दिल्ली-6 में मकसूद अहमद नाम का एक शिक्षक निर्धन परिवार के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बिना फीस लिए तैयार करता है। इस शिक्षक का नाम है मकसूद अहमद। वे एंग्लो अराबिक स्कूल में जीव विज्ञान पढ़ाते हैं और शाम को कोचिंग देते हैं। उनके प्रयासों से बहुत से बच्चों ने कई प्रतियोगी परीक्षाओं को क्रैक किया है। मकसूद अहमद राजघाट और शांति वन में होने वाली सर्व धर्म प्रार्थना सभाओं का भी स्थायी चेहरा हैं। वे वहां कुऱआन की आयतें पढ़ते हैं।
विवेक शुक्ला
दिल्ली-6 की संकरी गलियों और अजमेरी गेट के ऐतिहासिक एंग्लो-अरेबिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शताब्दियों पुरानी इमारत में एक शिक्षक रोजाना विज्ञान की कक्षाएं लेता हैं, लेकिन उसकी कहानी कक्षा तक सीमित नहीं है। मकसूद अहमद स्कूल की चार दीवारों से आगे निकलकर गरीब बच्चों के लिए आशा की किरण बने हैं। वे एंग्लो-अरेबिक स्कूल में जीव विज्ञान पढ़ाते हैं और शाम को सुईवालान में अल्लामा रफीक ट्रस्ट के तहत मुफ्त कोचिंग चलाते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। उनका जीवन समर्पण, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी का अनुपम उदाहरण है।
मकसूद अहमद का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली में हुआ। वे 1992 में एंग्लो-अरेबिक स्कूल में शामिल हुए, जो 1696 में मदरसा गाजीद्दीन के रूप में स्थापित हुआ था। यह स्कूल दिल्ली का सबसे पुराना शैक्षणिक संस्थान है। यहां ही उर्दू कवि अख्तर उल इमान, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर प्रो. ए.एन. कौल जैसे गणमान्य व्यक्तिय पढ़े हैं। इस स्कूल में मुख्य रूप से कामकाजी और निम्न आय वाले परिवारों के बच्चे ही पढ़ते हैं।
कक्षा में मकसूद अहमद छात्रों के बीच जटिल जैविक अवधारणाओं को सरल बनाने और जिज्ञासा जगाने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे कहते हैं कि शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन बदलने का माध्यम है। स्कूल में कुछ साल पढ़ाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि केवल स्कूल की पढ़ाई पर्याप्त नहीं है। कई बच्चे आर्थिक तंगी के कारण आगे नहीं बढ़ पाते। कुछ साल पहले उन्होंने सुईवालान में छोटी जगह लेकर शाम की कक्षाएं शुरू कीं। शुरू में यह छोटा प्रयास था, लेकिन धीरे-धीरे यह अल्लामा रफीक ट्रस्ट में बदल गया, जिसमें मित्रों का सहयोग शामिल हुआ। ट्रस्ट अब शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और कौशल विकास के क्षेत्र में काम करता है।
मकसूद अहमद मुफ्त कोचिंग देते हैं। यहां गरीब परिवारों के बच्चे आते हैं। इनमें रिक्शा चालक, दर्जी, दुकानदार या मजदूरों के बेटे-बेटियां आईआईटी-जेईई, बैंक पीओ और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। निजी कोचिंग संस्थानों में जहां हजारों रुपये खर्च होते हैं, वहां ये बच्चे बिना किसी आर्थिक बोझ के पढ़ते हैं। वे बच्चों को स्टडी मटेरियल भी उपलब्ध करवा देते देते हैं। वे कहते हैं- “प्रतिभा हर जगह बराबर बंटी है, लेकिन अवसर नहीं।”
अब तक उनके प्रयासों से 30 से अधिक छात्रों ने मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य प्रतियोगी कोर्स में सफलता पाई है। जामा मस्जिद और सीता राम बाजार के आसपास के मोहल्लों से कई बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बन चुके हैं। पूर्व छात्र डॉ. जायद अहमद (तिब्बिया आयुर्वेदिक एंड यूनानी कॉलेज) कहते हैं, “स्कूल में सर ने जीव विज्ञान पढ़ाया और फिर मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी के लिए कोचिंग दी। वे पुरानी और महान शिक्षण परंपरा के प्रतीक हैं।”
मकसूद अहमद की दिनचर्या कमाल की है। स्कूल के बाद शाम को कोचिंग, देर रात तक डाउट क्लियरिंग सत्र। वे अपनी पत्नी और दोस्तों को श्रेय देते हैं, जिन्होंने हमेशा साथ दिया। वे लाइब्रेरी, वोकेशनल ट्रेनिंग, मेडिकल कैंप और स्व-अध्ययन केंद्र भी चलाते हैं। दिल्ली एजुकेशन सोसाइटी की सेक्रेटरी प्रो. केहकशां दानियाल जैसे सहयोगियों का समर्थन उन्हें प्रोत्साहित करता है।
पुरानी दिल्ली की चुनौतियां कम नहीं हैं।भीड़भाड़, सीमित संसाधन, आर्थिक दबाव और खासकर लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी सामाजिक बाधाएं। फिर भी मकसूद अहमद जैसे शिक्षक पूरे समुदाय को प्रभावित करते हैं। वे न केवल ज्ञान देते हैं बल्कि आत्मविश्वास और सपने भी जगाते हैं।
आज जब शिक्षा महंगाई और व्यावसायीकरण की चपेट में है, मकसूद अहमद जैसे शिक्षक याद दिलाते हैं कि सच्चा शिक्षक वह है जो दीवारें तोड़कर पहुंचता है। उनकी कहानी पुरानी दिल्ली की गलियों में ज्ञान के दीये की तरह जल रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को रोशन करेगी। वे साबित करते हैं कि एक समर्पित शिक्षक पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है।
मकसूद अहमद राजघाट और शांतिवन पर होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का भी स्थायी चेहरा हैं। वे वर्षों से महात्मा गांधी की जयंती (2 अक्तूबर) और बलिदान दिवस (30 जनवरी) तथा अन्य विशेष सरकारी अवसरों पर आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं में भाग लेते। वे इन सभाओं में कुरआन की आयतें पढञते हैं। वे कहते हैं कि सर्वधर्म प्रार्थना का विचार स्वयं महात्मा गांधी ने दुनिया को दिया था। उनके जीवनकाल में ही यह प्रथा शुरू हो गई थी और आज भी यह परंपरा जीवित है। ये सभाएं न केवल गांधीजी के सत्य, अहिंसा और सर्वधर्म समभाव के आदर्शों को जीवंत रखती हैं, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता और एकता की मिसाल भी पेश करती हैं।
मकसूद अहमद के.आर. नारायणन, प्रणव मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर आयोजित प्रार्थना सभाओं में भी शामिल हुए हैं।





