डॉ विजय गर्ग
समाज में वृद्धजन, विधवाएं और दिव्यांगजन सबसे संवेदनशील वर्गों में आते हैं। सरकार द्वारा दी जाने वाली पेंशन योजनाओं का उद्देश्य इन्हें आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन प्रदान करना होता है। लेकिन आज की महंगाई, बढ़ती चिकित्सा लागत और रोजमर्रा की आवश्यकताओं ने स्थिति ऐसी बना दी है कि अधिकांश गरीब लोगों की पेंशन राशि केवल भोजन और इलाज में ही समाप्त हो जाती है। उनके पास जीवन की अन्य आवश्यकताओं के लिए बहुत कम धन बचता है।
गरीब बुजुर्गों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। जीवनभर मेहनत करने के बाद जब व्यक्ति वृद्धावस्था में पहुंचता है, तब उसे आराम और सुरक्षा की आवश्यकता होती है। लेकिन आज अनेक बुजुर्ग छोटी-सी पेंशन के सहारे जीवन जीने को मजबूर हैं। बढ़ती उम्र के साथ बीमारियां भी बढ़ती हैं। मधुमेह, रक्तचाप, गठिया, हृदय रोग और आंखों की समस्याएं आम हो चुकी हैं। इन बीमारियों के इलाज में हर महीने बड़ी राशि खर्च हो जाती है। अस्पताल तक पहुंचने, दवाइयां खरीदने और जांच करवाने में उनकी पेंशन का बड़ा हिस्सा समाप्त हो जाता है। जो धन बचता है, वह भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर खर्च हो जाता है।
विधवाओं की स्थिति भी कम कठिन नहीं है। पति की मृत्यु के बाद अनेक महिलाएं आर्थिक रूप से पूरी तरह असुरक्षित हो जाती हैं। गांवों और गरीब परिवारों में कई विधवाओं के पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं होता। सरकार से मिलने वाली पेंशन उनके लिए जीवन का एकमात्र सहारा बन जाती है। लेकिन वर्तमान समय में यह राशि इतनी कम है कि उससे केवल दो वक्त की रोटी और मामूली दवाइयों का ही खर्च निकल पाता है। यदि कोई गंभीर बीमारी आ जाए तो स्थिति और भी कठिन हो जाती है।
दिव्यांगजन भी भारी संघर्ष का सामना कर रहे हैं। कई दिव्यांग व्यक्ति शारीरिक या मानसिक सीमाओं के कारण नियमित रोजगार नहीं कर पाते। उन्हें विशेष देखभाल, दवाइयों और कभी-कभी उपकरणों की आवश्यकता होती है। इन सब पर काफी खर्च आता है। ऐसे में पेंशन राशि उनके लिए राहत से अधिक केवल जीवित रहने का साधन बनकर रह जाती है। पौष्टिक भोजन, अच्छी चिकित्सा और सुरक्षित जीवन जैसी मूलभूत सुविधाएं उनके लिए एक सपना बनती जा रही हैं।
महंगाई इस समस्या का सबसे बड़ा कारण है। खाद्य पदार्थों, दवाइयों, बिजली, गैस और परिवहन के खर्च में लगातार वृद्धि हो रही है, जबकि पेंशन राशि में उतनी बढ़ोतरी नहीं हो रही। कई राज्यों में मिलने वाली मासिक पेंशन इतनी कम है कि वह कुछ दिनों का खर्च भी पूरा नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप गरीब पेंशनभोगियों को कर्ज लेना पड़ता है या दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
सरकारी अस्पतालों की स्थिति भी चिंता का विषय है। वहां लंबी कतारें, डॉक्टरों की कमी और दवाइयों की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं आम हैं। मजबूरी में गरीब लोगों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है, जहां इलाज बेहद महंगा होता है। कई बार बुजुर्ग और गरीब मरीज पैसे की कमी के कारण अपना इलाज अधूरा छोड़ देते हैं। इससे उनकी बीमारी और गंभीर हो जाती है।
यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय समस्या भी है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने कमजोर और जरूरतमंद नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। वृद्धजन, विधवाएं और दिव्यांगजन सम्मान और सुरक्षा के हकदार हैं। उन्हें ऐसा जीवन मिलना चाहिए जिसमें उन्हें भोजन और इलाज के लिए संघर्ष न करना पड़े।
सरकार को चाहिए कि पेंशन राशि को महंगाई के अनुसार बढ़ाया जाए। गरीब पेंशनभोगियों के लिए मुफ्त या सस्ती चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। आवश्यक दवाइयों और जांचों को आसान और सुलभ बनाया जाए। साथ ही समाज और परिवारों को भी अपने बुजुर्गों और जरूरतमंद सदस्यों की देखभाल के प्रति संवेदनशील होना होगा।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि पेंशन केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समाज की जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना का प्रतीक है। यदि गरीब बुजुर्ग, विधवाएं और दिव्यांगजन अपनी अधिकांश पेंशन केवल भोजन और चिकित्सा पर खर्च करने को मजबूर हैं, तो यह हम सभी के लिए गंभीर चिंतन का विषय है।





