प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
जब नवाचार की रोशनी विनाश की छाया में बदलने लगे, तब खतरा केवल एक धमाके का नहीं, बल्कि पूरी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का संकेत बन जाता है। नई दिल्ली के लाल किले के समीप 10 नवंबर 2025 को शाम 6:52 बजे हुआ कार बम विस्फोट इसी भयावह बदलाव की कठोर चेतावनी बनकर उभरा। ह्युंडई आई-20 कार में लगाए गए उच्च तीव्रता वाले विस्फोटक ने 15 लोगों की जान ले ली, जिनमें आत्मघाती हमलावर डॉक्टर उमर उन नबी भी शामिल था, जबकि 20 से अधिक लोग घायल हुए। राष्ट्रीय जांच एजेंसी की गहन पड़ताल और 7500 पृष्ठों की चार्जशीट ने स्पष्ट किया कि यह हमला केवल पारंपरिक आतंकी वारदात नहीं, बल्कि डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के सहारे रची गई सुनियोजित ‘आतंक इंजीनियरिंग’ का खतरनाक उदाहरण था। भारत में पहली बार एआई आधारित साधनों को सामूहिक हिंसा की साजिश से जुड़ते देखा गया, जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा और चुनौतियों दोनों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया।
सबसे खतरनाक सच यह था कि इस साजिश की शुरुआत किसी गुप्त आतंकी ठिकाने से नहीं, बल्कि खुले डिजिटल मंचों से हुई। आरोपी जसीर बिलाल वानी ने चैटजीपीटी और यूट्यूब जैसे माध्यमों से तकनीकी जानकारी जुटाई। “रॉकेट कैसे बनाएं” और “मिश्रण का अनुपात क्या हो” जैसे प्रश्नों के जरिए उसने संवेदनशील सूचनाओं तक पहुंचने की कोशिश की। यूट्यूब से आईईडी निर्माण संबंधी सामग्री देखी गई और ई-कॉमर्स मंचों से जरूरी पुर्जे जुटाए गए। इस पूरी प्रक्रिया ने स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक आतंकवाद अब केवल गुप्त शिविरों तक सीमित नहीं, बल्कि इंटरनेट, डिजिटल संवाद और सामान्य उपभोक्ता सुविधाओं के सहारे भी घातक रूप ले सकता है। यही कारण है कि तकनीकी दुरुपयोग सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक नया और जटिल खतरा बन चुका है।
जांच की परतें खुलीं तो यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल एक विस्फोट नहीं, बल्कि बहुस्तरीय विनाश की सुनियोजित साजिश थी। कश्मीर के काजीगुंड जंगलों में रॉकेट और सिलिंडर आधारित आईईडी का सफल परीक्षण किया गया। डॉक्टर उमर उन नबी ने ड्रोन उपलब्ध कराए, संबंधित योजना बनाई। अल फलाह विश्वविद्यालय के रूम नंबर 13 में विस्फोटक सामग्री रखी गई, जबकि लगभग 2900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट की जब्ती ने इस षड्यंत्र की गंभीरता और व्यापकता उजागर कर दी। जांच एजेंसियों के अनुसार यह मॉड्यूल अल कायदा की शाखा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा था। डॉक्टरों, प्रोफेसरों और शिक्षित युवाओं की भागीदारी ने ‘व्हाइट कॉलर आतंक’ को उभरते और गंभीर खतरे के रूप में सामने ला दिया।
सवाल अब तकनीक की ताकत का नहीं, उसकी अनदेखी दरारों का है, जहाँ से खतरा चुपचाप भीतर प्रवेश कर रहा है। इस घटना ने एआई और डिजिटल मंचों की कई गंभीर कमजोरियां उजागर कीं। संवादात्मक एआई (चैटबॉट, वर्चुअल असिस्टेंट आदि), वीडियो सामग्री और खुली तकनीकी सूचनाओं का दुरुपयोग इसलिए संभव है, क्योंकि आतंकी सामान्य उपयोगकर्ताओं की तरह अपनी गतिविधियां छिपाकर काम करते हैं। ड्रोन, कमर्शियल इलेक्ट्रॉनिक्स और रासायनिक पदार्थों की आसान उपलब्धता ने खतरे को और बढ़ाया। भारत में एआई गवर्नेंस और डिजिटल जवाबदेही के बीच मौजूद खामियां यही दर्शाती हैं कि तकनीक की यही दरारें आतंकवाद के लिए खतरनाक सहायक बन सकती हैं।
अब आतंक की जड़ें केवल ज़मीन पर नहीं, डिजिटल दुनिया की अदृश्य परतों में भी फैल चुकी हैं। एआई का इस्तेमाल भर्ती, प्रचार, वित्तीय नेटवर्क और कट्टरपंथी प्रभाव फैलाने में तेजी से बढ़ रहा है। सामाजिक मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए पढ़े-लिखे युवाओं तक पहुंच आसान हो गई है। कम लागत में बड़े प्रभाव वाले हमले संभव हो चुके हैं। लाल किले ब्लास्ट में वाहन आधारित आईईडी, ड्रोन और रॉकेट हमलों की संयुक्त योजना ने साबित किया कि आतंकवाद अब गुप्त ठिकानों से निकलकर लैपटॉप और स्मार्टफोन तक पहुंच चुका है। सुरक्षा बलों के लिए अब केवल हथियार पकड़ना नहीं, बल्कि डिजिटल गतिविधियों के पैटर्न, भाषा और तकनीकी रणनीतियों को समझना भी बड़ी चुनौती बन गया है।
इस चुनौती का सबसे मजबूत उत्तर अनियंत्रित तकनीक नहीं, बल्कि सख्त और जिम्मेदार नियंत्रण है। एआई मंचों पर सुरक्षा अवरोध और संवेदनशील प्रश्नों पर प्रभावी फिल्टरिंग अनिवार्य है। संदिग्ध खोज पैटर्न, उच्च जोखिम वाले उपयोग और खतरनाक संशोधन प्रयासों की पहचान के लिए उन्नत निगरानी तंत्र विकसित करना होगा। भारत सरकार को एआई गाइडलाइंस को स्पष्ट कानूनी आधार देना चाहिए, जिसमें ऑडिट, पारदर्शिता और जवाबदेही शामिल हो। साइबर सुरक्षा एजेंसियों को ऐसी एआई आधारित प्रणाली तैयार करनी होगी, जो रीयल टाइम में संदिग्ध गतिविधियों को पहचान सके। तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए तकनीक को ही मजबूत प्रहरी बनाना होगा।
यह चुनौती केवल निगरानी से नहीं, बल्कि सामूहिक जागरूकता और वैश्विक तालमेल से ही नियंत्रित होगी। आम नागरिकों को संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों और भ्रामक सामग्री की रिपोर्टिंग के लिए जागरूक करना जरूरी है। पुलिस, खुफिया एजेंसियों और जांच अधिकारियों को एआई प्रशिक्षण देकर डिजिटल आतंकी रणनीतियों के प्रति सक्षम बनाना होगा। तकनीकी कंपनियों और निजी क्षेत्र के सहयोग से संदिग्ध सामग्री की त्वरित पहचान संभव होगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त रणनीति, बेहतर सूचना साझाकरण और डीपफेक पहचान तंत्र को मजबूत करना भी आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकार और वैध डिजिटल स्वतंत्रता प्रभावित न हों।
कभी जो खतरा बारूद और बंदूक तक सीमित दिखता था, आज वही आतंकवाद डेटा, एल्गोरिद्म और डिजिटल नेटवर्क की आड़ में कहीं अधिक जटिल और घातक रूप ले चुका है। यदि तकनीकी खामियों को समय रहते नहीं रोका गया, तो भविष्य के हमले अधिक गुप्त, सुनियोजित और विनाशकारी हो सकते हैं। ऐसे समय में मजबूत कानून, जिम्मेदार एआई, तकनीकी सतर्कता, जन-जागरूकता और वैश्विक सहयोग ही सबसे मजबूत जवाब हैं। भारत के लिए यह केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि यह तय करने की घड़ी है कि तकनीकी प्रगति मानव संरक्षण की शक्ति बनेगी या विनाश का नया मार्ग खोलेगी। यही निर्णय आने वाले कल की सुरक्षा तय करेगा।





