नक्सलवाद पर प्रभावी प्रहार के बाद अब केंद्र सरकार के सामने देश में नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार को जड़ से खत्म करने की सबसे बड़ी चुनौती है। यह समस्या राष्ट्रीय सुरक्षा और युवा पीढ़ी के भविष्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। अच्छी बात यह है कि सरकार इस समस्या के समाधान के प्रति पूरी तरह जागरूक है और इसमें कोई समझौता नहीं कर रही है। तो क्या भारत होगा नशे से मुक्त?
तो अब बचना मुश्किल होगा नशे के सौदागरों के लिए
विवेक शुक्ला
देश से नक्सलवाद का खात्मा करने के बाद अब केंद्र सरकार के समक्ष देश में नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार को जड़ से उखाड़ फेंकने की सबसे बड़ी चुनौती है। यह समस्या अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और युवा पीढ़ी के भविष्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है।सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकार इस समस्या की गंभीरता को पूरी तरह समझती है और इसके समाधान में किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है।
यह अरबों डॉलर का काला कारोबार देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा रहा है और समाज की नींव को कमजोर कर रहा है। हाल ही में पंजाब के डेरा बस्सी, मोहाली और चंडीगढ़ क्षेत्रों में समाजसेवकों, शिक्षकों तथा वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ हुई मुलाकातों के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि सीमावर्ती राज्यों में नशीले पदार्थों की समस्या लगातार बिगड़ रही है।
अब नहीं बचेंगे नशे के सौदागर
नक्सलवाद को काफी हद तक नियंत्रित करने के बाद मोदी सरकार अब नशे के सौदागरों के खिलाफ अभियान तेज कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की पहल पर कई राज्यों में जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जा रही है। गृह मंत्री अमित शाह अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडीकेट पर सीधा प्रहार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
सभी एंटी-नारकोटिक्स एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक ठोस तंत्र तैयार किया गया है। इसका नाम नारको समन्वय केंद्र है। यह भारत सरकार द्वारा नशीले पदार्थों (ड्रग्स) की तस्करी और नशे की समस्या से निपटने के लिए बनाया गया है। इसके साथ ही, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टेंसेज (NDPS) अधिनियम के तहत नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
इसके साथ ही, विदेशी ड्रग तस्करों को भारत लाकर सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक प्रत्यर्पण व्यवस्था शुरू की गई है। सीमाओं पर बाड़बंदी, तकनीकी निगरानी को मजबूत किया जा रहा है।
2047 तक नशामुक्त भारत: संकल्प और रोडमैप
नशामुक्त भारत का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। जब नक्सलवाद जैसी जटिल समस्या पर काबू पाया जा सकता है, तो नशे के इस कारोबार को भी समाप्त किया जा सकता है।
केंद्र सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति, राज्यों का सक्रिय सहयोग और नागरिकों की जागरूकता से 2047 तक यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न तो एक ग्राम भी नशीला पदार्थ भारत में घुसने दिया जाएगा और न ही भारतीय क्षेत्र को अन्य देशों के लिए ट्रांजिट रूट बनने दिया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय तस्करी के दो बड़े गलियारे
भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी मुख्य रूप से दो क्षेत्रों से हो रही है। एक ओर गोल्डन ट्रायंगल (म्यांमार, लाओस और थाईलैंड) से सिंथेटिक ड्रग्स की आपूर्ति जारी है, वहीं गोल्डन क्रिसेंट (अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान) से अफीम, हेरोइन और ओपिओइड्स जैसी खतरनाक दवाओं की तस्करी बढ़ रही है।
कैनाबिस (गांजा) एक पौधा है जिसके पत्तों और फूलों से नशीला पदार्थ बनाया जाता है। यह दर्द निवारक और भूख बढ़ाने में उपयोगी माना जाता है, लेकिन इसके अधिक सेवन से मानसिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित होता है।
ओपिओइड्स मॉर्फिन जैसी दर्द निवारक दवाएं हैं, जो बेहद लत लगाने वाली होती हैं और ओवरडोज से सांस रुकने का खतरा रहता है।
कैंब्रिज प्रिज्म्स जर्नल में प्रकाशित एक हालिया सर्वेक्षण (2024) ने भारत के युवाओं में नशीले पदार्थों के उपयोग को लेकर गंभीर चिंता जताई है। 15 राज्यों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आने वाले 1,630 युवाओं पर किए गए अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए: 26.4% युवा तंबाकू का सेवन कर रहे हैं। 26.1% शराब पीते हैं। 9.5% गांजा का इस्तेमाल करते पाए गए। 22.2% युवा एक से अधिक नशीले पदार्थों के आदी हैं। सबसे चिंताजनक: 29.5% युवा सिंथेटिक ड्रग्स का सेवन कर रहे हैं।
ये आंकड़े युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति और सामाजिक परिवेश की गिरती स्थिति को दर्शाते हैं।
पंजाब में नशे की भयावह स्थिति पूरे देश को पता है, लेकिन अब यह समस्या अन्य राज्यों में भी तेजी से फैल रही है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और केरल इसकी चपेट में आ रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश में नशीले पदार्थों की तस्करी और सेवन में भारी वृद्धि हुई है। राज्यपाल ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो हिमाचल भी ‘उड़ता पंजाब’ बन सकता है।
केरल में NDPS मामलों में पिछले चार वर्षों में 130 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है (37,228 से बढ़कर 87,101)। लंबे समुद्री तट के कारण नशीले पदार्थ आसानी से पहुंच रहे हैं।
इस काले कारोबार को जड़ से समाप्त करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, सख्त रणनीति और सामूहिक प्रयास की जरूरत है। सिर्फ बातों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से ही सफलता मिलेगी।





