भारतीय राजनीति के ये जय चंद और मीर जाफ़र

These are the Jai Chand and Mir Jafar of Indian politics

तनवीर जाफ़री

सिद्धांत व विचारविहीन राजनीति करते हुये अपनी सुविधा,लाभ व राजनैतिक भविष्य के मद्देनज़र दल बदल करना हमारे देश में एक हक़ीक़त बन चुकी है। सच पूछिए तो वर्तमान सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की पूरी सत्ता इस समय दल बदलुओं के भरोसे ही चल रही है। इस समय केंद्रीय मंत्री,मुख्य मंत्री,सांसद विधायक जैसे तमाम पदों पर कल के कांग्रेसी आज के भाजपाई बने देखे जा सकते हैं। इनमें कई तो लंबे समय तक विपक्ष की भूमिका में न रह पाने और संघर्ष व विपक्ष की राजनीति में सक्षम न हो पाने के कारण किसी न किसी बहाने से भाजपा में शामिल हुये। तो कई भ्रष्ट लोग जेल जाने या क़ानूनी कार्रवाई से बचने के लिये ‘राजनैतिक धर्म परिवर्तन ‘ करने को मजबूर हुये। कुछ नेता डर,लालच या भयवश इधर से उधर करने को बाध्य हुये तो दल बदल के लिये उतावले कई नेता पार्टी में अपनी उपेक्षा का बहाना बनाकर चलते बने। यह और बात है कि ऐसे अनेक लोग दल बदल कर जहाँ गए वहां भी वे देखते देखते लापता हो गये।

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी को भी उस समय एक बार फिर ज़बरदस्त झटका लगा जबकि उसके राज्य सभा के दस में से सात सांसदों ने दल बदल कर भाजपा में शरण ले ली। ये सभी सात सांसद पंजाब राज्य से निर्वाचित होकर आये थे। ग़ौरतलब है कि इस समय आम आदमी पार्टी केवल पंजाब में ही सत्ता में है। और इसी राज्य के 7 राज्य सभा सांसदों के पार्टी बदलने के बाद अब कई विधायकों के भी दल बदल की संभावना जताई जा रही है। इस दल बदल के मुख्य सूत्रधार के रूप में राघव चड्ढा को देखा जा रहा है। राघव चड्ढा वही हैं जो कई बार यह कह चुके हैं कि भाजपा अनपढ़ व गुंडों की पार्टी है। यह गुंडों को संरक्षण देने वाली पार्टी है। राघव चड्ढा पिछले दिनों राज्यसभा में उठाये गये कई जनहितकारी मुद्दों को लेकर जनता में काफ़ी लोकप्रिय हो गये थे। उन्होंने संसद में गिग वर्कर्स की सुरक्षा, एयरपोर्ट पर आम लोगों को मिलने वाला महंगा खाना, ग़रीब आदमी का मिनिमम बैलेंस कम होने पर उसपर लगने वाली बैंक पैनल्टी, पैटरनिटी लीव, स्वास्थ्य सेवा, इनकम टैक्स जैसे अनेक मुद्दे उठाये थे। तथा इन मुद्दों पर सरकार से एक्शन लेने की मांग भी की थी। इन दलबदल करने वालों में एक राज्यसभा सांसद का नामअशोक मित्तल है। ये उस लवली ग्रुप के मालिक हैं जिसका वार्षिक टर्नओवर ₹850 करोड़ का बताया जा रहा है। मित्तल, लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी, लवली ऑटोज़, लवली स्वीट्स जैसे संस्थानों के स्वामी हैं। अभी कुछ दिन पहले ही मित्तल के लगभग सभी ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी भी हुई थी। और आख़िरकार इन्होंने भी भाजपा की शरण में जाकर अपने ‘व्यवसायिक साम्राज्य’ की रक्षा करने में ही अपनी भलाई समझी।

बहरहाल जितने भी चेहरे आम आदमी पार्टी छोड़ भाजपा में गये हैं उनमें से किसी का भी कोई पूर्व राजनैतिक अनुभव नहीं है। हरभजन सिंह क्रिकेटर को छोड़ जिसने भी अपनी पहचान बनाई है वह केजरीवाल व आप पार्टी के साथ काम कर ही बनाई है। हालांकि केजरीवाल व आप का साथ छोड़कर जाने वाले नेताओं की फेहरिस्त भी बहुत लंबी है। यह भी सच है कि केजरीवाल के आचरण व स्वभाव में ज़रूर कुछ न कुछ कमी है जिसके चलते प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव जैसे अनेक बुद्धिजीवी व सुलझे हुये लोग भी केजरीवाल को छोड़कर चले गये। परन्तु इस ताज़ातरीन दलबदल के बाद जनता की राय बिल्कुल विपरीत है।

जनता इस बार के दलबदलुओं की तुलना इतिहास के ग़द्दार जय चंद व मीर जाफ़र से कर रही है। यह सरासर पंजाब के उनलोगों से धोखा व ग़द्दारी है जिन्होंने इन ‘दलबदलुओं ‘ को मान सम्मान देकर राज्य सभा में भेजा। ऐसा माना जा रहा है कि पहले भी विभिन्न राज्यों में राजनैतिक तोड़फोड़ कर सत्ता परिवर्तन करने वाली भाजपा पंजाब में भी निर्वाचित सरकार को गिराने या अस्थिर करने के लिये आम आदमी पार्टी के विधायकों के साथ भी यही घिनौना खेल, खेल सकती है।

परन्तु भाजपा व इनके पाले में गये अवसरवादी दलबदलुओं को इसबार यह खेल मंहगा पड़ सकता है। क्योंकि इस दल बदल से आम जनता में भारी रोष है। कई किसान नेता भी खुलकर इन अवसरवादियों के विरुद्ध मैदान में आ गए हैं। जिससे ऐसा लगता है कि इन लोगों का भविष्य में जनता के बीच जाना आसान नहीं होगा। इस बात की भी उम्मीद की जा रही है कि भाजपा ने अगले वर्ष राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले जिन उम्मीदों से ‘ऑपरेशन लोटस ‘ चलाया था उन उम्मीदों पर भी पानी फिरने वाला है। यह भी क़यास लगाये जा रहे हैं कि यदि इस राजनैतिक घटनाक्रम से आम आदमी पार्टी को नुक़्सान हुआ भी तो भी भाजपा को कोई फ़ायदा नहीं मिलने वाला। बजाये इसके कांग्रेस ज़रूर राज्य में अपनी स्थिति मज़बूत कर सकती है। उधर क़ानूनी जानकारों का भी कहना है कि यह सातों सांसद भले ही दो तिहाई सदस्यों के पार्टी छोड़ने को दल बदल क़ानून के दायरे से बाहर बता रहे हों परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि सांसदों से पहले यदि आम आदमी पार्टी के सदस्यों द्वारा बाक़ायदा दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर पार्टी छोड़ने की घोषणा की गयी होती उसके बाद ही सांसदों का दो तिहाई दल बदल क़ानूनी रुप से सही माना जाता। परन्तु चूँकि पार्टी की तरफ़ से ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिये इन सभी का दलबदल पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है। लिहाज़ा यदि राज्य सभा के सभापति से लेकर अदालत तक ने समय रहते ईमानदारी से फ़ैसला किया तो इन सभी दलबदलुओं की राज्य सभा सदस्यता जा सकती है।

बहरहाल यह महाराष्ट्र नहीं जहाँ भाजपा ने शिवसेना में विभाजन कराकर सत्ता हथियाने का चक्रव्यूह रचा था। बल्कि यह वह पंजाब है जिसने किसान आंदोलन में इसी सरकार को नाकों चने चबाने और विवादित कृषि क़ानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया था। पंजाब में ही कांग्रेस व अकाली दल छोड़कर अपने ‘उज्जवल राजनैतिक कैरियर ‘ की तलाश में भाजपा में शामिल अनेक प्रमुख नेताओं का आज कोई अता पता ही नहीं है। भारतीय राजनीति के इन जय चंदों और और मीर जाफ़रों को भी न तो पंजाब की जनता बख़्शने वाली है न ही भाजपा में इन्हें वह मान सम्मान व अवसर मिलने वाला है जो इन्हें आम आदमी पार्टी में हासिल था।