देर से संतान, जल्दी चिंताएँ? पचास के बाद पेरेंट्स और बच्चे का भविष्य

Late parenthood, early worries? The future for parents and children after fifty

डॉ. प्रियंका सौरभ

विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक सुविधाएँ और संभावनाएँ प्रदान की हैं। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति ने उन दंपतियों के लिए भी माता-पिता बनने का मार्ग खोल दिया है, जो किसी कारणवश प्राकृतिक रूप से संतान प्राप्ति में सक्षम नहीं थे। IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसी तकनीक ने हजारों परिवारों को संतान सुख दिया है। निस्संदेह यह आधुनिक चिकित्सा की एक बड़ी उपलब्धि है। किंतु हर उपलब्धि के साथ कुछ प्रश्न और जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। आज जब कुछ दंपति 50-52 वर्ष या उससे अधिक आयु में, कभी-कभी कर्ज लेकर, IVF के माध्यम से माता-पिता बनने का निर्णय लेते हैं, तब इस विषय पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है।

संतान की इच्छा मनुष्य की सबसे स्वाभाविक और गहरी भावनाओं में से एक है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसका अपना परिवार हो, घर में बच्चों की किलकारियाँ गूंजें और जीवन को एक नई दिशा मिले। इसी चाहत के कारण अनेक दंपति वर्षों तक उपचार करवाते हैं और आर्थिक तथा मानसिक संघर्ष झेलते हैं। उनकी भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। लेकिन माता-पिता बनना केवल बच्चे के जन्म तक सीमित नहीं है। वास्तविक जिम्मेदारी उसके बाद शुरू होती है। बच्चे को जन्म देना अपेक्षाकृत आसान है, किंतु उसे एक जिम्मेदार, शिक्षित और आत्मनिर्भर नागरिक बनाना लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है।

जब कोई दंपति 50 वर्ष की आयु में माता-पिता बनता है, तो यह स्वाभाविक है कि जब बच्चा बारहवीं कक्षा में पहुँचेगा, तब माता-पिता की आयु लगभग 68 से 70 वर्ष के बीच होगी। यह जीवन का वह चरण होता है जब अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आरामदायक जीवन की अपेक्षा करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में अनेक परिवर्तन आते हैं। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, थायराइड, हृदय रोग, गठिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ सामान्य हो जाती हैं। ऐसे में बच्चे की पढ़ाई, करियर और भावनात्मक जरूरतों के लिए पहले जैसी सक्रियता बनाए रखना आसान नहीं होता।

किशोरावस्था और युवावस्था किसी भी बच्चे के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होती है। इसी अवधि में उसे सही मार्गदर्शन, आत्मविश्वास और भावनात्मक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, उच्च शिक्षा का चयन, करियर की योजना और जीवन से जुड़े अनेक निर्णय इसी उम्र में लिए जाते हैं। यदि उस समय माता-पिता स्वयं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हों, तो बच्चे और परिवार दोनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। कई बार बच्चे को अपनी पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं के साथ-साथ माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।

इस विषय का एक सामाजिक पक्ष भी है। विद्यालयों और सामाजिक आयोजनों में बच्चे अपने मित्रों और सहपाठियों के बीच रहते हैं। कई बार उम्रदराज माता-पिता होने के कारण बच्चों को अनावश्यक टिप्पणियों या मजाक का सामना करना पड़ सकता है। यद्यपि यह समाज की अपरिपक्वता का परिचायक है, फिर भी इसका प्रभाव बच्चे के मनोविज्ञान पर पड़ सकता है। बच्चे अक्सर अपने साथियों के बीच स्वयं को सहज और स्वीकार्य महसूस करना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितियाँ कभी-कभी उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं।

आर्थिक दृष्टि से भी देर से मातृत्व-पितृत्व कई चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। IVF उपचार पर लाखों रुपये खर्च हो सकते हैं। अनेक परिवार इसके लिए अपनी बचत समाप्त कर देते हैं या ऋण लेते हैं। इसके बाद बच्चे के पालन-पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यकताओं पर निरंतर खर्च होता है। आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना पहले की तुलना में कहीं अधिक महंगा हो चुका है। यदि माता-पिता पहले से आर्थिक दबाव में हों और सेवानिवृत्ति के निकट हों, तो भविष्य में बच्चे की उच्च शिक्षा और करियर निर्माण के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाना कठिन हो सकता है।

महिलाओं के संदर्भ में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रकृति ने प्रजनन के लिए एक जैविक समय-सीमा निर्धारित की है। रजोनिवृत्ति या मेनोपॉज इस बात का संकेत है कि शरीर प्रजनन क्षमता के अंतिम चरण में पहुँच चुका है। आधुनिक चिकित्सा तकनीकें इस सीमा को कुछ हद तक आगे बढ़ा सकती हैं, किंतु वे उम्र से जुड़ी सभी चुनौतियों को समाप्त नहीं कर सकतीं। अधिक आयु में गर्भधारण और प्रसव के दौरान स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ जाते हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता।

हालाँकि इस विषय पर चर्चा करते समय संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। यह मान लेना उचित नहीं होगा कि अधिक आयु में माता-पिता बनने वाला हर व्यक्ति अपने बच्चे के लिए समस्या बन जाएगा। अनेक लोग 60 वर्ष की आयु में भी पूरी तरह स्वस्थ, सक्रिय और आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं। वहीं कई युवा माता-पिता भी अपने बच्चों को पर्याप्त समय और संसाधन नहीं दे पाते। इसलिए किसी निर्णय का मूल्यांकन केवल उम्र के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन औसत परिस्थितियों को देखते हुए आयु एक महत्वपूर्ण कारक अवश्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस संदर्भ में गोद लेने का विकल्प भी विचारणीय है। हमारे देश में हजारों ऐसे बच्चे हैं जो किसी कारणवश माता-पिता के स्नेह और संरक्षण से वंचित हैं। यदि सक्षम परिवार उन्हें अपनाएँ, तो न केवल उन बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है, बल्कि परिवारों को भी संतान सुख प्राप्त हो सकता है। दुर्भाग्य से आज भी समाज में जैविक संतान को अधिक महत्व दिया जाता है, जिसके कारण अनेक लोग गोद लेने जैसे सकारात्मक विकल्प पर गंभीरता से विचार नहीं करते।

वास्तव में माता-पिता बनने का अर्थ केवल अपनी इच्छा पूरी करना नहीं है। इसका अर्थ है आने वाले बीस-पच्चीस वर्षों तक बच्चे के जीवन में सक्रिय भागीदारी निभाना, उसके सपनों को समर्थन देना और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़ा रहना। इसलिए संतान प्राप्ति का निर्णय लेते समय केवल वर्तमान की खुशी नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दूरदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।

अंततः प्रश्न IVF या चिकित्सा विज्ञान का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपने निर्णयों के दीर्घकालिक परिणामों पर पर्याप्त विचार कर रहे हैं। संतान जीवन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक है, लेकिन वह एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। इसलिए देर से मातृत्व-पितृत्व का निर्णय लेने से पहले स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियों और सबसे बढ़कर बच्चे के भविष्य को केंद्र में रखकर सोचने की आवश्यकता है। क्योंकि किसी भी बच्चे का सर्वोत्तम हित ही हर निर्णय का आधार होना चाहिए। यही परिपक्व अभिभावकत्व की पहचान है।