ट्रंप की नीतियों ने विश्व में गिराई अमेरिका की साख

Trump's policies have tarnished America's global reputation

तनवीर जाफ़री

दरअसल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ही अमेरिका को विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में वैश्विक मान्यता मिल चुकी थी। तब तक अमेरिका परमाणु बम सम्पन्न देश होने के अलावा संयुक्त राष्ट्र के गठन में भी अपनी अग्रणी भूमिका निभाने लगा था। साथ ही अमेरिकी डॉलर ने भी अपनी वैश्विक भूमिका अदा करनी शुरू कर दी थी। हालांकि 1945 के बाद ही सोवियत संघ को भी विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में देखा जाने लगा था परन्तु 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद तो अमेरिका अकेली वैश्विक महाशक्ति रह गया। उसी समय से “विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति” के रूप में अमेरिका की स्वीकार्यता लगभग निर्विवाद हो गई थी। उसके बाद अमेरिका स्वयं को वैश्विक महाशक्ति के साथ साथ ‘वैश्विक थानेदार’ के रूप में भी स्वयं को देखने लगा। और लगभग विश्व के सभी देशों के आंतरिक मामलों पर नज़र रखने लगा। धीरे धीरे प्रत्येक दो पड़ोसी देशों के आपसी मतभेदों,तनाव अथवा सीमा विवाद का लाभ उठाकर अमेरिका ने दुनिया भर के तमाम देशों में अपने सैन्य अड्डे बनाने व अमेरिकी सैनिकों की तैनाती करनी शुरू कर दी। एक अनुमान के अनुसार इस समय विश्व भर में अमेरिका के लगभग 750 से अधिक सैन्य अड्डे मौजूद हैं। ये अड्डे लगभग 80 अलग अलग देशों में फैले हुए हैं। इनमें स्थायी बेस, एयरबेस, नौसैनिक अड्डे, लॉजिस्टिक सेंटर और छोटे “लिली पैड” फ़ारवर्ड ऑपरेटिंग लोकेशन आदि शामिल हैं। पेंटागन की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार 2026 के आसपास क़रीब 1,08,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक लगभग 160 देशों में तैनात या अग्रिम रूप से मौजूद हैं। अमेरिकी सैनिकों की तैनाती सैन्य अड्डों से कहीं अधिक देशों में फैली हुई है। जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया की गिनती उन देशों में हैं जहाँ अमेरिकी सैन्य अड्डों और अमेरिकी सैनिकों की तैनाती सबसे अधिक है।

दूसरी तरफ़ 1970–80 के दशक में चीन की “भविष्य की महाशक्ति” के रूप में कल्पना की जाने लगी। और 1990–2000 के दशकआते आते उसे एक “उदयमान महाशक्ति” के रूप में देखा जाने लगा। और 2010 के बाद से तो चीन को व्यावहारिक रूप से अमेरिका के बराबर या उसके बाद आने वाली वास्तविक वैश्विक महाशक्ति के रूप में गिना जाने लगा। गोया चार दशकों पहले तक जो चीन, दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में गिना जाता था वही देश 1978 के बाद के सुधारों से तेज़ी से बढ़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया और आज वैश्विक उत्पादन व सप्लाई चेन में उसकी केंद्रीय भूमिका है। बड़े पैमाने पर निर्माण, निर्यात-आधारित विकास, विदेशी निवेश के लिए खुले विशेष आर्थिक क्षेत्र, और कम लागत वाली श्रमशक्ति ने चीन को विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी बना दिया। इसी अवधि में चीन ने अपनी सेना को आधुनिक बनाया, नौसेना, मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भारी निवेश किया, जिससे उसे केवल विश्व की आर्थिक नहीं बल्कि सामरिक महाशक्ति के रूप में भी देखा जाने लगा। 5G, एआई, अंतरिक्ष प्रक्षेपण और हाई-टेक विनिर्माण में उसकी तेज़ प्रगति ने “मेड इन चाइना 2025” जैसी रणनीतियों के तहत तकनीकी महाशक्ति की छवि को भी विश्व स्तर पर मज़बूत किया। बेल्ट एंड रोड पहल के माध्यम से एशिया, अफ़्रीका और यूरोप में आधारभूत संरचना पर निवेश व ऋण देकर चीन ने अपनी भू-राजनीतिक पकड़ और कूटनीतिक शक्ति को बढ़ाया, जो महाशक्ति का एक प्रमुख गुण माना जाता है। साथ ही ताइवान, दक्षिण चीन सागर और सीमा विवादों पर उसकी मुखर नीति ने भी यह संदेश दिया कि वह क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति के स्तर पर ‘खेलना’ चाहता है। परन्तु अमेरिका व चीन की वैश्विक नीतियों में यह बड़ा अंतर भी रहा कि चीन ने अमेरिका की तरह दूसरे देशों से ‘थानेदार’ जैसा बर्ताव करने के बजाये क्षेत्रीय मामलों में ग़ैर ज़रूरी दख़लअंदाज़ी से परहेज़ किया। दूसरे देशों की प्राकृतिक सम्पदाओं पर गिद्ध दृष्टि नहीं रखी। दो देशों को,आपस में लड़ाकर अपने हथियार बेचना,किसी देश पर क़ब्ज़ा कर लेना, धमकाना या किसी राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण कर लेना जैसी छिछोरी नीति नहीं अपनाई।

चीन और शी ज़िननपिंग तथा अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की इन्हीं नीतियों का परिणाम पिछले दिनों अमेरिकी रिसर्च संस्था Pew शोध केंद्र के ताज़ातरीन वैश्विक सर्वे में परिलक्षित होकर सामने आया है। इस सर्वे में यह पाया गया कि अमेरिका के मुक़ाबले चीन की और ट्रंप के मुक़ाबले शी ज़िनपिंग की विश्व में लोकप्रियता व उनके प्रति विश्व में भरोसा बढ़ा है। अमेरिकी रिसर्च संस्था द्वारा यह सर्वे पिछले दिनों 36 देशों में किया गया। सर्वे के निष्कर्षों के अनुसार 36 में से लगभग 25 देशों में लोगों ने चीन के प्रति अमेरिका की तुलना में अधिक सकारात्मक राय व्यक्त की। इसी सर्वे में विश्व मामलों को संभालने की क्षमता व विश्वसनीयता के मामले में शी ज़िनपिंग को डोनाल्ड ट्रंप से अधिक विश्वास मिला। इस सर्वे में पहली बार यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से नज़र आई कि कई देशों में चीन की छवि अमेरिका से अधिक सकारात्मक हो गई है, जबकि पिछले दो दशकों में आमतौर पर अमेरिका की छवि चीन से बेहतर रहती थी। 27 देशों में लोगों ने चीन को अमेरिका से अधिक अनुकूल रूप में देखा। यानी चीन को बेहतर सहभागी, निवेशक और स्थिर शक्ति माना। कई देशों में लोगों ने अंतरराष्ट्रीय मामलों को संभालने की क्षमता के मामले में भी शी ज़िनपिंग पर डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में अधिक भरोसा जताया। आश्चर्य तो यह है कि जिन 36 में से लगभग 22 देशों में लोगों ने शी जिनपिंग को ट्रंप से बेहतर या अधिक पसंदीदा नेता माना इनमें कनाडा, मैक्सिको, फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे महत्वपूर्ण पश्चिमी देश भी शामिल हैं। ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा कई देशों में बहुत कम रहा। एक पुराने वैश्विक सर्वे में भी 70% उत्तरदाताओं ने ट्रंप पर अंतरराष्ट्रीय मामलों में भरोसा नहीं जताया था जो कि उनके प्रति लंबे समय से चली आ रही ‘शंकाओं’ को दिखाता है। कई विकासशील देशों को यह भी लगता है कि चीन उन्हें सड़कों, बंदरगाहों, उद्योग और डिजिटल आधारभूत संरचना में तत्काल मदद दे रहा है, जबकि अमेरिका की मदद प्रायः राजनीतिक शर्तों पर आधारित तथा सुरक्षा गठबंधनों से बंधी हुई होती है। चीन ने एशिया, अफ़्रीक़ा, लैटिन अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में आधारभूत संरचना में निवेश, लोन, बेल्ट ऐंड रोड जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए “विकास साझेदार” की छवि बनाई है, जिससे वहाँ के आम लोगों में चीन को अवसर देने वाली शक्ति के रूप में देखा गया। इसी सर्वेक्षण और इसके विश्लेषणों में खुलकर कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान कई फ़ैसलों ने अमेरिकी छवि को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया है। जैसे सहयोगी देशों के साथ तनावपूर्ण संबंध, विदेशी सहायता में कटौती, कठोर व्यापार विवाद और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दूरी,ट्रंप की बोल भाषा, मुस्लिम देशों, आप्रवासियों और सहयोगियों के प्रति उनके विवादित बयान, NATO, यूरोपीय यूनियन और अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर बार‑बार हमले जैसे कारकों ने उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर भी व उनके साथ ही अमेरिका के प्रति भी दुनिया का भरोसा कम किया है। रही सही कसर ईरान-इस्राईल,मध्य पूर्व,वेनेज़ुएला व यूक्रेन आदि के प्रति ट्रंप की नीतियों ने पूरी कर दी। कहना ग़लत नहीं होगा कि ट्रंप की नीतियां ही विश्व में अमेरिका की साख गिरने की ज़िम्मेदार हैं।