मायावती की निष्क्रियता : क्या खत्म हो जाएगी बसपा?

Mayawati's inaction: Will BSP end?

दिलीप कुमार पाठक

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय ऐसा था जब मायावती का नाम सुनते ही विरोधी दल अपनी रणनीति बदलने लगते थे। लेकिन आज जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है। देश की सियासत में यह चर्चा बहुत तेज है कि मायावती की जमीनी स्तर पर बढ़ती निष्क्रियता और पार्टी का लगातार गिरता वोट बैंक बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा को खत्म होने की कगार पर ले आया है। नौबत यहां तक आ गई है कि बसपा से उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी कभी भी छिन सकता है। अगर हम आंकड़ों को देखें, तो बसपा की हालत इस समय सबसे खराब दौर में है। देश और उत्तर प्रदेश के चारो सदनों को मिलाकर देखें तो पार्टी के पास अब नाममात्र के नेता बचे हैं। लोकसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ने वाली बसपा का खाता तक नहीं खुला और देश के सबसे बड़े सदन में उसकी सीटें आज शून्य हैं। देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा में बसपा का सिर्फ एक सांसद बचा है, जिनका कार्यकाल नवंबर 2026 में खत्म हो जाएगा। इसके बाद बसपा का कोई नया सांसद राज्यसभा नहीं जा पाएगा क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास विधायक ही नहीं हैं।

जिस उत्तर प्रदेश में कभी मायावती ने चार बार मुख्यमंत्री बनकर सरकार चलाई थी, आज वहां की 403 विधानसभा सीटों में से बसपा के पास केवल एक विधायक बचा है। वहीं, उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भी बसपा की सीटें अब जीरो हो चुकी हैं। इस भारी गिरावट का सबसे बड़ा कारण मायावती की राजनीति करने का तरीका है। पिछले कुछ सालों से वे केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस या सोशल मीडिया पर बयान जारी करने तक सीमित हो गई हैं। वे न तो जनता के मुद्दों पर सड़कों पर उतर रही हैं और न ही महंगाई, बेरोजगारी या दलित उत्पीड़न जैसे मामलों पर कोई बड़ा आंदोलन कर रही हैं। नेता की इस निष्क्रियता के कारण पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ गए या दूसरी पार्टियों में शामिल हो गए। इसी का नतीजा है कि आम चुनाव में बसपा का कुल वोट शेयर घटकर मात्र दो प्रतिशत के आसपास रह गया। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, इतने कम वोट शेयर और बिना किसी सीट के बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का तमगा जाना लगभग तय है।मायावती के इस तरह शांत बैठने और बसपा के कमजोर होने का सीधा फायदा दूसरी पार्टियों को मिल रहा है। बसपा का जो कोर मुस्लिम और दलित वोट बैंक था, उसका एक बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की तरफ चला गया है। वहीं, गरीब और गैर-जाटव दलितों का एक बड़ा वर्ग सरकारी योजनाओं जैसे मुफ्त राशन और आवास के कारण भाजपा के साथ जुड़ गया है। इसके अलावा, युवाओं के बीच चंद्रशेखर आजाद एक नए और आक्रामक दलित नेता के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने नगीना सीट से लोकसभा चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया कि बसपा का वोटर अब नया विकल्प ढूंढ चुका है।

जमीनी हकीकत यह भी है कि मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को राजनीति में आगे तो बढ़ाया और उन्हें अपना उत्तराधिकारी भी घोषित किया, लेकिन उनके आक्रामक भाषणों के बाद उन्हें कुछ समय के लिए किनारे कर दिया गया। नेतृत्व के इस असमंजस ने कार्यकर्ताओं को और ज्यादा भ्रमित कर दिया। जब तक पार्टी में युवाओं को खुलकर फैसले लेने की आजादी नहीं मिलेगी, तब तक नए दौर के वोटरों को जोड़ना नामुमकिन है। साफ शब्दों में कहें तो बसपा इस समय अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव बिल्कुल नजदीक हैं। अगर मायावती ने अब भी अपनी बंद कमरों वाली रणनीति नहीं बदली, आकाश आनंद जैसे युवा नेताओं को कमान सौंपकर सड़कों पर संघर्ष शुरू नहीं किया, तो बसपा का राजनीतिक वजूद हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। क्योंकि राजनीति में शून्य के लिए कोई जगह नहीं होती। अगर बसपा अपनी जमीन छोड़ रही है, तो लोकतंत्र का नियम है कि कोई न कोई उस खाली जगह को भरेगा ही। अब फैसला मायावती को करना है कि वे इतिहास का हिस्सा बनना चाहती हैं या भविष्य का।