नारी वंदन संशोधन अधिनियम लोकसभा में गिरा, इतिहास बनाने का अवसर नहीं हुआ पूरा

The Nari Vandan (Women's Representation) Amendment Bill was defeated in the Lok Sabha, and the opportunity to create history was not fulfilled

महिला सशक्तिकरण की राह में एक और ठहराव

एन जी भट्ट

महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बहुप्रतीक्षित पहल, जिसे नारी वंदन संशोधन अधिनियम के रूप में जाना गया, लोकसभा में 2/3 बहुमत से पारित नहीं हो सका और अंततः298 के मुकाबले से 230 मतों से गिर गया। इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिक दलों में देश की आधी आबादी महिलाओं को बराबरी का राजनीतिक अधिकार दिलाने की राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिए ठोस इच्छाशक्ति का अभाव है?

भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है। पिछले तीन दशकों से यह विषय समय-समय पर संसद के एजेंडे में आता रहा है, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से यह अधूरा रह जाता है। इस बार भी उम्मीद की जा रही थी कि नारी वंदन संशोधन अधिनियम के माध्यम से यह ऐतिहासिक पहल साकार होगी, लेकिन लोकसभा में प्रतिपक्ष की सहमति के अभाव और राजनीतिक मतभेदों के चलते यह संभव नहीं हो पाया।

लोकसभा के तीन दिनों के विशेष अधिवेशन में प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृह मंत्री, प्रतिपक्ष और विभिन्न राजनीतिक पक्ष और प्रतिपक्ष के नेताओं के मध्य हुई 21 घंटों की लम्बी बहस के दौरान विभिन्न दलों ने इस अधिनियम का समर्थन तो किया, लेकिन इसके स्वरूप और प्रावधानों को लेकर कई तरह की आपत्तियां भी दर्ज करा दी। कुछ दलों ने मांग की कि आरक्षण के भीतर आरक्षण सुनिश्चित किया जाए, ताकि पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं को भी समान अवसर मिल सके। वहीं कुछ अन्य दलों ने इस महिला आरक्षण बिल को परिसीमन और जनगणना से जोड़ने के प्रावधान पर अपनी आपत्ति जताई ।

केन्द्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि यह अधिनियम महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है और इसे व्यापक दृष्टिकोण के साथ देखा जाना चाहिए लेकिन विपक्ष का आरोप रहा कि नारी वंदन अधिनियम तो 2023 में ही पारित किया जा चुका है जिसमें विपक्ष का भी समर्थन था लेकिन सरकार ने इसे गंभीरता से आगे बढ़ाने के बजाय इसका नोटिफिकेशन भी संशोधित बिल आने के बाद किया और 2026 और 2029 में राजनीतिक लाभ के लिए प्रस्तुत किया। जब सहमति बनाने की जरूरत थी, तब पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए।

नारी वंदन अधिनियम के लोकसभा में गिरने से सबसे बड़ा नुकसान उस उम्मीद को हुआ है, जो देश की करोड़ों महिलाओं ने इस पहल से जोड़ी थी। यह केवल एक विधेयक का गिरना नहीं है, बल्कि उस विश्वास को भी झटका है कि राजनीतिक व्यवस्था महिलाओं को बराबरी का स्थान देने के लिए तैयार है या नहीं। हालांकि, यह भी सच है कि पंचायत और नगरीय निकायों में महिला आरक्षण ने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया है और 15 qलाख निर्वाचित महिलाओं ने अपनी काबिलियत साबित की है। देश के कई हिस्सों में महिलाओं ने स्थानीय शासन में अपनी प्रभावी भागीदारी से यह साबित किया है कि अवसर मिलने पर वे नेतृत्व की भूमिका को बखूबी निभा सकती हैं। ऐसे में संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना लोकतंत्र को और मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम माना जाता है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण केवल प्रतिनिधित्व का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समावेशी विकास से भी जुड़ा हुआ है। जब निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो नीतियों में भी उनके दृष्टिकोण और प्राथमिकताओं का समावेश होगा, जिससे समाज के व्यापक वर्गों को लाभ मिलेगा।

नारी वंदन अधिनियम के असफल होने के बावजूद, इस मुद्दे की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है बल्कि यह और अधिक स्पष्ट हो गया है कि महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक सहमति बनाना समय की आवश्यकता है। इसके लिए सभी दलों को अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर एक साझा दृष्टिकोण अपनाना होगा।

लोकसभा में इस 131 वें संशोधन बिल के गिरने से महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक अस्थायी झटका जरूर है, लेकिन इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इस विषय पर पुनः गंभीरता से विचार किया जाएगा और ऐसा समाधान निकाला जाएगा, जो वास्तव में महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने में सहायक हो। जब तक यह लक्ष्य हासिल नहीं होता, तब तक लोकतंत्र की पूर्णता का दावा अधूरा ही रहेगा।