नदी नहीं, अपनी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों को बचा रहे हैं श्रमवीर

Labor heroes are saving not the river, but their culture and future generations

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

अनादि काल से जनजीवन, संस्कृति और सभ्यता को जीवनरस प्रदान करने वाली वेत्रवती आज पुनर्जागरण की दिव्य चेतना बनकर पुनः जाग उठी है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के झिरी (कुम्हारा) गांव में स्थित पावन उद्गम क्षेत्र में 10 मई 2026 से आरम्भ “श्रमदान सप्ताह–2026” केवल स्वच्छता या संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि मृतप्राय होती प्रकृति में नवजीवन संचारित करने का विराट लोकयज्ञ बन चुका है। उपेक्षा, अतिक्रमण, मलबा संचयन और परिवर्तित ऋतुचक्र के प्रहारों से आहत इस तपोभूमि को पुनर्जीवित करने हेतु जनसामान्य प्रखर धूप में भी फावड़ा, टोकरी और अटूट संकल्प के साथ निरंतर श्रमरत है। यह प्रेरक दृश्य उद्घोष कर रहा है कि जब सामूहिक चेतना जागृत होती है, तब सूखी धाराएँ भी पुनः अमृतधारा बनकर प्रवाहित होने लगती हैं। यह महाअभियान केवल जलसंरक्षण का प्रयास नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के सुरक्षित अस्तित्व, प्रकृति-संतुलन और जीवनमूल्यों के संरक्षण का सुदृढ़ आधार निर्मित कर रहा है।

सूखी पड़ती जीवनधारा को पुनर्जीवित करने का जो संकल्प गत वर्ष जागा, वही आज इस महाअभियान की सबसे बड़ी शक्ति है। स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण साधकों और सामाजिक संगठनों के श्रम से उद्गम क्षेत्र में 55 लघु चेक डैम / अवरोधक बांध निर्मित किए गए। आरम्भ में यह कार्य असंभव प्रतीत होता था, किंतु सामूहिक संकल्प ने इसे संभव कर दिखाया। इन अवरोध बांधों के कारण बेतवा उद्गम लगभग छह माह तक जलमय रहा तथा जलधारा अविरल बहती रही। यह सफलता केवल निर्माणकार्य की उपलब्धि नहीं, बल्कि जागृत समाज की उत्तरदायी चेतना का प्रमाण थी। इसी प्रेरणा ने इस वर्ष के “श्रमदान सप्ताह” को और व्यापक बना दिया है। लोगों ने अनुभव किया कि निष्ठापूर्ण प्रयासों के आगे प्रकृति भी अपना आशीर्वाद देती है। यही विश्वास प्रतिदिन सैकड़ों श्रमसेवियों को उद्गम स्थल तक खींच ला रहा है।

जब समाज स्वयं प्रकृति के संरक्षण का संकल्प उठा लेता है, तब जनशक्ति परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम बन जाती है। ग्राम सेवा समिति भोपाल के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान में अनेक सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं की प्रेरक सहभागिता दिखाई दे रही है। बेतवा बिरादरी विदिशा, नमन सेवा समिति बैतूल, युवा फाउंडेशन भोपाल, गांधी भवन, सप्रे संग्रहालय, एनजीओ पाठशाला, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर तथा मैनिट सहित अनेक संस्थाएं सक्रिय रूप से श्रमदान कर रही हैं। यह सहभागिता सिद्ध करती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल शासन का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक धर्म है। यहां औपचारिकता नहीं, बल्कि मिट्टी और नदी के प्रति आत्मीय समर्पण दिखाई देता है। यही भावना इस अभियान को जनभागीदारी से जनआंदोलन में परिवर्तित कर चुकी है।

जब वृद्ध हाथों का अनुभव और युवाओं का उत्साह एक साथ मिट्टी से जुड़ता है, तब परिवर्तन इतिहास बन जाता है। इस महाअभियान में युवाओं के साथ सत्तर, पचहत्तर और अस्सी वर्ष की आयु पार कर चुके वरिष्ठजन भी अदम्य ऊर्जा से श्रमदान कर रहे हैं। प्रचंड गर्मी और कठिन श्रम के बीच उनका समर्पण युवा पीढ़ी के लिए जीवंत प्रेरणा बन गया है। सेवानिवृत्त वरिष्ठ वन अधिकारी श्री आजाद सिंह डबास, श्री कौशलेंद्र सिंह सहित अनेक अनुभवी पर्यावरण साधकों की उपस्थिति ने अभियान को दिशा और निरंतरता प्रदान की है। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि प्रकृति के प्रति दायित्व की कोई आयु-सीमा नहीं होती। पीढ़ियों के इस संगम ने यह संदेश भी दिया है कि जब अनुभव और युवा शक्ति साथ खड़े होते हैं, तब जनसंकल्प अजेय बन जाता है।

जब कोई व्यक्ति अपना अनुभव समाज और प्रकृति के पुनर्जागरण को समर्पित कर देता है, तब अभियान जनआस्था बन जाता है। डॉ. आर. के. पालीवाल इस महाअभियान की वही प्रेरक शक्ति हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पूर्व प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त रहे डॉ. पालीवाल ने प्रशासनिक जीवन के पश्चात प्रकृति संरक्षण को अपना जीवनसंकल्प बना लिया। उनका श्रम, नेतृत्व और समर्पण अभियान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है। वे केवल आह्वान नहीं करते, बल्कि स्वयं फावड़ा उठाकर श्रमदान करते हैं। उनका मानना है कि नदियों की रक्षा केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की रक्षा है। उनके नेतृत्व में यह प्रयास श्रमदान से आगे बढ़कर पर्यावरणीय जनचेतना का आंदोलन बन चुका है। उनका जीवन संदेश देता है कि सेवानिवृत्ति अंत नहीं, बल्कि लोकसेवा का नया अध्याय है।

तपती धूप और कठिन परिस्थितियां भी श्रमसेवियों के उत्साह को डिगा नहीं सकीं। लगभग एक दर्जन समर्पित कार्यकर्ता प्रतिदिन सुबह आठ बजे से निरंतर श्रम में जुटे रहे। गत वर्ष निर्मित 55 अवरोध बांधों की मरम्मत के साथ 30 से अधिक नए अवरोध बांध भी तैयार किए जा चुके हैं। अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि उस सर्वोच्च पार्वती कुंड का पुनर्जीवन है, जो वर्षों से आठ फीट मलबे में दबा पड़ा था। आज उसी कुंड में एक फीट से अधिक निर्मल जल संचित है, जो वन्य जीवों के लिए जीवनस्रोत बन रहा है। ये उपलब्धियां श्रमसेवियों के समर्पण की सशक्त गवाही हैं और सिद्ध करती हैं कि सामूहिक श्रम से असंभव परिवर्तन भी संभव हो जाते हैं।

बेतवा उद्गम से उठी यह चेतना अब जनजागरण की व्यापक धारा बन चुकी है। स्थानीय सीमाओं से निकलकर यह अभियान दूर-दूर तक लोगों को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहा है। यह केवल समस्याओं का वर्णन नहीं, बल्कि समाधान का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। जो लोग प्रकृति को मात्र उपभोग का साधन मानते थे, उनके लिए यह अभियान स्पष्ट संदेश है कि प्रकृति की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि श्रम, समय और संवेदना के समर्पण से होती है। जलसंरक्षण के ये प्रयास भविष्य के गहराते जलसंकट के विरुद्ध मजबूत आधार बन सकते हैं।

सूखती नदियां केवल जल का संकट नहीं, बल्कि भविष्य के अस्तित्व का चेतावनी संकेत हैं। बेतवा उद्गम पर चल रहा यह श्रमदान सप्ताह किसी एक नदी के पुनर्जीवन तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का सशक्त आह्वान है। समय अब केवल नारों और शब्दों का नहीं, बल्कि धरती के लिए श्रम और समर्पण का है। एक फावड़ा, कुछ पल का श्रम और संरक्षण का संकल्प—यही सुरक्षित भविष्य की वास्तविक पूंजी है। बेतवा पुनर्जीवन का यह महाअभियान सिद्ध कर रहा है कि जब समाज प्रकृति के पक्ष में खड़ा होता है, तब सूखी धरती भी पुनः जीवन से भर उठती है।