क्या आम आदमी विकास से बाहर छूट रहा है?

Is the common man being left out of development?

ललित गर्ग

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण के जिन आधार स्तंभों की कल्पना की गई थी, उनमें शिक्षा और चिकित्सा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। यह माना गया था कि यदि देश के नागरिक शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक होंगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा, सामाजिक असमानताएं कम होंगी और राष्ट्र विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। शिक्षा को व्यक्ति निर्माण और चिकित्सा को जीवन रक्षा का माध्यम माना गया था। लेकिन स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद स्थिति चिंताजनक प्रश्न खड़े करती है कि क्या ये दोनों क्षेत्र अपने मूल उद्देश्य से भटककर व्यवसाय और बाजार के अधीन नहीं हो गए हैं? आज शिक्षा और चिकित्सा दोनों क्षेत्रों में जो विसंगतियां दिखाई देती हैं, वे केवल व्यवस्थागत संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट का रूप ले चुकी हैं। एक ओर शिक्षा व्यवस्था परीक्षा, अंकों और प्रतिस्पर्धा की आर्थिक मशीन बन गई है, वहीं दूसरी ओर चिकित्सा सेवा लाभ-हानि के गणित में उलझती दिखाई देती है। इन दोनों क्षेत्रों की बढ़ती व्यावसायिकता ने आम आदमी को सबसे अधिक प्रभावित किया है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं था। शिक्षा अब डिग्री, नौकरी और प्रतिस्पर्धा तक सीमित होती दिखाई देती है।

शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं का सबसे भयावह चेहरा कोटा, सीकर और अन्य कोचिंग एवं शिक्षा केंद्रों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के रूप में सामने आया है। कोटा, जो कभी देश की शैक्षणिक आकांक्षाओं का केंद्र माना जाता था, अब विद्यार्थियों पर बढ़ते मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय के कारण आत्महत्या की घटनाओं से लगातार चर्चा में रहा है। कोटा, सीकर तथा अन्य कोचिंग नगरों में पिछले वर्षों में अनेक विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर किया है। राजस्थान के सीकर में नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की आत्महत्या की घटना इसी विडंबना का उदाहरण है। परीक्षा रद्द होने से उत्पन्न अनिश्चितता और मानसिक तनाव ने एक संभावनाशील जीवन समाप्त कर दिया। यह घटना अकेली नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। औसतन हर 36 मिनट में एक विद्यार्थी जीवन समाप्त कर रहा है। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है।

दूसरी ओर नीट, नेट, प्रतियोगी भर्ती परीक्षाओं तथा अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों में विवाद और अनिश्चितता की स्थितियों ने विद्यार्थियों में गहरा असंतोष और अविश्वास पैदा किया है। वर्षों की तैयारी करने वाले छात्र जब परीक्षा प्रणाली को ही अविश्वसनीय पाते हैं तो उनमें निराशा और मानसिक तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। आज परीक्षा प्रणाली अविश्वसनीय होती जा रही है। प्रश्नपत्र लीक होना, परीक्षाओं का रद्द होना, मूल्यांकन विवाद, शोध कार्यों में साहित्यिक चोरी, पीएचडी प्रक्रियाओं का औपचारिक बन जाना और कोचिंग संस्कृति का बढ़ना शिक्षा के बाजारीकरण की तस्वीर प्रस्तुत करता है। शिक्षा अब ज्ञान से अधिक निवेश और प्रतिफल का विषय बनती जा रही है। धीरे-धीरे शिक्षा सेवा से व्यवसाय में बदलती गई। बड़े निजी विद्यालय, कोचिंग संस्थान और विश्वविद्यालय आज करोड़ों के उद्योग बन चुके हैं। डॉक्टर और इंजीनियर बनाने के सपनों का ऐसा व्यापार खड़ा हुआ जिसमें अभिभावक आर्थिक रूप से टूटने लगे। आज एक सामान्य परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जीवन भर की बचत खर्च करने को विवश है। विद्यालयों की ऊंची फीस, निजी कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उच्च शिक्षा की महंगी व्यवस्था ने शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है।

इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। चिकित्सा को कभी सेवा का क्षेत्र माना जाता था, लेकिन आज निजी चिकित्सालयों की बढ़ती संख्या और उनकी व्यावसायिक प्रवृत्ति ने आम नागरिक को संकट में डाल दिया है। इलाज इतना महंगा हो गया है कि अनेक परिवार बीमारी के कारण आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। निजी अस्पतालों में उपचार, जांच, आईसीयू, दवाओं का खर्च और नकली दवाओं में जीवन समाप्त होने की घटनाएं लगातार बढ़ी है। अनेक मामलों में अनावश्यक परीक्षण, अत्यधिक शुल्क और व्यावसायिक दृष्टिकोण की शिकायतें सामने आती रहती हैं। चिकित्सा सेवा का उद्देश्य रोगी को राहत देना था, लेकिन कई स्थानों पर वह लाभ कमाने की प्रणाली में बदलती दिखाई देती है। जगह-जगह खुले निजी अस्पताल और शिक्षण संस्थान एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा में उतर आए हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा गुणवत्ता की अपेक्षा लाभ कमाने की अधिक दिखाई देती है। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा और चिकित्सा दोनों ही सामान्य नागरिक की आर्थिक क्षमता से बाहर जाने लगी हैं। इन परिस्थितियों का एक सामाजिक दुष्परिणाम भी सामने आया है। आर्थिक दबाव, भविष्य की अनिश्चितता, शिक्षा का तनाव, महंगी चिकित्सा और रोजगार संकट के कारण अवसाद, मानसिक तनाव और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। युवा पीढ़ी उपलब्धियों के दबाव में टूट रही है, जबकि परिवार आर्थिक बोझ से जूझ रहे हैं।

शिक्षा मंत्रालय को अधिक सशक्त, उत्तरदायी और कठोर भूमिका निभाते हुए परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, तकनीक आधारित और सुरक्षित बनाना होगा। इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र में देशभर में स्थापित हुए नए एम्स संस्थानों एवं उच्च चिकित्सा केंद्रों का लाभ वास्तव में आम नागरिक तक सरल, सस्ती और सुलभ व्यवस्था के रूप में पहुंचे, यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। आज आवश्यकता केवल बड़े अस्पताल बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें सर्वसुविधायुक्त, विशेषज्ञ सेवाओं से युक्त तथा दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों तक विस्तारित करने की है, ताकि महानगरों पर निर्भरता कम हो और ग्रामीण तथा वंचित वर्ग भी उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं का लाभ सहजता से प्राप्त कर सके। नई शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, कौशल आधारित और बहुआयामी बनाने का प्रयास हुआ है। देश में नए आईआईटी, आईआईएम, केंद्रीय विश्वविद्यालय, एम्स और चिकित्सा संस्थानों की स्थापना की गई। उच्च शिक्षा और उच्च चिकित्सा के नए केंद्र विकसित हुए हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि हुई और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के प्रयास किए गए।

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पूरा परिदृश्य केवल निराशाजनक है। पिछले वर्षों में शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में कुछ सकारात्मक प्रयास भी हुए हैं। विशेष रूप से जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार आई, तब इन क्षेत्रों की संरचनात्मक कमियों की ओर अपेक्षाकृत गंभीर ध्यान दिया गया। चिकित्सा क्षेत्र में आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने गरीब वर्ग को राहत देने का प्रयास किया है। जिला स्तर तक चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की दिशा में भी पहल हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और स्थानीय भाषाओं में अध्ययन पर बल दिया गया। लेकिन भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश में ये प्रयास अभी पर्याप्त नहीं कहे जा सकते। जिस गति से जनसंख्या बढ़ी है, उस अनुपात में सरकारी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों का विस्तार नहीं हो पाया। यही कारण है कि निजी क्षेत्र ने उस खाली स्थान को भर दिया और धीरे-धीरे प्रमुख भूमिका में आ गया। अब आवश्यकता केवल नए संस्थान खोलने की नहीं बल्कि सरकारी शिक्षा और चिकित्सा को अधिक प्रभावी, सुलभ और उद्देश्यपूर्ण बनाने की है। सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों की गुणवत्ता बढ़ानी होगी। उनमें आधुनिक संसाधन, प्रशिक्षित मानवबल और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। निजी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों पर प्रभावी नियंत्रण भी आवश्यक है। शिक्षा और चिकित्सा को पूर्णतः बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि ये केवल आर्थिक गतिविधियां नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व हैं। शिक्षा नीति को समाज और जीवन से जोड़ना होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा और चिकित्सा को पुनः सेवा और राष्ट्र निर्माण के मूल उद्देश्य से जोड़ा जाए। यदि ये दोनों क्षेत्र केवल व्यापार बन गए तो सामाजिक असमानता और बढ़ेगी, प्रतिभाएं टूटेंगी और आम आदमी विकास की मुख्यधारा से बाहर होता जाएगा। भारत के भविष्य की दिशा इस बात से तय होगी कि शिक्षा और चिकित्सा कितनी सुलभ, समान और मानवीय बनती हैं। सरकार, समाज, नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्र को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें कोई बच्चा आर्थिक कारणों से शिक्षा से वंचित न हो और कोई नागरिक उपचार के अभाव में पीड़ित न रहे। यही स्वतंत्र भारत की मूल भावना थी और यही भविष्य का मार्ग भी होना चाहिए।