पुस्तक संस्कृति का क्षरण: आने वाले संकट की आहट

The erosion of book culture: a sign of impending crisis

योगेश कुमार गोयल

पुस्तकों की महत्ता और इनसे अर्जित ज्ञान के संबंध में सदैव कहा जाता रहा है कि ज्ञान कभी बेकार नहीं होता और पुस्तकें विभिन्न संस्कृतियों, पहचानों और भाषाओं के माध्यम से अपनी विशिष्टताओं को प्रकट करते हुए एक कहानी और एक सामान्य विरासत के आसपास लोगों को एक साथ लाती हैं लेकिन यह चिंताजनक है कि पाठकों में पुस्तकें पढ़ने की आदत निरंतर कम होती जा रही है। लोगों को पुस्तकें पढ़ने, कॉपीराइट कानूनों तथा अन्य उपायों को समझने के लिए प्रोत्साहित करने, लेखकों और पुस्तकों को वैश्विक सम्मान देने तथा पढ़ने की कला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को यूनेस्को तथा दुनियाभर के अन्य संबंधित संगठनों द्वारा ‘विश्व पुस्तक दिवस’ मनाया जाता है। ‘विश्व पुस्तक तथा कॉपीराइट दिवस’ का औपचारिक शुभारंभ ‘यूनेस्को’ द्वारा 23 अप्रैल 1995 को किया गया था।

यह चिंता का विषय है कि आधुनिकता के दौर में बच्चों के साथ-साथ बड़ों का लगाव भी पुस्तकों के प्रति कम हुआ है। मोबाइल और कम्प्यूटर के जमाने में अब बच्चे हों या बड़े, अधिकांश इन्हीं पर अपना ज्यादातर समय बिताने लगे हैं लेकिन अधिकांश विद्वानों का स्पष्ट मत है कि इंटरनेट या विभिन्न संचार माध्यमों से मिलने वाली जानकारियों को हमारे मस्तिष्क को चुपचाप ग्रहण करना पड़ता है, जो दिमाग की खुद की कल्पनाशीलता को कुंद कर देते हैं जबकि पुस्तकें पढ़ने के लिए ध्यान, एकाग्रता और मेहनत की आवश्यकता होती है, जिससे विचारों और भावनाओं के लिए नई रोशनी और प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए जरूरी है कि टीवी या सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से चिपके रहने के बजाय पुस्तकों की दुनिया को जीवन का अभिन्न अंग बनाया जाए ताकि रचनात्मकता का उपयोग करते हुए क्षितिज का विस्तार करने में पुस्तकों की शक्ति का बेहतर उपयोग किया जा सके। बाल साहित्य और ज्ञानवर्द्धक पुस्तकों के माध्यम से बच्चों के मानसिक विकास को बढ़ावा देने और साहित्य के प्रति उनमें आजीवन प्रेम उत्पन्न करने का भी प्रयास किया जाए। जिस समय हमारे आसपास कोई नहीं होता या हम अकेले अथवा उदास हैं, परेशान हैं, ऐसे समय में पुस्तकें ही हमारी सच्ची दोस्त बनकर हमें सहारा देती हैं। हमारे दिलोदिमाग में उमड़ते सवालों का जवाब पाने के लिए पुस्तकों से बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता।

सभी भारतीय भाषाओं में पुस्तकों को बढ़ावा देने और पढ़ने की संस्कृति विकसित करने की एक पहल के रूप में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा प्रतिवर्ष दिल्ली में भव्य पुस्तक मेले ‘विश्व पुस्तक मेला’ का आयोजन किया जाता है। इस प्रकार के आयोजन लोगों में किताबें पढ़ने की रूचि विकसित करने के साथ-साथ कलम और मुद्रित दुनिया की ताकत को दोहराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि हर साल इतने भव्य और विशाल पुस्तक मेले के सफल आयोजन के बावजूद विशेषकर हिन्दी भाषी पाठकों में पुस्तकें पढ़ने की आदत कम हो रही है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि साल में एक बार आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले के अलावा भी ऐसे क्या प्रयास किए जाएं, जिससे लोगों की दिलचस्पी पुस्तकों के प्रति बढ़े और हिन्दी पुस्तकें ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंच सकें? आज के दौर में लोगों की रूचि पुस्तकों में कम होती जा रही है, ऐसे में पुस्तक मेलों के आयोजन के माध्यम से तो लोगों में पुस्तकों के प्रति आकर्षण बढ़ाने के प्रयास किया जाना जरूरी है ही, साथ ही स्कूलों और स्थानीय पुस्तकालयों में भी अच्छी पुस्तकें पर्याप्त संख्या में उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। खासकर बच्चों के समग्र विकास के लिए तो उन्हें प्रेरणादायक बाल साहित्य, दिलचस्प नवीनतम साहित्य तथा अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों की ओर आकर्षित करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ऐसी पुस्तकों को पढ़ने से उनका मानसिक और सामाजिक विकास तीव्रता से होता है।

किसी भी स्कूल का पुस्तकालय बच्चों में पुस्तकों के प्रति प्रेम विकसित करने और उन्हें दुनिया के बारे में अधिक जानने में भी मदद करता है। यही कारण है कि केवल पाठ्य पुस्तकों को ही बच्चों की समझ को विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता। इसीलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में सभी स्तर के विद्यार्थियों के लिए स्कूल और स्थानीय पुस्तकालयों में स्थानीय भाषाओं में दिलचस्प और प्रेरणादायक बाल साहित्य तथा पुस्तकें बड़ी संख्या में उपलब्ध कराने की बात कही गई थी लेकिन मौजूदा समय में स्कूलों में ऐसी पुस्तकों की उपलब्धता के आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं। कुछ राज्यों में स्कूलों की लाइब्रेरी में पुस्तकों की संख्या संतोषजनक है लेकिन कई राज्यों में बच्चों के पढ़ने के लिए पुस्तकों की कमी के मामलों में लापरवाही व उदासीनता साफ झलकती है। हालांकि नई पुस्तकों की खरीद के लिए प्रतिवर्ष लाखों रुपये का बजट आवंटित होता है लेकिन स्कूलों के पुस्तकालयों में रखरखाव के अभाव में पुस्तकों को दीमक चाट रहे हैं। कमोवेश ऐसा ही हाल देश के लगभग सभी राज्यों में देखने को मिलता है। स्कूलों में बच्चों के लिए पुस्तकों की उपलब्धता और उनके रखरखाव में लापरवाही के मामलों को गंभीरता से देखने और इसे लेकर कड़े कदम उठाने की जरूरत है ताकि स्कूली स्तर पर ही पुस्तकों के प्रति बच्चों का आकर्षण कम न होने पाए।

पुस्तकों की महत्ता को परिभाषित करते हुए अमेरिकी इतिहासकार व लेखक बारबरा डब्ल्यू तुचमन का कहना था कि पुस्तकें सभ्यता की वाहक हैं, जिनके बिना इतिहास मौन है, साहित्य गूंगा हैं, विज्ञान अपंग है, विचार और अटकलें स्थिर हैं। पुस्तकों की महत्ता और इनसे अर्जित ज्ञान के संबंध में सदैव कहा जाता रहा है कि ज्ञान कभी बेकार नहीं होता और पुस्तकें विभिन्न संस्कृतियों, पहचानों और भाषाओं के माध्यम से अपनी विशिष्टताओं को प्रकट करते हुए एक कहानी और एक सामान्य विरासत के आसपास लोगों को एक साथ लाती हैं। पुस्तकें ज्ञान एवं नैतिकता की संदेशवाहक, अखण्ड सम्पत्ति, भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति हेतु एक खिड़की तथा चर्चा हेतु एक औजार का काम करती हैं तथा भौतिक वैभव के रूप में देखी जाती हैं। अच्छी पुस्तकें बच्चों और युवा पीढ़ी को ज्ञानवान, संस्कारित और चरित्रवान बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाती हैं।