भारत का छठे स्थान पर जाना एक झटका जरूर है, लेकिन इसे संकट के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। यह एक चेतावनी भी है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में केवल तेजी से बढ़ना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि मुद्रा स्थिरता और सटीक आंकड़ों की भी उतनी ही अहम भूमिका है।
राजेश जैन
देश की अर्थव्यवस्था को लेकर हाल में आई एक खबर ने बहस छेड़ दी है-अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की ताजा रैंकिंग में भारत छठे स्थान पर खिसक गया है। यह वही भारत है, जिसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सच में भारत कमजोर हो रहा है या यह केवल आंकड़ों का खेल है?
आईएमएफ के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के अनुसार, 2025-26 के अनुमानों में भारत की जीडीपी लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर रहने की संभावना है, जबकि ब्रिटेन 4.26 ट्रिलियन डॉलर के साथ एक पायदान ऊपर पहुंच गया है। इससे भारत छठे स्थान पर चला गया। अमेरिका और चीन पहले दो स्थानों पर बने हुए हैं, जबकि जर्मनी, जापान और ब्रिटेन भारत से आगे हैं। पहली नजर में यह गिरावट चिंता पैदा करती है, लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। यह बदलाव विकास दर में गिरावट के कारण नहीं, बल्कि गणना के तरीके और मुद्रा के उतार-चढ़ाव से जुड़ा है।
रुपये की कमजोरी सबसे बड़ा कारण
जीडीपी की वैश्विक तुलना अमेरिकी डॉलर में होती है। यही वह बिंदु है, जहां भारत को झटका लगा। पिछले एक साल में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है-93 के पार पहुंचना इसका संकेत है।
इसे सरल भाषा में समझें। मान लीजिए भारत में उत्पादन और आय बढ़ रही है, लेकिन रुपया कमजोर हो रहा है। ऐसे में जब उसी उत्पादन को डॉलर में बदला जाएगा, तो उसकी वैल्यू कम दिखाई देगी। यानी असल में अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय तुलना में वह छोटी दिखने लगती है। यही कारण है कि भारत की जीडीपी डॉलर में कम आंकी गई और रैंकिंग नीचे खिसक गई।
बेस ईयर का बदलाव
भारत सरकार ने हाल ही में जीडीपी मापने के लिए बेस ईयर को 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया है। यह एक तकनीकी लेकिन बेहद अहम बदलाव है। बेस ईयर बदलने का मतलब है कि अब अर्थव्यवस्था को नए डेटा और नए मानकों के आधार पर मापा जा रहा है। इससे आंकड़े ज्यादा सटीक होते हैं, लेकिन जब पुराने वर्षों की जीडीपी को नए तरीके से दोबारा कैलकुलेट किया गया, तो कुछ सेक्टरों में अनुमान कम हो गए। इस बदलाव के चलते नॉमिनल जीडीपी में करीब 2 से 4 प्रतिशत तक की कमी दिखी।
विकास दर मजबूत पर रैंकिंग कमजोर
यहां सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। एक तरफ भारत 6.5% की दर से बढ़ रहा है, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज है। दूसरी तरफ उसकी रैंकिंग गिर रही है। विकास दर और कुल जीडीपी का आकार दो अलग चीजें हैं। विकास दर बताती है कि अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है, जबकि जीडीपी का आकार यह दर्शाता है कि कुल अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है। भारत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी अमेरिका, चीन, जर्मनी जैसे देशों की तुलना में उसका कुल आकार छोटा है। ऐसे में यदि मुद्रा कमजोर हो जाए या आंकड़ों में बदलाव हो जाए, तो रैंकिंग प्रभावित होना स्वाभाविक है।
ब्रिटेन से पीछे क्यों रह गया भारत
ब्रिटेन ने इस बार भारत को पीछे छोड़ दिया है। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं-पहला, ब्रिटेन की मुद्रा अपेक्षाकृत स्थिर रही; दूसरा, वहां के आर्थिक आंकड़ों में ऐसा कोई बड़ा संशोधन नहीं हुआ जैसा भारत में हुआ। यानी जहां भारत को रुपये की कमजोरी और बेस ईयर बदलाव का दोहरा झटका लगा, वहीं ब्रिटेन अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा।
क्या यह गिरावट स्थायी है?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट स्थायी नहीं है। इसके पीछे कोई बुनियादी आर्थिक कमजोरी नहीं है। भारत की खपत, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास मजबूत स्थिति में हैं। भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी घरेलू मांग है। इसके अलावा सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर, डिजिटल इकोनॉमी का विस्तार और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुधार इसे आगे बढ़ा रहे हैं। आईएमएफ का अनुमान है कि यदि यही रफ्तार बनी रही, तो भारत 2027-28 तक फिर से चौथे स्थान पर पहुंच सकता है।
रुपए को स्थिर रखना और आर्थिक सुधारों की गति बनाए रखने की चुनौती
भारत के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां हैं-मुद्रा को स्थिर रखना और आर्थिक सुधारों की गति बनाए रखना। रुपये की स्थिरता के लिए मजबूत निर्यात, विदेशी निवेश और वित्तीय अनुशासन जरूरी होगा। वहीं, जीडीपी के आंकड़ों को और पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना भी अहम है। इसके अलावा, भारत को अपनी विकास दर बनाए रखते हुए मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और सर्विस सेक्टर में और मजबूती लानी होगी। रोजगार सृजन और आय में वृद्धि भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।





