जयदेव राठी
पश्चिमी बंगाल की राजनीति हमेशा से प्रतीकों, संस्कृति और भावनाओं के सहारे अपनी दिशा तय करती रही है। कभी “माटी, मानुष” का नारा गूंजता है, तो कभी “खेला होबे” जनभावनाओं को आंदोलित करता है।
पश्चिम बंगाल की माटी की सुगंध, रवींद्र संगीत की मधुर धुन और लाल पाड़ की साड़ियों की परंपरा, यह बंगाल केवल एक राज्य नहीं, एक सांस्कृतिक चेतना है। लेकिन इन दिनों इस धरती पर जो राजनीतिक आँधी चल रही है, वह किसी भी चुनावी विश्लेषक को सोचने पर मजबूर कर देती है। 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होने वाले मतदान और 4 मई को आने वाले परिणाम के साथ 294 सीटों का यह महासमर अपने चरम पर है। और इस महासमर के बीच एक चटपटी घटना ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया — झारग्राम की एक साधारण-सी दुकान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झालमुड़ी।
प्रचार अभियान के बाद जब पीएम मोदी का काफिला झारग्राम के जंगलमहल क्षेत्र में हेलीपैड की ओर बढ़ रहा था, तभी अचानक कॉलेज मोड़ के पास काफिला रुका। प्रधानमंत्री कार से उतरे और एक छोटी-सी दुकान की ओर चल पड़े। उन्होंने दुकानदार से कहा — मुझे झालमुड़ी खिलाओ। 10 रुपए की झालमुड़ी बनवाई और दुकानदार को रुपए दिए। झारग्राम की व्यस्त सड़कों के किनारे झालमुड़ी बेचने वाले विक्रम शॉ के लिए वह क्षण किसी सुनहरे सपने के सच होने जैसा था, जब देश के प्रधानमंत्री खुद उनकी दुकान पर चलकर आए।
प्रधानमंत्री ने इस अनुभव को सोशल मंच ‘एक्स’ पर साझा करते हुए लिखा कि व्यस्त चुनावी दिन के बीच झारग्राम में स्वादिष्ट झालमुड़ी का आनंद लेना उनके लिए खास रहा। उनकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से प्रसारित हुए और समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बन गए। बंगाल के लोकजीवन में झालमुड़ी केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है — मुरमुरे, सरसों का तेल, हरी मिर्च, नीबू और नमक का यह चटपटा संयोजन बंगाली अस्मिता की एक पहचान है। जब देश के प्रधानमंत्री उसी झालमुड़ी को सड़क किनारे खड़े होकर चखते हैं, तो यह केवल एक चटपटा क्षण नहीं रहता — यह एक राजनीतिक संदेश बन जाता है।
राजनीति में प्रतीक सदैव से शक्तिशाली रहे हैं। महात्मा गांधी का नमक, लाल बहादुर शास्त्री का ‘जय जवान, जय किसान’ और अटल बिहारी वाजपेयी की काव्यात्मक वक्तृता — ये सब प्रतीक थे जिन्होंने जनमानस को प्रभावित किया। झारग्राम की झालमुड़ी भी उसी श्रृंखला की एक कड़ी है। चुनावी सरगर्मियों और तीखे राजनीतिक बयानों के इस दौर में, झारग्राम की सड़क पर झालमुड़ी खाते प्रधानमंत्री की यह तस्वीर राजनीतिक विमर्श में एक नया रंग घोल गई है। यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आगामी चुनावों में जनता से सीधे जुड़ने के लिए राजनीतिक दल किस हद तक जनसंपर्क के हर छोटे-बड़े अवसर को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
परंतु इस झालमुड़ी ने केवल भाजपा समर्थकों को ही नहीं, बल्कि विपक्ष को भी उद्वेलित किया। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक छल बताते हुए भाजपा पर निशाना साध रही है। इस पूरे घटनाक्रम को आदिवासी अस्मिता से जोड़ते हुए तृणमूल ने कहा कि “आदिवासी नेताओं के प्रति मोदी का यही सम्मान है — वे आदिवासी मत हासिल करने के लिए झाड़ग्राम आए थे, लेकिन जिन लोगों के साथ खड़े होने का उन्होंने दावा किया था, उन्हीं को अपमानित करके चले गए।” तृणमूल का यह प्रतिक्रम भी उतना ही प्रतीकात्मक है — जब विरोधी दल किसी घटना को इतनी गंभीरता से लेता है, तो स्पष्ट होता है कि उस घटना ने एक गहरी चोट की है।
झारग्राम की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यहाँ न पढ़ाई की सही व्यवस्था है, न रोजगार के अवसर और न ही स्वास्थ्य सेवाएँ ठीक हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के लोग बदलाव चाहते हैं और अब समय आ गया है कि मौजूदा सरकार को जवाब दिया जाए। जंगलमहल क्षेत्र — जिसमें झारग्राम, पुरुलिया, बाँकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर के कई क्षेत्र सम्मिलित हैं, आदिवासी बहुल इलाका है जहाँ माओवाद की छाया, विकास की कमी और सांस्कृतिक उपेक्षा की पीड़ा दशकों से सुलगती रही है। यहाँ झालमुड़ी खाना केवल नाश्ता करना नहीं था — यह उस धरती की धड़कन से एकात्म होने का प्रयास था।
भारतीय जनता पार्टी इस बार सत्ता हासिल करने के लक्ष्य के साथ चुनावी मैदान में उतरी है और विभिन्न सामाजिक वर्गों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। खासतौर पर आदिवासी मत पर पार्टी ने विशेष ध्यान केंद्रित किया है, क्योंकि झारखंड से सटे जिलों में इन मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले चुनाव में पार्टी ने 77 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि इस बार सूक्ष्म स्तरीय रणनीति और संगठनात्मक मजबूती के सहारे बेहतर प्रदर्शन का लक्ष्य रखा गया है।
बंगाल के चुनावी समीकरण को समझना किसी जटिल बीजगणित से कम नहीं। एक ओर ममता बनर्जी की जनाधार में गहरी पैठ, उनकी ‘दीदी’ छवि और तृणमूल का सुसंगठित जमीनी तंत्र है। 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 214 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि भाजपा सत्ता में आते ही समान नागरिक संहिता लागू करेगी — यह दाँव सीधे तौर पर मतुआ समुदाय और उत्तर बंगाल के मतदाताओं को साधने के लिए है। वहीं ममता बनर्जी ने इसे ‘बंगाल को तीन टुकड़ों में बाँटने’ की साजिश करार दिया है और मतदाता सूची से कटे नामों को एनआरसी नीति से जोड़कर जनता के बीच एक भावनात्मक वातावरण बनाने की कोशिश की है।
इसके अतिरिक्त हिंदी भाषी मतदाता भी इस बार निर्णायक भूमिका में हैं। लगभग डेढ़ करोड़ हिंदी भाषी मतदाताओं पर तृणमूल और भाजपा दोनों की निगाहें हैं और लगभग 50 सीटों पर इनका प्रभाव निर्णायक हो सकता है। तृणमूल ने हिंदी अकादमी की स्थापना की और छठ पूजा जैसे पर्व पर सरकारी अवकाश की घोषणा कर अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश की है, जबकि भाजपा ने स्थानीय व्यापारियों और हिंदी भाषी समाज के प्रभावशाली लोगों के साथ सीधा संपर्क साधा है।
यही बंगाल की विशिष्टता है। यहाँ चुनाव केवल मत का लेन-देन नहीं, अस्मिता का आख्यान है। बांग्लादेश सीमा, मुस्लिम मतदाताओं का घनत्व, मतुआ समुदाय की आकांक्षाएँ, आदिवासी जनजातियों की पीड़ा और नगरीय बंगाली मध्यवर्ग की बौद्धिक चेतना — ये सब मिलकर एक ऐसा चुनावी रसायन बनाते हैं जिसे कोई भी समीकरण पूरी तरह नहीं समझ सकता।
झालमुड़ी इस रसायन का एक अणु है — छोटा, किंतु प्रभावशाली। जब एक प्रधानमंत्री सुरक्षाघेरे को तोड़कर सड़क के किनारे एक सामान्य विक्रेता से झालमुड़ी माँगता है, तो वह संदेश देता है — मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारी भाषा में, तुम्हारे स्वाद में। यह भारतीय लोकतंत्र की वह शक्ति है जिसे सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोग कभी-कभी भूल जाते हैं और चुनाव का मौसम उन्हें पुनः याद दिलाता है।
4 मई को परिणाम आने के बाद स्पष्ट होगा कि बंगाल का मतदाता किसके साथ खड़ा है।
परंतु अभी तो यही कहा जा सकता है कि झारग्राम की झालमुड़ी ने बंगाल के चुनावी विमर्श में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मुरमुरे की तरह उड़ते इस क्षण ने नमक-मिर्च-तेल की तरह जनमानस में अपनी जगह बना ली है। अब देखना यह है कि यह स्वाद मतपेटी तक पहुँचता है या केवल सोशल मंच के उदर में समाकर रह जाता है।
बंगाल की माटी बहुत पुरानी और बहुत जागरूक है। यहाँ का मतदाता भावनाओं में बहता भी है और तर्कों पर टिकता भी है। वह रवींद्रनाथ की कविता का रसिक भी है और राजनीतिक दाँव-पेंच का पारखी भी। झालमुड़ी का यह प्रतीक उसे भाता भी है, लेकिन केवल तब तक, जब तक उसे लगे कि यह सादगी असली है, नाटकीय नहीं। बंगाल का मतदाता यह निर्णय 23 और 29 अप्रैल को करेगा और उसका निर्णय केवल बंगाल का नहीं, समूचे राष्ट्र की राजनीतिक दिशा का संकेत होगा।





