बंगाल चुनाव में ‘चीनी’ किस तरफ

Which side is the 'Chinese' on in the Bengal elections

कोलकाता के टांगरा की दीवारों पर अब लाल-सुनहरी मंदारिन अक्षरों में नारे चमक रहे हैं। “टीएमसी को सपोर्ट करो!” या “कांग्रेस विकास की राह!” कुछ दीवारों पर बीजेपी के नारे भी दिखाई दे रहे हैं। यहां पर 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव का मतदान है। टांगरा के चीनी मूल के मतदाताओं की आबादी करीब 5 हजार के आसपास तो होगी ही। इनकी उपस्थिति से पश्चिम बंगाल की राजनीति का रंग और भी समावेशी हो जाता है। लेकिन ये दीवारें सिर्फ चुनावी रंग नहीं, बल्कि 250 साल पुरानी कहानी की जीवंत गवाही हैं। मैं इस साल के शुरू में अपने कोलकाता प्रवास के समय टांगरा भी गया था। बहुत से लोगों से बातें हुईं थीं। इस बार ये चीनी मूल के मतदाता किस तरफ हैं? इनका कोलकाता रिश्ता कैसे कायम हो गया ?

विवेक शुक्ला

कोलकाता के टांगरा में अप्रैल की धूप चमक रही है। इधर की दीवारों पर अब लाल-सुनहरी मंदारिन अक्षरों में नारे चमक रहे हैं। “टीएमसी को सपोर्ट करो!” या “कांग्रेस विकास की राह!” कुछ दीवारों पर बीजेपी के नारे भी दिखाई दे रहे हैं। यहां 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव का मतदान है। टांगरा के चीनी मूल के मतदाताओं की आबादी करीब 5 हजार के आसपास है। इनकी उपस्थिति से पश्चिम बंगाल की राजनीति का रंग और भी समावेशी हो जाता है। लेकिन ये दीवारें सिर्फ चुनावी रंग नहीं, बल्कि 250 साल पुरानी कहानी की जीवंत गवाही हैं। एक ऐसी कहानी, जो चाय के बगीचों से शुरू हुई, चमड़े की टेनरी में फली-फूली, 1962 के युद्ध की आग में झुलसी और आज भी ममता बनर्जी की टीएमसी से लेकर बीजेपी और कांग्रेस तक के वोट-मांगने वाले पोस्टरों में सांस ले रही है।

राजनीति में इन चीनी मूल के भारतीय नागरिकों का रोल हमेशा अनोखा रहा है। पहले के चुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट (सीपीआईएम) उन्हें अपना समर्थक मानते थे। 1970-80 के दशक में चीनी टेनरी ओनर्स एसोसिएशन ने राजनीतिक रिश्ते
बनाए। लेकिन 2011 के बाद तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें खास तवज्जो दी। 2019 के लोकसभा चुनाव से शुरू होकर अब 2026 के विधानसभा चुनाव तक टीएमसी ने मंदारिन में टांगरा की दीवारों पर “टीएमसी उम्मीदवार को वोट दो” के नारे लिखवाए हैं। कांग्रेस और बीजेपी भी पीछे नहीं हैं। बीते चुनावों की तरह राजनीतिक कार्यकर्ता टांगरा की गलियों में चीनी भाषा के पोस्टर चिपका रहे हैं। क्यों? क्योंकि टांगरा का हर वोट मायने रखता है। छोटी आबादी, लेकिन एकजुट। और प्रतीकात्मक रूप से ये दीवारें कोलकाता की बहुलता की कहानी कहती हैं।

आगे बढ़ने से पहले पीछे मुड़कर देख लेते हैं। सब कुछ शुरू हुआ 1778 में। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने एक चीनी व्यापारी को बंगाल में जमीन दी। नाम था टोंग आह च्यू। यहां के स्थानीय लोग उसे ‘एटच्यू’ कहते थे। हुगली नदी के किनारे उसने चीनी मिल लगाई। एटच्यू की मौत के बाद उसके मजदूर कोलकाता चले आए। टिरेट्टा बाजार
कोलकाता का पहला चाइना टाउन बन गया। 19वीं सदी के अंत तक और चीनी आए।

दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक शूद शो रूम के मालिक जॉर्ज च्यू कहते हैं कि हम भारत आकर बसे चीनियों का संबंध चीन के गुआंगडोंग, फूजियान और जियांग्शी से था। “चीन में गृहयुद्ध, जापानी आक्रमण और अकाल से भागकर वे यहां पहुंचे। हिंदू-मुस्लिम समाज में चमड़े का काम ‘अछूत’ माना जाता था, लेकिन हमने इन्होंने उसे अपना लिया। टांगरा 1920 के दशक में उनका नया घर बन गया। टेनरी उद्योग फल-फूल उठा। सैकड़ों जूते की दुकानें बेंटिंक स्ट्रीट पर खुलीं,” च्यू बताते हैं।

कोलकाता की चीनी आबादी 50 हजार तक पहुंच गई। रेस्टोरेंट, डेंटिस्ट, कारपेंटर जैसे पेशों में वे चमक रहे थे।

उनके पास अपनी दुनिया थी। 1969 में ली यून चिन नाम के चीनी ने ‘सीओंग पॉव’ (ओवरसीज चाइनीज कॉमर्स ऑफ इंडिया) अखबार शुरू किया। भारत का इकलौता चीनी भाषा का दैनिक। इसमें मंदारिन में कोलकाता की खबरें, चीन-ताइवान-हांगकांग की घटनाएं, शादियां-जन्म-मृत्यु की सूचनाएं होती थीं। यह अखबार कोलकाता के चीनियों का ‘सोशल मीडिया’ था। तब टांगरा की गलियों में चीनी मंदिर, ड्रैगन डांस, नया साल का जश्न हुआ करता था। लेकिन 1962 का भारत-चीन युद्ध आया और सब बदल गया।

युद्ध की खबरें फैलीं तो कोलकाता के चीनी इलाकों में दहशत छा गई। हजारों को ‘एनेमी एलियन’ घोषित कर दिया गया।

तब बहुत सारे परिवार देश के अलग-अलग इलाकों में चले गए। टेनरी बंद हो गईं, दुकानें लूट ली गईं। कुछ को डिपोर्ट कर
दिया गया। कोलकाता के एक नौजवान चीनी मूल के भारतीय एन. ली कहते हैं, “हम भारतीय थे, लेकिन चीनी चेहरा देखकर हमें गद्दार समझा गया।” इनकी आबादी घटने लगी।

इनकी नई नस्ल कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया की ओर पलायन करने लगी। 2023 तक ‘सीओंग पॉव’ भी बंद हो गया। संपादक की मौत के बाद कोई नहीं बचा उसे चलाने को।

फिर भी टांगरा टिका रहा। आज भी यहां मशहूर चीनी रेस्टोरेंट हैं। टेनरी उद्योग अब पर्यावरण नियमों के कारण मुश्किल में
है, लेकिन समुदाय ने खुद को भारतीय बनाया है। वे भारतीय पासपोर्ट धारक हैं, बंगाली बोलते हैं, दीवाली-दुर्गा पूजा मनाते हैं, फिर भी चीनी नया साल और चीनी मंदिर उनकी पहचान बने हुए हैं।

पिछले विधानसभा चुनावों की तरह इस बार भी चीनी समुदाय टीएमसी की ओर झुकाव रखता दिख रहा है। ममता बनर्जी की सरकार ने उन्हें सांस्कृतिक सम्मान दिया। चीनी नववर्ष पर सरकारी कार्यक्रम आयोजित होने लगे हैं। लेकिन शिकायतें भी हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) में सैकड़ों चीनी मूल के वोटरों के नाम कट गए। च्यू कहते हैं कि भारत में बसे चीनी मूल के लोग कोलकाता से ही सारे देश में जाकर बसे।हम भारतीय हैं, फिर भी पहचान पर सवाल हैं? राजधानी दिल्ली में भी करीब दो दर्जन चीनी परिवार दशकों से बसे हुए हैं।

आप अब टांगरा में घूमो तो पुरानी चीनी काली मंदिर दिखेगी। ड्रैगन डांस की परंपरा अब भी बची हुई है। युवा पीढ़ी अंग्रेजी-बंगाली में बात करती है, लेकिन दादी-नानी अभी भी चीनी बोलती हैं। वे भारत आए, यहां बसे, यहां के लिए लड़े, यहां के चुनाव लड़े। उनकी कहानी सिर्फ चीनी नहीं, भारतीय भी है। आप इसे विविधता की, संघर्ष की, और अंत में समावेशिता की दास्तान कह सकते हैं।

जब 29 अप्रैल को मतदान होगा, तो टांगरा की दीवारें फिर मंदारिन नारों से रंग जाएंगी। लेकिन असली रंग तो उस समुदाय का है, जिसने 1778 से आज तक कोलकाता को अपना बनाया। चाय से शुरू हुई यह यात्रा अब नूडल्स, टेनरी और वोटों तक पहुंच गई है। और यह कहानी खत्म नहीं होती। इसकी वजह यह है कि कोलकाता की सड़कें हमेशा नई कहानियां लिखती रहती हैं।