के. पी. मलिक
भारत की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ हर चुनाव सिर्फ सरकार बदलने का सवाल नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा और विचारधारा की परीक्षा भी बन जाता है। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल ये चार राज्य सिर्फ भौगोलिक रूप से अलग नहीं हैं, बल्कि इनके राजनीतिक डीएनए भी एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। ऐसे में आने वाले चुनावी नतीजे यह तय करेंगे कि क्या राष्ट्रीय दल अपना विस्तार कर पाएंगे या क्षेत्रीय ताकतें अपनी पकड़ और मजबूत करेंगी।
सबसे पहले बात पश्चिम बंगाल की करते हैं यहाँ ममता बनर्जी का प्रभाव अभी भी बेहद मजबूत दिखता है। तृणमूल कांग्रेस ने जिस तरह से ग्रामीण और अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधा है, वह भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। भाजपा ने पिछले चुनाव में उल्लेखनीय बढ़त जरूर बनाई थी, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी और स्थानीय नेतृत्व की कमी अब भी उसके लिए बाधा है। यहाँ असली लड़ाई विचारधारा से ज्यादा जमीन पर पकड़ की है, जहाँ ममता बनर्जी फिलहाल आगे नजर आती हैं।
अगर असम की बात की जाये तो असम में तस्वीर कुछ अलग है। हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने न सिर्फ अपनी स्थिति मजबूत की है, बल्कि एक आक्रामक और स्पष्ट राजनीतिक नैरेटिव भी स्थापित किया है। केंद्र की मोदी सरकार और पहचान की राजनीति, एनआरसी और विकास के मुद्दों का मिश्रण भाजपा को यहाँ बढ़त देता दिख रहा है। कांग्रेस, यानि इंडियन नेशनल कांग्रेस अभी भी अपनी खोई जमीन वापस पाने के संघर्ष में है। गठबंधन राजनीति यहाँ उसकी उम्मीद जरूर है, लेकिन वह कितनी कारगर होगी, यह सवाल बना हुआ है।
वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत में प्रवेश करते ही राजनीति का स्वर बदल जाता है। तमिलनाडु में एम के स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके की पकड़ मजबूत बनी हुई है। यहाँ भाजपा का विस्तार अभी शुरुआती चरण में है और वह सांस्कृतिक-भाषाई पहचान की राजनीति से जूझ रही है। तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जहाँ हमेशा राष्ट्रीय दलों के लिए जगह बनाना आसान नहीं रहा है।
और अंत में अगर केरल की बात करें तो यहां की राजनीति हमेशा से वैचारिक संघर्ष का केंद्र रही है। पिनराई विजयन के नेतृत्व में वामपंथी सरकार ने लगातार दूसरी बार सत्ता में आकर एक नया इतिहास रचा था। यहाँ मुकाबला सीधा एलडीएफ और यूडीएफ़ (कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन) के बीच होता है। भाजपा की मौजूदगी अभी सीमित है, लेकिन वह धीरे-धीरे अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, केरल में चुनाव सिर्फ विकास या पहचान का नहीं, बल्कि विचारधारा का भी होता है।
बहरहाल अगर व्यापक तस्वीर देखें, तो भाजपा की रणनीति साफ है कि पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में विस्तार और दक्षिण में धीरे-धीरे पैठ बनाना। वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता और संगठन को पुनर्जीवित करने की है। क्षेत्रीय दल इस पूरे खेल में “किंगमेकर” की भूमिका में हैं, जो न सिर्फ राज्यों में, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी निर्णायक असर डाल सकते हैं।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या मतदाता इस बार विकास, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देंगे, या फिर पहचान और भावनात्मक राजनीति एक बार फिर चुनावी एजेंडा तय करेगी? इन चुनावों का परिणाम सिर्फ सरकारें नहीं तय करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि भारत की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ रही है एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय विमर्श की ओर या फिर मजबूत क्षेत्रीय अस्मिताओं के सह-अस्तित्व की ओर, आखिरकार, यह चुनाव नेताओं से ज्यादा मतदाताओं की सोच का आईना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)





