युद्ध, सूखा और महंगाई: संकटों के चौराहे पर खड़ा भारत

War, Drought, and Inflation: India at the Crossroads of Crises

नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’

कुछ दिन पहले भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा महंगाई पर जारी ताजा आंकड़ों ने आर्थिक चुनौती बढ़ा दी है। आरबीआई के अनुसार जून माह में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है और यह पहली बार है जब जनवरी 2025 के बाद महंगाई आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर निकल गई है। इसी समय मौसम विभाग की ओर से मानसून और वर्षा को लेकर बनी अनिश्चितता तथा पश्चिम एशिया में फिर से गहराता युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नए संकट के बादल मंडरा रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि की आशंका भी लगातार बनी हुई है। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज महंगाई केवल घरेलू आर्थिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति शृंखला की चुनौतियों का संयुक्त परिणाम बन चुकी है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह दोहरा संकट इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहां बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा होता है। इस स्थिति में जरूरत है कि महंगाई को सिर्फ डेटा न देख कर उसके आर्थिक, समाजिक और मानवीय प्रभावों को भी देखा जाए।

महंगाई के ताजा संकेत और संदेश

महंगाई एक ऐसा संकेत है जो कि आम लोगों से सीधे तौर पर जुड़ा है, इसीलिए महंगाई के बढ़ते ही सरकार की भी चिंताएं बढ़ने लगती है। जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ने लगती हैं तो सबसे पहले घर का बजट प्रभावित होता है। आज यही स्थिति भारत में दिखाई दे रही है। खुदरा महंगाई का चार प्रतिशत की सीमा को पार करना केवल सांख्यिकीय घटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि बाजार में कीमतों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। खाद्य वस्तुओं से लेकर परिवहन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं तक अधिकांश क्षेत्रों में लागत बढ़ने लगी है। इससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति कमजोर होती है और बचत पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आर्थिक विकास की गति भी धीमी पड़ सकती है। महंगाई का सबसे अधिक प्रभाव निश्चित आय वाले कर्मचारियों, मजदूरों और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है, क्योंकि उनकी आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ती जितनी तेजी से वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। यह भी एक वजह है कि महंगाई केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक चुनौती भी बन जाती है। यह स्थिति इशारा कर रही है कि आने वाले समय में युद्ध और मौसम दोनों प्रतिकूल रहे तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।

युद्ध से बढ़ती वैश्विक आर्थिक बेचैनी

पिछ्ले कुछ महीनों से पच्छिम एशिया अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, जिसने पूरी दुनिया के न सिर्फ लोगों को बल्कि अर्थव्यवस्था को भी पीछे धकेल रहा है। युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और निवेश के वातावरण पर भी पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। यदि यहां किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। भारत अपनी तेल आवश्यकता का अधिकांश भाग आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी-सी वृद्धि भी देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डालती है। परिवहन महंगा होता है, उद्योगों की लागत बढ़ती है और अंततः हर वस्तु की कीमत पर उसका असर दिखाई देता है। युद्ध विदेशी निवेशकों का विश्वास भी कमजोर करता है, जिससे पूंजी निवेश में कमी आती है। इस प्रकार युद्ध केवल सैनिक मोर्चे पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि उसका असर आम नागरिक की रसोई, बाजार और रोजगार तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि वैश्विक शांति आज आर्थिक स्थिरता की भी सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।

सूखे की आशंका और कृषि संकट

भारत की अर्थव्यवस्था की जड़ें आज भी कृषि से गहराई से जुड़ी हुई हैं। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। यदि मानसून सामान्य रहता है तो कृषि उत्पादन अच्छा होता है और खाद्यान्न की कीमतें नियंत्रित रहती हैं। लेकिन इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव और वर्षा को लेकर बनी अनिश्चितता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। यदि वर्षा सामान्य से कम होती है तो धान, दालें, तिलहन, सब्जियां और फलों का उत्पादन प्रभावित होगा। उत्पादन घटने का सीधा परिणाम बाजार में वस्तुओं की कमी और कीमतों में वृद्धि के रूप में सामने आएगा। सूखा केवल खेतों को ही नहीं सुखाता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पूरी धारा को प्रभावित करता है। खेती से जुड़ी आय घटने पर ग्रामीण बाजारों में खरीदारी कम होती है, छोटे व्यापारियों का कारोबार प्रभावित होता है और मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर भी घटने लगते हैं। ऐसे समय में बड़ी संख्या में श्रमिक शहरों की ओर पलायन करते हैं, जबकि निर्माण क्षेत्र में मंदी होने पर उन्हें वहां भी पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाता। इस प्रकार सूखा केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले सकता है।

आम जनता पर बढ़ता आर्थिक बोझ

महंगाई का सबसे गहरा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जिसकी आय सीमित होती है। मध्यम वर्ग का मासिक बजट सबसे पहले बिगड़ता है और गरीब परिवारों के लिए दो समय की रोटी जुटाना भी कठिन हो जाता है। आलू, प्याज, टमाटर, दाल, दूध और खाद्य तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते दाम सीधे रसोई का संतुलन बिगाड़ देते हैं। इसके साथ ही परिवहन महंगा होने से शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक सेवाओं की लागत भी बढ़ जाती है। शहरों में रहने वाले परिवारों को किराया, बिजली और ईंधन पर अधिक खर्च करना पड़ता है, जबकि गांवों में खेती की लागत बढ़ने से किसानों की आय और व्यय के बीच का अंतर बढ़ जाता है। महंगाई बचत की क्षमता को कम करती है और परिवारों को भविष्य की योजनाओं में कटौती करनी पड़ती है। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य बीमा और छोटे निवेश जैसी योजनाएं प्रभावित होने लगती हैं। धीरे-धीरे उपभोग घटता है और बाजार की मांग कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि महंगाई केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रहती, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित करने लगती है।

आरबीआई और सरकार की कठिन परीक्षा

ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार दोनों के सामने संतुलित नीति अपनाने की चुनौती होती है। यदि महंगाई लगातार बढ़ती है तो आरबीआई को रेपो दर बढ़ानी पड़ सकती है। इससे बैंकों के लिए धन महंगा हो जाता है और वे ऋण पर ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। परिणामस्वरूप घर खरीदना, वाहन लेना या उद्योग स्थापित करना अधिक महंगा हो जाता है। इससे निवेश और खपत दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। दूसरी ओर यदि ब्याज दरें नहीं बढ़ाई जातीं तो महंगाई और अधिक बढ़ सकती है। इसलिए आरबीआई को मूल्य स्थिरता और आर्थिक विकास के बीच अत्यंत सावधानी से संतुलन बनाना पड़ता है। सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उसे आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होती है, जमाखोरी पर नियंत्रण रखना होता है और गरीब वर्ग को राहत देने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाना पड़ता है। कृषि उत्पादन बढ़ाने, भंडारण क्षमता सुधारने और परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने जैसे कदम भी समान रूप से आवश्यक हैं। यही समन्वित प्रयास देश को आर्थिक अस्थिरता से बचा सकते हैं।

इस स्थिति से निपटने के लिए क्या हो उपाय?

फ़िलहाल जो संकट आया है उससे निपटने के लिए सिर्फ तात्कालिक निदान ही पर्याप्त नहीं होंगे। भारत को ऐसी आर्थिक संरचना विकसित करनी होगी जो वैश्विक संकटों का सामना करने में सक्षम हो। ऊर्जा के क्षेत्र में सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक स्रोतों को तेजी से बढ़ावा देना समय की मांग है, जिजसे कि आयातित तेल पर निर्भरता कम हो सके। कृषि में आधुनिक तकनीक, जल संरक्षण, सूखा-रोधी फसलें और बेहतर सिंचाई व्यवस्था को बढ़ावा देना भी अनिवार्य है। मजबूत भंडारण और आपूर्ति तंत्र खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योगों का विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा करना भी आवश्यक है, ताकि संकट के समय पलायन कम हो। इसी के साथ ही डिजिटल बाजार, पारदर्शी व्यापार व्यवस्था और प्रभावी निगरानी से कृत्रिम महंगाई पर अंकुश लगाया जा सकता है। भारत को अपनी आर्थिक नीतियों में जलवायु परिवर्तन, वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा को समान महत्व देना होगा। यही दूरदृष्टि भविष्य के संकटों से देश को अधिक सुरक्षित बनाएगी।

संतुलित नीतियों से मजबूत होगा भारत

इतिहास गवाह है कि मुश्किल परिस्थितियां केवल चुनौतियां ही नहीं लातीं, बल्कि सुधार और आत्मनिर्भरता के अवसर भी प्रदान करती हैं। आज भारत जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें युद्ध, सूखे और महंगाई का त्रिकोण निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन यह देश की नीति, योजना और सामूहिक क्षमता की भी परीक्षा है।अगर सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक, उद्योग, किसान और समाज मिलकर दूरदर्शी सोच के साथ कार्य करें तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है। मजबूत कृषि, आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था, पारदर्शी बाजार, प्रभावी आपूर्ति तंत्र और संतुलित मौद्रिक नीति मिलकर ही महंगाई पर स्थायी नियंत्रण स्थापित कर सकती है। आर्थिक विकास तभी सफल होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और उसकी थाली, जेब तथा भविष्य सुरक्षित रहे। इसलिए आवश्यकता केवल महंगाई के आंकड़ों को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने की है जो वैश्विक युद्ध, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति संकट जैसी चुनौतियों के बीच भी मजबूती से आगे बढ़ सके। यही भारत की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और समृद्ध भविष्य की वास्तविक आधारशिला होगी।