छात्रों का आत्मघातः सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी?

Student suicide: Is it the burden of dreams or a failure of the system?

ललित गर्ग

कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र में दो महीनों के भीतर चार छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं केवल एक संस्थान की त्रासदी एवं नाकामी नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर लगा गहरा प्रश्नचिह्न हैं। ये घटनाएं हमें झकझोरती हैं कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनमें देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं जीवन से हार मानने को विवश हो जाती हैं। कोई भी युवा, जो कठिन प्रतिस्पर्धा से गुजरकर ऐसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचता है, वह सहज रूप से जीवन का परित्याग नहीं करता, वह तब यह निर्णय लेता है जब उसे हर ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता है। यह अंधकार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और संस्थागत विफलताओं का सम्मिलित परिणाम है। एक बड़ा सवाल है कि इस तरह छात्रों का आत्मघात करना क्या सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी? आज भारत का भविष्य कहे जाने वाले युवा जिस मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हैं, वह अभूतपूर्व चिन्ताजनक है। कोटा जैसे शिक्षा नगरों में हर वर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं। इन घटनाओं को हम आंकड़ों में बदल देते हैं, लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक जीवित सपना, एक संघर्षरत परिवार और टूटती उम्मीदों की कहानी होती है। कोटा, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई और अन्य शिक्षा केंद्रों में बढ़ती आत्महत्याएं इस बात का संकेत हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ मूलभूत त्रुटियां हैं। यह केवल पढ़ाई का दबाव नहीं है, यह उस मानसिक संरचना का संकट है, जिसमें सफलता को जीवन का पर्याय बना दिया गया है और असफलता को जीवन का अंत।

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2023 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में 98 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें सबसे अधिक घटनाएं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हुईं, इसके बाद एनआईटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों का स्थान है। यह तथ्य इस धारणा को तोड़ता है कि केवल कमजोर छात्र ही मानसिक तनाव का शिकार होते हैं। सच्चाई यह है कि सबसे प्रतिभाशाली और संवेदनशील छात्र ही अक्सर सबसे अधिक दबाव महसूस करते हैं, क्योंकि वे स्वयं से अत्यधिक अपेक्षाएं रखते हैं और असफलता को स्वीकार नहीं कर पाते। यहां प्रश्न केवल संस्थानों का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का भी है जिसने सफलता को एक संकीर्ण परिभाषा में बांध दिया है। परिवार अपने बच्चों को बचपन से ही यह सिखाते हैं कि जीवन का लक्ष्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना है। अभिभावक अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर कोचिंग संस्थानों में बच्चों को भेजते हैं, बैंक से कर्ज लेते हैं और अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह अपेक्षाओं का बोझ बच्चों के मन पर इतना भारी पड़ता है कि वे स्वयं को एक प्रोजेक्ट की तरह देखने लगते हैं, एक इंसान की तरह नहीं। जब यह प्रोजेक्ट असफल होता है, तो उन्हें लगता है कि उनका अस्तित्व ही निरर्थक हो गया है।

शिक्षा व्यवस्था का ढांचा भी इस संकट के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों को ज्ञान तो देती है, लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सिखाती। उन्हें बताया जाता है कि गणित कैसे हल करना है, लेकिन यह नहीं सिखाया जाता कि जीवन की समस्याओं का समाधान कैसे करना है। उन्हें भौतिकी के नियम याद कराए जाते हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखना है। परिणामस्वरूप, जब वे वास्तविक जीवन की चुनौतियों से सामना करते हैं तो वे टूट जाते हैं। आज के शिक्षण संस्थानों में शिक्षक और छात्र के बीच का संबंध भी बदल गया है। पहले शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संरक्षक होते थे। आज यह संबंध औपचारिक हो गया है। कई शिक्षक अपनी भूमिका को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखते हैं। वे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, उनके भावनात्मक संघर्षों और उनके आंतरिक द्वंद्व को समझने का प्रयास नहीं करते। यह दूरी छात्रों को और अधिक अकेला बना देती है।

विचित्र है कि जो देश दुनिया भर में अपनी संतुलित जीवनशैली एवं अहिंसा के लिये जाना जाता है, वहां के शिक्षा-संस्थानों में हिंसा का भाव पनपना एवं छात्रों के आत्महंता होते जाने की प्रवृत्ति का बढ़ना अनेक प्रश्नों को खड़ा कर रहा है। ऐसे ही अनेक प्रश्नों एवं खौफनाक दुर्घटनाओं के आंकड़ों ने शासन-व्यवस्था के साथ-साथ समाज-निर्माताओं को चेताया है और गंभीरतापूर्वक इस विडम्बनापूर्ण एवं चिन्ताजनक समस्या पर विचार करने के लिये जागरूक किया है, लेकिन क्या कुछ सार्थक पहल होगी? बहुत जरूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थान अपनी कार्यशैली एवं परिवेश में आमूल-चूल परिर्वतन करें ताकि छात्रों पर बढ़ते दबावों को खत्म किया जा सके। फिलहाल जरूरी यह भी है कि इन संस्थानों में एक ऐसे तंत्र को विकसित किया जाए, जो निराश, हताश और अवसादग्रस्त छात्रों के लगातार संपर्क में रहकर उनमें आशा का संचार कर सके, उन्हें सकारात्मकता के संस्कार दे सके। इसके लिए स्थाई तौर पर कुछ मनोवैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।

राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास द्वारा इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग करना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन केवल जांच समितियां बनाना समस्या का समाधान नहीं है। समितियां रिपोर्ट दे सकती हैं, लेकिन वे खोए हुए जीवन को वापस नहीं ला सकतीं। आवश्यकता इस बात की है कि हम समस्या की जड़ तक पहुंचें और उसे दूर करने के लिए ठोस और दीर्घकालिक उपाय करें। छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति को केवल मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा मानना भी पर्याप्त नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक संकट है, जिसमें शिक्षा प्रणाली, पारिवारिक संरचना, सामाजिक अपेक्षाएं और व्यक्तिगत मनोविज्ञान सभी शामिल हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां सफलता की अंधी दौड़ ने मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ दिया है। यहां हर कोई आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन यह भूल जाता है कि इस दौड़ में पीछे छूटने वाले भी इंसान हैं। इस समस्या का समाधान केवल नीतिगत बदलावों से नहीं होगा, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है। सबसे पहले, हमें शिक्षा की परिभाषा को बदलना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक संतुलित और सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। छात्रों को यह सिखाया जाना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।

दूसरे, अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें अपने बच्चों को यह समझाना होगा कि वे उनसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, न कि उनकी सफलता। उन्हें बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने सपनों को पहचानने और उन्हें पूरा करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। तीसरे, शिक्षण संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझना होगा। उन्हें केवल अकादमिक उत्कृष्टता पर नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होगा। हर संस्थान में प्रभावी काउंसलिंग सिस्टम होना चाहिए, जहां छात्र बिना किसी डर या संकोच के अपनी समस्याएं साझा कर सकें। शिक्षकों को भी इस दिशा में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे छात्रों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को पहचान सकें और समय रहते उनकी सहायता कर सकें। निश्चिततौर पर समाज को भी अपनी संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि हर जीवन अमूल्य है और किसी भी सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है। हमें एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां बच्चे बिना किसी भय के अपने सपनों का पीछा कर सकें और असफल होने पर भी सम्मान के साथ जी सकें। यदि हम इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह संकट और गहराता जाएगा। हर आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि हमारे समाज की विफलता का प्रमाण होती है। अब समय आ गया है कि हम इस विफलता को स्वीकार करें और इसे सुधारने के लिए एकजुट होकर प्रयास करें। तभी हम अपने युवाओं को इस आत्मघाती मार्ग से बचा सकेंगे और उन्हें एक उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकेंगे।