सौरभ वार्ष्णेय
उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष में विधानसभा चुनाव का विगुल बज जायेगा । ऐसे में विपक्ष के लोग वर्तमान सरकार की हर छोटी से छोटी समस्या को भी मुद्दा बनाने से नहीं चूक रही। अभी हाल ही में नोयडा हुए मजदूर आंदोलन से सरकार उबर पाई थी कि अब दूसरा मुद्दा स्मार्ट मीटर योजना को लेकर आ गया। हालांकि प्रदेश सरकार की मंशा पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, जो अब आम जनता—खासकर महिलाओं—के गुस्से का कारण बनती जा रही है। हाल के दिनों में कई जिलों से महिलाओं के सड़कों पर उतरकर विरोध करने की खबरें सामने आई हैं, जो इस नीति के जमीनी असर को उजागर करती हैं। वहीं फिलहाल सरकार ने इस स्मार्ट मीटर पर रोक लगा दी है।
प्रदेश में अभी जैसे तैसे कर गैस सिलेंडर की समस्या स उपजे मजदूर आंदोलन से निजात पाई थी कि और ऊपर से अब उत्तर प्रदेश में बढ़ते बिल और भरोसे का संकट के दौर से गुजर रहीं महिलाओं की स्मार्ट मीटर लगने के बाद उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत बिजली बिल में अचानक वृद्धि देखी जिसके चलते आगरा और मथुरा जैसे इलाकों में महिलाओं ने आरोप लगाया कि पहले की तुलना में बिल कई गुना बढ़ गए हैं, जबकि खपत में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। इसके साथ ही प्रीपेड सिस्टम ने समस्या को और बढ़ा दिया है—रिचार्ज खत्म होते ही बिजली कट जाती है। कई मामलों में बिल जमा करने के बाद भी आपूर्ति बहाल होने में देरी की शिकायतें सामने आई हैं। इस समस्या से जूझ रही गांवों और कस्बों में महिलाओं ने सीधे बिजली घरों का घेराव किया, प्रदर्शन किए और अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी की। आगरा में तो हालात ऐसे बने कि अधिकारियों को कार्यालय छोड़कर जाना पड़ा। यह विरोध सिर्फ आर्थिक बोझ का नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी पर पडऩे वाले असर का भी है—रसोई, बच्चों की पढ़ाई और घर के काम सीधे बिजली पर निर्भर हैं, इसलिए महिलाएं इस मुद्दे को लेकर सबसे ज्यादा सक्रिय दिख रही हैं। स्मार्ट मीटर से जुड़ी तकनीकी समस्याएं भी विवाद का बड़ा कारण हैं। कहीं सोलर उपभोक्ताओं को गलत बिल मिल रहे हैं, तो कहीं कनेक्टिविटी और रीडिंग में गड़बड़ी की शिकायतें हैं।इसके अलावा, बिना सहमति पुराने मीटर हटाने और नए मीटर लगाने के आरोपों ने जनता के भरोसे को और कमजोर किया है। लगातार विरोध और शिकायतों के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी गई। जांच के लिए तकनीकी समिति बनाई गई उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अस्थायी नियम लागू किए गए। यह कदम इस बात का संकेत है कि नीति और उसके क्रियान्वयन के बीच गंभीर खाई है।
स्मार्ट मीटर का उद्देश्य पारदर्शिता और ऊर्जा प्रबंधन को बेहतर बनाना था, लेकिन जमीनी स्तर पर यह तकनीकी सुधार सामाजिक असंतोष में बदल गया है। महिलाओं का उग्र विरोध यह बताता है कि जब किसी नीति का असर सीधे घर-परिवार की बुनियादी जरूरतों पर पड़ता है, तो वह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। स्मार्ट मीटर योजना अपने उद्देश्य में गलत नहीं, लेकिन इसकी जल्दबाजी, तकनीकी खामियां और संवाद की कमी ने इसे विवाद का केंद्र बना दिया है। यदि सरकार पारदर्शिता, जवाबदेही और उपभोक्ता हितों को प्राथमिकता नहीं देती, तो यह स्मार्ट पहल जन असंतोष का स्थायी कारण बन सकती है।
उत्तर प्रदेश में स्मार्ट बिजली मीटरों की स्थापना पर सरकार द्वारा लगाई गई रोक ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ऊर्जा क्षेत्र में तकनीकी सुधारों को बढ़ावा देने की जरूरत बार-बार रेखांकित की जा रही है। सवाल यह है कि क्या यह कदम उपभोक्ताओं के हित में है या फिर सुधारों की गति को धीमा करने वाला? स्मार्ट मीटर को बिजली वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के लिए एक अहम साधन माना जाता है। ये मीटर वास्तविक समय में खपत का डेटा देते हैं, बिलिंग में त्रुटियों को कम करते हैं और चोरी पर लगाम लगाने में मददगार होते हैं। केंद्र सरकार की योजनाओं में भी इनका विशेष स्थान है। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का इस परियोजना पर ब्रेक लगाना स्वाभाविक रूप से ध्यान आकर्षित करता है।
हालांकि, इस फैसले के पीछे उपभोक्ताओं की बढ़ती शिकायतें और असंतोष भी एक बड़ा कारण हैं। कई जगहों से यह आरोप सामने आए कि स्मार्ट मीटर के कारण बिजली बिलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के उपभोक्ताओं में यह धारणा बनी कि यह तकनीक उनके खिलाफ काम कर रही है। विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक दबाव ने भी सरकार को पुनर्विचार के लिए मजबूर किया।यहां सरकार का कदम अल्पकालिक राहत देने वाला तो दिखता है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से कुछ सवाल खड़े करता है। क्या समस्या तकनीक में है या उसके क्रियान्वयन में? क्या उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी और विश्वास में लिए बिना इस तरह के बदलाव थोपे गए? यदि हां, तो समाधान रोक नहीं, बल्कि सुधार और संवाद होना चाहिए। ऊर्जा क्षेत्र में सुधारों को स्थगित करना किसी भी राज्य के लिए आदर्श स्थिति नहीं हो सकती। स्मार्ट मीटर जैसी तकनीकें भविष्य की जरूरत हैं, लेकिन उनका सफल क्रियान्वयन पारदर्शिता, उपभोक्ता जागरूकता और जवाबदेही पर निर्भर करता है।
उत्तर प्रदेश सरकार के इस निर्णय को एक चेतावनी संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए—तकनीकी बदलावों को लागू करते समय जनविश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। अगर सरकार इस अवसर का उपयोग खामियों को दूर करने और बेहतर प्रणाली विकसित करने में करती है, तो यह रोक एक सकारात्मक मोड़ भी साबित हो सकती है। वहीं ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने यूपी बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी है। यूपी में स्मार्ट मीटर पर रोक लगा दी गई है। उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट रूप से कहा कि उपभोक्ता संतुष्टि सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।





