में उलझे हुए हैं, वहीं भारत सहअस्तित्व, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग की नीति पर चल रहा है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा शक्ति प्रदर्शन पर आधारित है जबकि भारत का दृष्टिकोण विकास, मानवीय मूल्यों और वैश्विक साझेदारी पर केंद्रित रहा है। यही भारत की विशिष्टता और शक्ति है।
आज दुनिया में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि क्या अमेरिका और चीन मिलकर दुनिया को पुनः अपने प्रभाव क्षेत्र में बाँटने का प्रयास करेंगे? क्या छोटे देशों की भूमिका सीमित हो जाएगी? क्या फिर वही स्थिति बनेगी जब महाशक्तियाँ विश्व राजनीति को अपनी उँगलियों पर नचाती थीं? इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि आज की दुनिया शीत युद्ध काल की दुनिया नहीं है। भारत, जापान, यूरोपीय संघ, ब्राजील, आसियान और अफ्रीकी देशों का बढ़ता प्रभाव विश्व व्यवस्था को बहुधू्रवीय बनाए रखने में सक्षम है। भारत को इस बदलती परिस्थिति में अपने संकल्पों को सुदृढ़ करना होगा, विकास के नए मानक गढ़ने होंगे और अपनी रणनीतिक क्षमता को विस्तार देना होगा। क्योंकि बदलती दुनिया में प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका और चीन क्या करेंगे, बल्कि यह है कि भारत स्वयं को किस ऊँचाई पर स्थापित करेगा।





