अजय कुमार
उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (एसआईआर) को पूरी तरह वैध और संवैधानिक घोषित कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे निष्पक्ष एवं शुद्ध मतदाता सूची सुनिश्चित करने का पूर्ण अधिकार है। न्यायालय ने यह भी कहा कि विशेष परिस्थितियों में सामान्य प्रक्रिया से भिन्न तरीका अपनाना न तो संविधान के विरुद्ध है और न ही किसी कानून का उल्लंघन। इस प्रक्रिया को न्यायालय में चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि विशेष गहन पुनरीक्षण सामान्य संशोधन प्रक्रिया से बिल्कुल अलग है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। किंतु उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि चुनाव आयोग द्वारा मांगे जाने वाले 11 प्रकार के दस्तावेजों का समूह मनमाना नहीं है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अपने आदेश के माध्यम से आधार कार्ड को भी स्वीकार्य दस्तावेजों में शामिल किए जाने के पश्चात याचिकाकर्ताओं की आपत्ति का कोई आधार नहीं बचता। सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के उस नैरेटिव की हवा निकाल दी, जिसमें वह एसआईआर को लोगों की नागरिकता छीनने का टूल बताकर प्रोपेगैंडा कर रहा था।
सुप्रीम कोर्ट के 27 मई को सुनाए गए निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उच्चतम न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष के उस सबसे बड़े तर्क को सीधे खारिज कर दिया, जिसमें कहा जा रहा था कि यह प्रक्रिया पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच करने का एक षड्यंत्र है। याचिकाकर्ताओं और विभिन्न विपक्षी दलों की यह आशंका थी कि मतदाता सूची से नाम हटाकर वास्तव में किसी की नागरिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है। न्यायालय ने इस सोच को पूरी तरह गलत करार दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता के प्रश्न को केवल इस सीमित दायरे में देख सकता है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में सम्मिलित किया जाए अथवा नहीं। चुनाव आयोग का काम नागरिकता तय करना नहीं है, यह एक पूर्णतः भिन्न और अलग प्रक्रिया है। यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह भारत का नागरिक नहीं रहा। नागरिकता और मतदाता सूची में नामांकन दो अलग-अलग विषय हैं और इन्हें एक नहीं माना जा सकता।
न्यायालय के इस विश्लेषण ने विपक्ष की उस रणनीति को बड़ा झटका दिया, जिसके अंतर्गत विशेष गहन पुनरीक्षण को लोगों में भय और असुरक्षा फैलाने का माध्यम बनाया जा रहा था। विशेष रूप से अल्पसंख्यक और प्रवासी मतदाताओं में यह धारणा बनाई जा रही थी कि इस अभियान के माध्यम से उनके नाम सूची से हटाए जाएंगे और उनकी नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। न्यायालय ने इस भ्रम को पूरी तरह निर्मूल कर दिया। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया आरंभ होते ही विपक्षी दलों ने इसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना लिया था। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने इस प्रक्रिया पर कड़े प्रहार करते हुए कहा था कि यह गरीबों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को मतदान से वंचित करने की सोची-समझी योजना है। उन्होंने कहा था कि जिन लोगों के पास कागज-पत्र नहीं हैं, उनके नाम काट दिए जाएंगे और इस तरह लाखों वंचित मतदाता अपने मताधिकार से हाथ धो बैठेंगे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए इसे संविधान की भावना के विरुद्ध बताया था। उनका कहना था कि लोकतंत्र में मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पारदर्शी और सर्वस्वीकृत होनी चाहिए, न कि एकतरफा और मनमाने तरीके से लागू की जानी चाहिए। वामपंथी दलों ने भी न्यायालय में इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं का समर्थन किया था और कहा था कि यह पूरा अभियान संदिग्ध है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा था कि यह सत्ता पक्ष के इशारे पर चुनाव आयोग द्वारा चुनाव परिणामों को प्रभावित करने का प्रयास है। उन्होंने मांग की थी कि इस प्रक्रिया को तत्काल रोका जाए और इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए। किंतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद अब विपक्ष के ये सभी तर्क न्यायिक दृष्टि से निराधार सिद्ध हो गए हैं। न्यायालय ने न केवल इस प्रक्रिया को संवैधानिक करार दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदाता सूची सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। इस निर्णय के बाद विपक्ष के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल करना अब बेहद कठिन हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्णय से बिहार चुनाव की पूर्व-संध्या पर चुनाव आयोग की साख को बल मिला है। अब तक विपक्ष यह दावा कर रहा था कि चुनाव आयोग पक्षपातपूर्ण ढंग से काम कर रहा है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने आयोग की स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की पुष्टि कर उस आरोप को भी कमजोर कर दिया है।
यह निर्णय इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि न्यायालय ने अपनी टिप्पणियों में बहुत स्पष्टता के साथ यह रेखा खींच दी कि मतदाता सूची में नाम होना और नागरिक होना, ये दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं। यदि किसी कारणवश किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है, तो उसके नागरिक अधिकार उससे नहीं छिनते। वह व्यक्ति आवश्यक प्रक्रिया के माध्यम से पुनः अपना नाम सूची में दर्ज करा सकता है। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य केवल मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना है। मृत व्यक्तियों के नाम, एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नाम और फर्जी प्रविष्टियां हटाना इस प्रक्रिया का मूल लक्ष्य है। आयोग का कहना है कि यदि मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी, तो चुनाव की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा। राष्ट्रीय जनता दल के नेता और याचिकाकर्ता मनोज झा, जो प्रमुख याचिकाकर्ताओं में से एक हैं, ने फैसले पर कहा कि न्यायालय का आदेश स्वीकार है, लेकिन चिंता बरकरार रहेगी। हम न्यायपालिका के सम्मान को स्वीकारते हैं, पर जो भय हमारी सामुदायिक जमीन पर फैला था, उसे समझने की जरूरत है। आयोग से अनुरोध है कि वह पारदर्शिता, संवेदनशीलता और व्यापक जन-सहभागिता सुनिश्चित करे, ताकि कमजोर वर्गों के मताधिकार सुरक्षित रहें। झा ने यह भी कहा कि वे और उनकी पार्टी कानूनी विकल्पों और जन-आंदोलन दोनों के जरिए दबाव बनाए रखने का अधिकार रखती है। उन्होंने आयोग से आपत्तियों के निराकरण के लिए आसान रेमेडी और ग्रिवांस रिड्रेसल मैकेनिज्म की मांग दोहराई।
बहरहाल, उच्चतम न्यायालय का निर्णय तकनीकी तौर पर चुनाव आयोग को एक मजबूत वैधानिक कवच देता है और एसआईआर को जारी रखने का रास्ता साफ करता है। पर राजनीतिक पटल पर यह फैसला केवल एक चेकमेट की तरह काम करेगा, जहां न्यायिक पुष्टि के बाद भी मैदान पर सियासी दल अपने नैरेटिव में, जमीन पर काम और वोटर-कनेक्शन को लेकर नए आयाम तलाशेंगे। मनोज झा और राजद का बयान दिखाता है कि अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया गया है, पर राजनीतिक संघर्ष और निगरानी जारी रहेगी, विशेषकर जब निर्णय का असर संवेदनशील समूहों पर सीधे महसूस होता है। इसलिए अगले कुछ हफ्तों में यह देखने योग्य होगा कि प्रशासनिक व्यवहार, पारदर्शिता और शिकायत निवारण के तंत्र कितनी जल्दी और किस तरह काम में आते हैं; वही तय करेंगे कि यह फैसला अपने आप में लोकतंत्र की मजबूती बनकर उभरता है या केवल एक कानूनी विजय तक सीमित रहता है। लब्बोलुआब यह है कि उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय के पश्चात अब यह सुनिश्चित हो गया है कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया बिना किसी बाधा के जारी रहेगी। न्यायपालिका ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि संवैधानिक संस्थाओं को उनके दायरे में काम करने से न केवल रोका नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। यह निर्णय आने वाले चुनावों में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, जहां अब दलों को अपने मुद्दे और एजेंडे नए सिरे से तय करने होंगे।





